Friday, November 24, 2017
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rashi chakra

 

 


राखी का कोमल धागा अगर बहन प्रेम से शुभ मुहूर्त देखकर भार्इ की राशि के अनुसार रक्षाबंधन के दिन भार्इ की कलार्इ पर बांधें तो यह रक्षासूत्र भार्इ-बहन के रिश्ते को मजबूत कर ग्रहों को भी अनुकूल करता है। रक्षाबंधन पर राखी बांधने से पहले मुहूर्त का विचार अनादिकाल से चला आ रहा है। राखी बंधवाने से पहले भद्रा का विचार अवश्य करना चाहिए, शास्त्रों के अनुसार भद्राकाल में राखी बांधना निषेध माना गया है। भद्राकाल में कोर्इ भी मांगलिक कार्य, उत्सव, भार्इ की कलार्इ पर राखी आदि नहीं बांधना चाहिए क्योंकि शनि की सगी बहन है भद्रा। अपने भार्इ शनि की ही तरह इसका स्वभाव ज्योतिष शास्त्र में क्रूर बताया गया है, भद्रा भगवान सूर्य की पुत्री है, सूर्य की पत्नी छाया से उत्पन्न है और शनि की सगी बहन है। भद्रा का स्वभाव जन्म से ही उग्र था, उसकी उग्रता को रोकने के लिए ही भगवान ब्रहमा ने उसे कालगणना कर पंचांग में एक प्रमुख स्थान (अंग) प्रदान किया। हिन्दु पंचांग में पांच प्रमुख अंग होते हैं, तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। करण की कुल संख्या ग्यारह होती है, जिनमें विषिट नाम के एक करण को ही भद्रा कहते हैं। भद्रा के विनाशक स्वभाव के कारण ही सूर्य भगवान दुविधा में थे कि उसका विवाह किसके साथ किया जाए। अत: एक दिन सूर्य भगवान, पुत्री भद्रा के साथ ब्रहम लोक, ब्रहमा जी के पास गए, ब्रहमा जी ने विषिट को बुलाकर कहा, ''भद्रे! तुम बव, बालव, कौलव, तैतिल आदि करणों के अंत में निवास करो और जो व्यकित यात्रा, गृह प्रवेश, मांगलिक कार्य, व्यापार आदि नए कार्य की शुरूआत तुम्हारे समय में करे, उन्हीं के यहां जाकर तुम निवास करो और कार्यों में विघ्न-बाधाऐं अपनी आदतानुसार उत्पन्न करो। इसी प्रकार भद्रा की उत्पतित हुर्इ और उसे विषिट करण के रूप में पंचांगों में स्थान प्राप्त हुआ, अत: मांगलिक कार्यों में विघ्न-बाधा, विनाश से बचने के लिए ब्रहमा जी के कथानुसार भद्रा का त्याग अवश्य करना चाहिए, विशेषकर राखी भांधना, श्रावणी कर्म, चूड़ा पहनना तथा होलिका दहन।
भद्रायां द्वे न कर्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा।
श्रावणी नृपति हनित, ग्रामं दहति फाल्गुन।।
भद्रा तीनों लोकों में विचरण करती है, शास्त्रों के अनुसार स्वर्गलोक में निवास करने वाली भद्रा शुभफलदायक, पाताल लोक में निवास करने वाली भद्रा धन संचय कारक एवं मृत्युलोक अर्थात पृथ्वी पर निवास करने वाली भद्रा समस्त कार्यों की विनाशक होती है।
स्वर्गेभद्रा शुभमकुरयात, पाताले च धनागमन,
मृत्युलोके यदाभद्रा सर्वकार्ये विनाशनी।
इस वर्ष सन 2013 में श्रावण पूर्णिमा दो दिन व्याप्त है। पूर्णिमा 20 अगस्त, मंगलवार को प्रात: 10:22 से आगामी दिन 21 अगस्त बुधवार को प्रात: 7:15 तक रहेगीं। 20 अगस्त को भद्रा भी प्रात: 10:22 से रात्रि 08:49 तक रहेगी। अतएव शास्त्र वचनानुसार तो 20 अगस्त मंगलवार को भद्रा रहित प्रदोषकाल में अर्थात रात्रि 08:49 के बाद रक्षाबन्धन पर्व मनाया जा सकेगा। अधिकांशत: भार्इ-बहन स्नान, पूजा-पाठादि नित्यकर्मों से निवृत्त होकर निराहार रहकर शुद्धमुख सहित मंत्रपूर्वक रक्षाबन्धन करते हैं। कुछ धर्मपरायण बहनें भगवान श्रीनारायण अथवा श्रीकृष्ण की मूर्ति को रक्षासूत्र बांधकर, तिलक एवं भोगादि लगाकर बाद में निज भ्राताओं को मंगल टीका एवं रक्षाबन्धन करती हैं। 21 अगस्त बुधवार को पूर्णिमा यधपि प्रात: 07:15 तक ही व्याप्त होगी, तथापि प्रादेशिक परम्परानुसार एवं आवश्यक परिसिथतिवश मध्यान्ह तक भद्रारहित काल में रक्षाबन्धन का पावन कृत्य सम्पादित किया जा सकेगा।

 

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                    ज्योतिषाचार्य आशुतोष वाष्र्णेय

 

 

 

 

 

 

 

 

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