Saturday, November 25, 2017
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S radhakrishnan

                गो, गंगा, गायत्री, गौरी, गीता के रूप में पंच महाशकितयां सृषिट निर्माण और उद्धार की अधिष्ठात्री हैं। इसी पावन अक्षर ' से गुरू और ज्ञान की रचना होती है जिसने सम्पूर्ण ब्रह्राण्ड को दिव्य ज्योति प्रदान की है। ज्ञान को व्यावहारिक रूप में उतारना तथा उसको ग्रहण करना शिक्षक-शिष्य परम्परा का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। शिक्षक अर्थात शिक्षा प्रदान करने वाला तथा 'शिष्य शिक्षा ग्रहण करने वाला। शिक्षक से तात्पर्य केवल किताबी ज्ञान बांटने वाले से ने होकर जीवन को एक सम्पूर्ण मार्गदर्शन देने वाले से है। सम्पूर्ण राष्ट्र 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस मानकर डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को श्रद्धांजलि अर्पित करता है। दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर से भारत के द्वितीय राष्ट्रपति बनना अपने आप में गौरवपूर्ण बात है, डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की कुण्डली में गुरू चतुर्थ भाव में सिथ्त होकर कर्म भाव को पूर्ण दृषिट से देख रहे हैं, केन्द्र में सिथत बलवान गुरू ने इन्हें शिक्षकों का सर्वकालिक प्रतिनिधि बनाया और देश आज भी इनके जन्मदिवस को शिक्षक दिवस के रूप में मनाता है। जन्मकुण्डली में गुरू शुभ एवं बलवान हो अथवा गुरू ग्रह द्वारा गजकसेरी योग का सृजन हो रहा हो, या पंचमहापुरूष योग हो अथवा निम्नलिखित ग्रह सिथति, ग्रह योग होने पर व्यकित शिक्षा के क्षेत्र में पदार्पण करता है।

1. पंचम भाव में सिथत दशमेश व्यकित को विद्वान बनाकर शिक्षा से लाभ प्रापित का योग देता है। व्यकित शिक्षक या उपदेशक होता है।

2. दशमेश के नवांशपति यदि गुरू हों अथवा गुरू से दृषिट, युति करें तो व्यकित शिक्षक बनता है।

3. दशम भाव का गुरू या बुध से संबंध श्रेष्ठ शिक्षक बनाता है।

4. गुरू यदि केन्द्र, त्रिकोण, लाभ तथा धन भाव में हो तो व्यकित श्रेष्ठ शिक्षक होता है।

5. गुरू की कर्क राशि में सिथत तथा नवांश में उत्तम सिथति भी श्रेष्ठ शिक्षक बनाने में समर्थ है।

6. द्विस्वभाव राशि में यदि अधिक ग्रह हों तो व्यकित का झुकावा शिक्षण कार्य की तरफ होता है, ऐसा व्यकित विद्वान होता है।

7. पंचमेश बली होकर पंचम भाव या केन्द्र में सिथत हो तो जातक अध्यापक होता है।

8. बुध स्वराशि में या सिंह राशि में हो और पंचम भाव में बुधादित्य योग हो तो जातक अध्यापक होता है।

9. पंचमेश पंचम भाव में और बुध गुरू की युति एकादश भाव में हो तो जातक डिग्री कालेज या विश्वविधालय में शिक्षक होता है।

10. बुध और गुरू सप्तम या दशम भाव सूर्य द्वितीय भाव में हो तो जातक शिक्षक होता है।

11. शुक्र सातवें, सूर्य पांचवें एवं गुरू दसवें भाव में हो तो जातक शिक्षक बनता है।

                भारतीय संस्कृति में शिक्षक को माता, पिता, गुरू के समान आदरणीय एवं ब्रह्राा, विष्णु, महेश के समान पूज्यनीय माना गया है, ज्ञान को वितरित करने वाला शिक्षक गुरू के रूप में सदा ही वन्दनीय रहा है। शिक्षक का नाम आते ही ज्योतिष जगत में देवगुरू बृहस्पति का स्मरण आता है। वास्तव में, गुरू का सम्बंध देवगुरू बृहस्पति से है, जो ज्ञान के भंडार हैं, भारतीय ज्योतिष में बृहस्पति (गुरू) को समस्त ग्रहों में अत्यंत शुभ, ज्ञान का प्रदाता और मानव का परमहितैषी माना गया है। गुरू को देवताओं का गुरू अर्थात देवगुरू नाम से भी जाना जाता है। यदि जन्मपत्रिका में बृहस्पति ग्रह अच्छी सिथति में हो, बलवान होकर केन्द्र में हो तो व्यकित की हजारों अनिष्ट से रक्षा करने की साथ ही ज्ञान का भंडार भर देता है, इसलिए एक अच्छे शिक्षक की कुण्डली में बृहस्पति (गुरू) की सिथति अत्यंंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जन्मपत्रिका में शिक्षक अथवा गुरू नवें भाव से देखे जाते हैं तथा शिष्य पंचम भाव से देखे जाते हैं। पंचम तथा नवम भाव के स्वामी ग्रहों और उनकी सिथति ही गुरू-शिष्य परम्परा का बोध कराती है, अत: यह आवश्यक हो जाता है कि जन्मपत्रिका में यदि पंचम भाव बली और शुभ हो तो शिष्य अपने गुरू को बहुत आगे ले जाएगा और नवम भाव बली हो तो गुरू भी शिष्य को भरपूर स्नेह देंगे और अपना ज्ञान और अनुभव उसे दे देंगें।

उपाय - शिक्षा जगत में पानी हो सफलता तो गुरू बृहस्पति को करें बलवान - ज्ञान, विधा की वृद्धि हेतु देवी-देवताओं में मां सरस्वती की और नवग्रहों में देवगुरू बृहस्पति की आराधना परमश्रेयस्कर मानी गर्इ है। जो लोग शिक्षा जगत में मान-सम्मान, यश-कीर्ति पाना चाहते हैं, उन्हें जन्मकुण्डली के अनुसार पुखराज रत्न अथवा योगकारक ग्रह का रत्न उसी ग्रह से सम्बनिधत वार में अवश्य धारण करना चाहिए। काले तथा नीले रंग के परिधान का प्रयोग कम से कम कर पीले रंग का प्रयोग सर्वाधिक करना चाहिए। बृहस्पति यंत्र की स्थापना गुरूवार के दिन विधाअध्ययन के स्थान पर करनी चाहिए तथा प्रत्येक बृहस्पतिवार को गाय को बेसन के लडडू, केला खिलाकर आशीष लेना चाहिए तथा केले के वृक्ष के नीच देसी घी का दीपक जलाने से ज्ञान की लौ हमेशा प्रज्जवलित रहेगी।

 

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