Friday, November 24, 2017
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piter

लोक व्यवहार में मनुष्य एकाग्र चित्त होकर श्राद्धपक्ष में पितरों के प्रति समर्पित हो सकें, इसलिए इस काल में सांसारिक कामों से दूर रहने की बात कही गर्इ है।

गुरूवार 19 सितम्बर 2013 से महालय अर्थात पितरों को श्रद्धांजलि देने का सुअवसर प्रारम्भ हो रहा है। श्राद्धकर्म का प्रारम्भ पूर्णमासी के श्राद्ध से होकर पितृ विसर्जनी अमावस्या तक चलता है। जिस तिथि को पूर्वज दिवंगत हुए हों, उनकी तिथि जानकर श्राद्ध करने का विधान शास्त्रों में वर्णित है।

                प्रत्येक शुभ कार्य के प्रारम्भ में माता-पिता, पूर्वजों को नमन करने का संस्कार भारतीय संस्कृति में विधमान है। घर, व्यापारिक स्थल या शुभ कार्यों की सफलता के लिए पितरों के प्रति सम्मान और उनका आशीर्वाद लेना अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि धर्मशास्त्रों के अनुसार पितृ तृपित के बिना देवता भी आशीर्वाद नहीं देते। देवी-देवता भी प्रतीक्षा करते हैं कि कब पितरों की आज्ञा हो और निवेदक को सुफल प्रदान करें। पितृ श्राद्ध पर केवल भोजन दान मात्र से ही खुश नहीं होते, वे यह भी देखते हैं कि हमारे परिवार वाले पूर्वजों के लिए क्या कर रहे हैं, दिवंगत होने के इतने वर्ष व्यतीत होने के बाद भी किस प्रकार का भाव उनके वंशजों के भीतर विधमान है। सच्ची श्रद्धा से अर्पित की गर्इ कोर्इ वस्तु को पितृदेव खुशी से ग्रहण कर तृप्त हो जाते हैं। पितृपक्ष में खरीददारी करें, ऐसा किसी प्रमाणित ग्रंथ में उलिलखित नहीं है, हां, यह जरूर है कि पूरे साल में मात्र एक पक्ष ही पितरों को श्रद्धांजली, पिण्डदान आदि के लिए दिए गए हैं, अत: सम्पूर्ण वर्ष के 15 दिन भी सांसारिक मोहमाया का त्याग कर पितरों का स्मरण कर सकें तो हम कैसी संतानें हैं क्योंकि आज हम सब जहां पर जिस भी मोड़ पर खड़े हैं, वह हमारे पूर्वजों की मेहनत एवं प्रयास की ही देन है। सामाजिक विरासत के तौर पर पितृपक्ष को हम एक प्रकार से पितरों का सामूहिम मेला भी कह सकते हैं। पितृपक्ष में जो भी हम पितरों के निमित्त निकालते हैं, वह उसे सूक्ष्म रूप में आकर ग्रहण करते हैं क्योंकि श्राद्धपक्ष में पितृगण अपने-अपने स्वजनों के यहां बिना आहवान किए पहुंचते हैं और पंद्रह दिनों तक वहीं विधमान रहते हैं इसलिए लोक व्यवहार में खरीददारी आदि करने की बजाए हिन्दुओं के अधिकांश घरों में पितरों को प्रसन्न करने के लिए दान-पुण्य कर्म किए जाते हैं। लोक व्यवहार में मनुष्य एकाग्र चित्त होकर श्राद्धपक्ष में पितरों के प्रति समर्पित हो सकें, इसलिए इस काल में सांसारिक कामों से दूर रहने की बात कही गर्इ है। हिन्दु संस्कृति में श्राद्ध जिसे श्राद्धपक्ष अथवा पितृपक्ष भी कहते हैं, का नाम आते ही व्यकित को अपने दिवंगत पूर्वज याद आने लगते है, इसलिए भी कुछ लोग खरीददारी आदि करके दान पुण्य श्राद्धकर्म में अपना समय व्यमीत करते हैं। पितृगण चंद्रमा के पृष्ठ भाग पर वास करते हैं, वे अत्यन्त शकितशाली होते हैं परन्तु उन्हें जल उपलब्ध नहीं होता और ग्रंथों के प्रमाणानुसार श्राद्ध पक्ष आने पर वे अपने पुत्र-पौत्र कुटुमिबयों से कामना करते हैं कि वे उन्हें जल प्रदान करेंगें। इस आशा में वे सूर्योदय से सूर्यास्त तक श्राद्ध पक्ष में प्रतिदिन अपने परिवारजनों के द्वार पर खड़े रहते हैं। एक अंजुलि जल यदि मंत्रपूर्वक, सविधि उन्हें दे दिया जाए तो उनसे वे एक वर्ष तक तृप्त हो जाते हैं और आर्शीवाद देकर, प्रसन्न होकर प्रस्थान करते हैं, जिसके फलस्वरूप घर में सभी लोगों मंगल कार्य सम्पन्न होने लगते हैं। भारतीय परम्परा में तीन ऋणों से मुक्त होने को मनुष्य का कर्तव्य कहा गया है, अत: साल में कम से कम 15 दिन ही सही, पितरों के प्रति श्रद्धाभाव से पितृयज्ञ करना चाहिए। हमारे पितृ जब हमारे घर से खुश होकर अपने धाम को जाऐंगें तो ऐसा आशीर्वाद देकर जाऐंगें, जिसे आप देख तो नहीं सकेंगें, परन्तु महसूस जरूर करेंगें।

श्राद्धपक्ष में क्या करें, क्या करें - श्राद्धकर्ता को ब्रह्राचर्य का पालन अवश्य करना चाहिए, दूसरे के घर का अन्न श्राद्धकाल में ग्रहण नहीं करना चाहिए तथा श्राद्धकर्म वाले दिन यात्रा को भी वर्जित बताया गया है। इसी प्रकार मांसभक्षण, धूम्रपान, लोहे मिटटी के बर्तनों का प्रयोग करें। श्राद्ध के दिन जिन कार्यों की मनाही है, उनका ध्यान रखना भी जरूरी है अन्यथा विफलता का भय रहता है।

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