Friday, November 24, 2017
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dala chath

दीपावली के ठीक छ: दिन बाद मनाए जाने वाले छठ महापर्व का विशेष वैज्ञानिक आधार है। छठ पूजा ही एक्मात्र ऐसा त्योहार है जिसमें डूबते सूर्य को अघ्र्य दिया जाता है।

सूर्य की शक्ति जिीवन का प्रतीक मानी जाती है। सूर्य भगवान की उपासना करने से दीर्घायु मिलती है, तेजस्वी पुत्र की प्रापित, घर-परिवार की सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है एवं कुष्ठ रोग जैसी बीमारियों का भी निवारण होता है। छठ पर्व की परंपरा में बहुत ही गहरा विज्ञान छिपा हुआ है, षष्ठी तिथि एक विशेष खगोलीय अवसर है। उस समय सूर्य की पराबैगनी किरणें पृथ्वी की सतह पर सामान्य से अधिक मात्रा में एकत्र हो जाती हैं। उसके संभावित कुप्रभावों से मानव की यथा संभव रक्षा करने का सामर्थय इस परंपरा में है। पर्व पालन से सूर्य (तारा) प्रकाश (पराबैगनी किरण) के हानिकारक प्रभाव से जीवों की रक्षा संभव है। पृथ्वी के जीवों को इससे बहुत लाभ मिल सकता है। सूर्य के प्रकाश के साथ उसकी पराबैंगनी किरणें भी पृथ्वी, चन्द्रमा सहित अन्य लोकों में जाती है। खगोलशास्त्र के अनुसार सूर्य का प्रकाश जब पृथ्वी पर पहुंचता है, तो पहले उसे वायुमंडल मिलता है। वायुमंडल में प्रवेश करने पर उसे आयन मंडल मिलता है। पराबैगनी किरणों का उपयोग कर वायुमंडल अपने ऑक्सीजन तत्त्व को संश्लेषित कर उसे उसके एलोट्रोप ओजोन में बदल देता है। इस क्रिया द्वारा सूर्य की पराबैंगनी किरणों का अधिकांश भाग पृथ्वी के वायुमंडल में ही अवशोषित हो जाता है। पृथ्वी की सतह पर केवल उसका नगण्य भाग ही पहुंच पाता है। सामान्य अवस्था में पृथ्वी की सतह पर पहुंचने वाली पराबैंगनी किरण की मात्रा मनुष्यों या जीवों के सहन करने की सीमा में होती है। अत: सामान्य अवस्था में मनुष्यों पर उसका कोर्इ विशेष हानिकारक प्रभाव नहीं पडता, बलिक उस धूप द्वारा हानिकारक कीटाणु मर जाते हैं, जिससे मनुष्य या जीवन को लाभ ही होता है। छठ जैसी खगौलीय सिथति (चन्द्रमा और पृथ्वी के भ्रमण तलों की सम रेखा के दोनों छोरों पर) सूर्य की पराबैंगनी किरणें कुछ चंद्र सतह से परावर्तित तथा कुछ गोलीय अपवर्तित होती हुर्इ, पृथ्वी पर पुन: सामान्य से अधिक मात्रा में पहुंच जाती हैं। वायुमंडल के स्तरों से आवर्तित होती हुर्इ, सूर्यास्त तथा सूर्योदय को यह और भी सघन हो जाती है। छठ पूजा के इतिहास की ओर दृषिट डालें तो इसका प्रारम्भ महाभारत काल में कुंती द्वारा सूर्य की आराधना व पुत्र कर्ण के जन्म के समय से माना जाता है। मान्यता है कि छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए जीवन के महत्वपूर्ण अवयवों में सूर्य व जल की महत्ता को मानते हुए, इन्हें साक्षी मान कर भगवान सूर्य की आराधना तथा उनका धन्यवाद करते हुए मां गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या पोखर (तालाब) के किनारे यह पूजा की जाती है। वाल्मीकि रामायण में ऋषि अगस्त्य द्वारा आदित्य ह्रदय स्तोत्र के रूप में सूर्यदेव का जो वंदन और स्तवन किया गया है, उससे उनके सर्वदेवमय-सर्वशक्तिमिन तथा दैदीप्यमान स्वरूप का बोध होता है।

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