Friday, November 24, 2017
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doom s day

21 दिसम्बर 2012, ज्योतिष के अनुसार प्रलय की सम्भावनाएँ नहीं

शुक्रवार, 21 दिसम्बर 2012, मार्गशीर्ष, शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि, इस दिन को माया कैलेण्डर का हवाला देते हुए पशिचम के कुछ स्वयंभु भविष्यवेत्ताओं ने दुनिया के खत्म होने का दिन यानि महाप्रलय का दिन घोषित किया है। नास्त्रेदमस की भविष्यवाणियां, माया सभ्यता का कैलेण्डर, बाइबिल, दानिययेल की किताब का हवाला देते हुए दुनिया का अंत करीब होने की भविष्यवाणियां की जा रही हैं, प्रलय 2012 जैसी काल्पनिक फिल्म भी प्रदर्शित हो चुकी हैं।

धर्मशास्त्र और ज्योतिषशास्त्र दोनों महाशास्त्रों के अनुसार अभी प्रलय का समय नहीं आया है, प्रकृति अपने हिसाब से चल रही है और चलती रहेगी। वेद-पुराणों के अनुसार चार युगों, सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलयिुग का जिक्र आता है, वर्तमान में कलियुग का प्रथम चरण चल रहा है, इसके चार लाख बत्तीस हजार वर्षों का प्रमाण मिलता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार अभी 5113वां वर्ष चल रहा है, इस हिसाब से अभी करीब चार लाख अटठाइस हजार वर्ष बाकी हैं तथा कलिक अवतार भी शेष है, अत: महाप्रलय का प्रश्न ही नहीं उठता। दुनिया खत्म होने के लक्षणों पर विचार करें तो शास्त्रों के अनुसार कलियुग के अन्त में पृथ्वी से गंगा जी लुप्त हो जाएंगीं तथा विष्णु भगवान भी पृथ्वी छोड़कर चले जाएंगे। मां गंगा ने स्वयं भागीरथ को वचन दिया था कि जब तक गुरू, आकाश, देवता एवं तुलसी की पृथ्वी पर पूजा होती रहेगी, समुद्र में बड़वानल रहेगा तब तक मैं तुम्हारे चले हुए मार्ग में पृथ्वी पर रहूंगी। उपर कथित सिथतियां कलियुगान्त में उत्पन्न होंगीं, समग्र कलियुग में नहीं। जब पृथ्वी से धर्म विदा हो जाएगा, अधर्म बढ़ेगा तब कलिक अवतार होगा। अपने हर युग में अवतार लेने के बारे में गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं,

परित्राणाय साधुनाम विनाशय च दुष्कृताम। धर्मसंस्थापनार्थायं सम्भवामि युगे युगे।।

21 दिसम्बर 2012 के दिन किसी भी तरह का अशुभ, अमंगल होने का संकेत सौरमंडल के ग्रह नक्षत्रों की गति, परिवर्तन आदि द्वारा नहीं प्राप्त हो रहा है। माया सभ्यता में 21 दिसम्बर 2012 के बाद विश्व का कैलेण्डर नहीं बना है, माया सभ्यता की भविष्यवाणी के अनुसार 21 दिसम्बर 2012 प्रलय की तारीख है, इस दिन विश्व का अंत हो जाएगा, कैलेण्डर के अनुसार धरती की वर्तमान सभ्यता समूल रूप से नष्ट हो जाएगी। 21 दिसम्बर 2012 की कुण्डली का अध्ययन करने से स्पष्ट रूप से प्रलय आदि की कोर्इ सम्भावनाएं नहीं दिख रहीं। सूर्योदयकालीन कुण्डली के अनुसार इस दिन चन्द्रमा मीन राशि में सिथत होगा, साथ ही शनि तुला राशि में लाभ स्थान पर उच्चस्थ होगा तथा मंगल मकर राशि में द्वितीय स्थान पर उच्चस्थ रहेगा। वक्री गुरु छठे भाव में केतु के साथ रहेगा। राहु, बुध, शुक्र की युति व्यय स्थान पर वृशिचक राशि में होगी। 21 दिसम्बर 2012 को शुक्रवार है, चन्द्रमा गुरु की मीन राशि में है। अंकों की गणना के अनुसार भी 21 दिसम्बर 2012 को कोर्इ अशुभ सिथति नहीं बन रही है। इस दिन का मूलांक 3 है जिसका स्वामी ग्रह बृहस्पति है जो कि शुभ ग्रह है और इस दिन का भाग्यांक 2 है जिसका स्वामी ग्रह चन्द्रमा है जो कि सौम्य ग्रह है। 21 तारीख का तीन, साथ में दिसम्बर का तीन, और 2012 में 12 का तीन भी तीनों तरीके से बृहस्पति के शुभ प्रभाव को इंगित करा रहा है। नवमांश एवं अन्य वर्ग कुण्डली के अध्ययन से पता चलता है कि सभी ग्रहों की सिथति में कोर्इ अनिष्टकारी परिवर्तन नहीं हो रहा है, अत: 21 दिसम्बर 2012 को ऐसे अनिष्ट की कल्पना ही नहीं की जा सकती। श्रीमदभाग्वत के अनुसार समस्त जगत की उत्पत्ति, सिथति और प्रलय के कारण ब्रह्राा जी हैं। एक सृषिट की समय अवधि को कल्प कहते हैं। कल्प का अर्थ है भारतीय परम्परानुसार सतयुग, द्वापरयुग, त्रेतायुग, कलियुग इन युगों को एक महायुग या चतुयर्ग कहते हैं और ऐसे एक हजार महायुगों का एक कल्प अर्थात ब्रह्रा जी का एक दिन कहलाता है तथा 360 कल्पों में ब्रह्राा जी का एक वर्ष होता है एवं 360 गुणा 100 यानि 36000 कल्पो में ब्रम्हांड जी की आयु पूरी होती है। एक कल्प अर्थात एक हजार महायुगों में चौदह मन्वंतर होते हैं। एक हजार महायुगों का एक मन्वंतर होता है। इन चौदह मन्वंतरों के नाम इस प्रकार से हैं, स्वाम्भुव, स्वरोचिष, उत्तम, तामसे, रैवत, चाक्षुष, वैवस्वत, सावर्णिक, दक्षसावर्णिक, ब्रहमसावर्णिक, धर्मसावर्णिक, रूद्रसावर्णिक, देवसार्णिक और इन्द्रसावर्णिक। इस समय वैवस्वत नामक सातवाँ मन्वंतर चल रहा है तथा छ: मन्वंतर बीत चुके हैं। एक मन्वंतर के एक हजार महायुगों में से सत्तार्इस महायुग बीत चुके हैं। 28वें महायुग के तीन युग सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग बीत गए हैं तथा कलियुग का प्रथम चरण चल रहा है। भारतीय पुराणों के अनुसार 43 लाख 20 हजार सौर वर्षों का एक महायुग होता है। इस अवधि में ही सतयुग, त्रेता, द्वापर कलियुग इन चार युगों का क्रम चलता है। इन वर्षों में 17 लाख 28 हजार वर्षों का एक सतयुग, 12 लाख 96 वर्षों का एक त्रेतायुग, 8 लाख 64 वर्षों का एक द्वापर युग एवं 4 लाख 32 हजार वर्षों का एक कलयुग होता है। वर्तमान समय में ब्रह्रा जी का द्वितीय प्रहर एवं कलियुग का प्रथम चरण व्यतीत हो रहा है। इस प्रकार 21 दिसम्बर 2012 विश्व का आखिरी दिन नहीं है।

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