Saturday, November 25, 2017
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makar sankranti

ऋतुपर्व 'मकर संक्रानित भारत के वैदिककालीन पर्वो में से एक है। हिन्दुओं के प्राय: सभी व्रत-तीज-त्योहार-उत्सव, धार्मिक पर्वादि भारतीय महीनों तथा तिथियों की गणना के अनुसार मनाए जाते हैं जो कि तिथियों की वृद्धिक्षय से आगे पीछे भी पड़ सकते हैं। लेकिन 'मकर संक्रानित हर साल सदैव चौदह जनवरी को ही पड़ती है। 'मकर राशि में सूर्य के प्रवेश करने को ही 'मकर संक्रानित कहते हैं। भारतीय ज्योतिष एवं खगोल शाल के अनुसार मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृषिचक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन, यह बारह राशियाँ हैं। सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करने को 'संक्रानित कहते हैं। सूर्य करीब एक माह, एक राशि में रहता है। इसीलिए संक्रानित प्रत्येक माह में पड़ती है किन्तु मकर और कर्क राशियों का संक्रमण विशेष महत्वपूर्ण होता है।

मकर संक्रानित से सूर्य उत्तरायण और कर्क संक्रानित से दक्षिणायन हो जाता है। उत्तरायण में दिन बड़े होने लगते हैं प्रकाश तथा उष्मा की वृद्धि होती है। राते दिन की अपेक्षा छोटी होने लगती है। ठीक इसके विपरीत दक्षिणायन में होता है। धर्मशालों के अनुसार 'उत्तरायण की अवधि देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन देवताओं की रात्रि है। देवताओं के दिन उत्तरायण में नूतन गृह प्रवेश, निर्माण, देवप्रतिष्ठा, साधन, सकाम यज्ञादि अनुष्ठानों के लिए प्रशल कहा गया है। यहाँ तक कि मृत्यु तक के लिए भी उत्तरायण की विशेषता शालों में वर्णित है। गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं -

अगिन ज्र्योतिरह: शुक्ल षष्मासा उत्तरायणम।
तत्र प्रयाता गच्छनित ब्रह्रा ब्र्रह्राविदो जना:।।
(गीता अध्याय 8, श्लोक 24)

अर्थात जो ब्रह्रावेत्ता योगी, उत्तरायण सूर्य के 6 माह, दिन के प्रकाश, शुक्लपक्षादि में प्राण छोड़ता है, वह ब्रह्रा को प्राप्त होता है। वैदिक काल में उत्तरायण को 'देवयान तथा दक्षिणायन को 'पितृयान कहा जाता था। उत्तरायण सूर्य का महत्व महाभारत का यह प्रसिद्ध आख्यान बताता है। जब भीष्म पितामह युद्ध में क्षत-विक्षत होकर बाणों की शैयया पर मृत्यु के निकट, अपने जीवन की अंतिम साँसे ले रहे थे तो पाण्डवों में सहदेव (जो कि ज्योतिष विधना के अच्छे ज्ञाता थे) के कहने पर कि इस समय अभी दक्षिणायन चल रहा है। भीष्म पितामह ने अपने प्राणों को दो-तीन माह मात्र उत्तरायण की प्रतीक्षा में रोक रखा और मकर समाप्त हो जाने के बाद उत्तरायण में माघ शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को ही देह त्याग किया। ऐसी मान्यता है कि मकर संक्रानित के दिन यज्ञ में दिए गए दृश्य को ग्रहण करने के लिए देवता धरती पर अवतरित होते हैं। इसी मार्ग से पुण्यात्माएँ शरीर को छोड़कर स्वर्गादि लोकों में प्रवेश करती है। इसलिए मकर संक्रानित आलोक का अवसर माना गया है। इस अवसर पर प्राय: सर्वस खिचड़ी, पापड़, तिलकुट आदि का भोजन करने की कथा प्रचलित है। उत्तर प्रदेश में इस उत्सव को 'खिचड़ी कहते हैं। इस दिन खिचड़ी खाने तथा खिचड़ी-तिल का दान विशेष महत्व रखता है। पंचाब में यह पर्व संक्रानित के एक दिन पूर्व 'लोहड़ी के नाम से मनाया जाता है। तमिलनाडु, आंध्र आदि दक्षिण के प्रदेशों में मकर संक्रानित पर्व 'पोंगल के नाम से प्रचलित है। धर्मशालों के कथानुसार इस दिन स्नान, पुण्य, दान, जप, धार्मिक अनुष्ठानों का बहुत महत्व है। कहा जाता है इस अवसर पर दिया हुआ दान 'पुनर्जन्म होने पर सौ गुणा होकर प्राप्त होता है। संगम के पावन तट पर इस दिन हजारों श्रद्धालुओं को स्नान, दानादि द्वारा पुण्यार्जन करते देखा जा सकता है। पौराणिक ग्रंथों में तिल के तेल से स्नान, तिल का उबटन लगाना, तिल से होम करना, तिल का जल पीना, तिल से बने पदार्थ खाना और तिल का दान देना ये 6 कर्म तिल से ही होना का विधान मिलता है। इसके अतिरिक्त चंदन से अष्टदल का कमल बनाकर उसमें सूर्य नारायण की मूर्ति स्थापित करके उनका अवाध्रादि क्रम से विधिपूर्वक पूजन करना चाहिए। इस मास में घी और कम्बल देने का विशेष महात्म्य है। कहा जाता है कि यशोदा जी ने इस दिन कृष्ण के जन्म के लिए व्रत किया था। शीत के निवारण के लिए तिल, तेल तथा तूल का महत्व अधिक है। इसीलिए भारतीय प्राचीन वैज्ञानिक ऋषि महर्षियों ने इस पर्व पर तिल से स्नान, उबटन, हवन, भोजन, दानादि का विधान बनाया है।

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