Saturday, November 25, 2017
User Rating: / 0
PoorBest 

manna dey RIP

हिंदी और बंगाली गायिकी के अद्वितीय सितारा मन्ना डे ने कहा था-- आवाज तो ईश्वरीय देन होती है, लेकिन मैंने इसे बेहतर बनाने के लिए कड़ी मेहनत की। मुझे लगता है कि मेरी आवाज और मेरे अंदाज ने मुझे यहां तक पहुंचाया कि आसानी से कोई मेरी नकल नहीं कर पाता।

 

       सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंचने के लिए व्यावहारिक होना भी आवश्यक है, यहीं वे मात खा गये। उनकी असफलता से मैंने बहुत कुछ सीखा। मेरी समझ में आ गया कि एक निर्माता अपनी फिल्म में इतना पैसा लगाता है तो वह अपने समूह के हर व्यक्ति से यह आशा करता है कि उसे सफल बनाने के लिए वह पूरी कोशिश करे। और पूरी कोशिश करने का मतलब होता है प्रतिभावान होना और नयापन लाने की क्षमता रखना, इन गुणों के बिना एक कलाकार यूं ही खो जाता है और कहीं का नहीं रहता।

       ऊपर गगन विशाल..इस गीत की धुन आज भी मेरे मतिष्क में अविरल बजती जा रही है, एक तरह की मानसिक विषमता का रूप लेती जा रही है। ये धुन मुंबई में मेरे शुरुआती दिनों की याद वापस ले आयी है, जब मैं मुंबई के फिल्म उद्योग में एक गायक के रूप में अपने पैर जमाने के लिए संघर्ष कर रहा था। स्मृतियां व्यक्ति को जीवन के प्रति साकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने में उपयोगी सिद्ध होती हैं। क्योंकि आज मैं जिस पदवी पर प्रतिष्ठित हूं, भारत सरकार द्वारा राष्ट्र गायक की उपाधि के सर्वोच्च सम्मान से विभूषित उसके समक्ष पुरानी कठिनाईयां एवं असफलताएं धूमिल होकर नगण्य हो जाती हैं। अंतत: यही सार तत्व है।

       छोटे-छोटे पुरस्कार जो हर बार किसी व्यावसायिक बाधा को पार करने की सफलता के लिए, वे प्रेरक के रूप में, मुझे अपने व्यवसाय में आगे बढ़ने में सहायक हुए। एक फिल्म के लिए सुरैया के साथ युगल गीत पहले ही गा लेने के बावजूद अत्यंत सफल लोकप्रिय फिल्म राम राज्यमें वाल्मिकी के चरित्र नायक के लिए अपने पाश्र्व गायन के अनुभव को मैं बहुमूल्य मानता हूं, क्योंकि पाश्र्व गायन में मेरी क्षमता इसी से स्थापित हुई। इस प्रस्ताव के आने से पहले मुंबई के फिल्म उद्योग में मेरी कोई खास जगह नहीं बन पायी थी। और वास्तव में मैं बंगाली गीत गाने के विकल्प पर  विचार कर रहा था। किंतु राम राज्यकी सफलता के बाद स्थिति एकदम बदल गयी और मैंने आगे बढ़कर मुंबई में काम करने का खतरा मोल लेना प्रारंभ कर दिया।

       मेरा भाग्य अच्छा रहा कि मुझे उस समय के प्रसिद्ध संगीत निर्देशकों के साथ काम करने का दुर्लभ अवसर प्राप्त हुआ। उनमें से शायद सचिन देव बर्मन और उनकी स्वर लिपियां, पाश्र्व गायक के रूप में मेरी आरंभिक सफलता में सहायक सिद्ध हुईं। सचिन दा एकदम सीधे साधे सरल व्यक्ति थे। एक दिन, रात के करीब नौ बजे, रात के खाने के बाद वे आये। वे बोले, ‘जल्दी से अपना हारमोनियम ले आओ और इसे लिखे। कल ही यह गीत रिकॉर्ड करो। याद रखना यह राग अहीर भैरव पर आधारित है सो जितनी अच्छी तरह कर सको इस धुन में कुछ नयापन लाना होगा।उस धुन को लिख कर सुनाने के बाद ही सचिन दा को आराम मिला। अगले दिन ही मैंने उस गीत को रिकॉर्ड करा दिया, ‘पूछो ना कैसे मैंने रैन बिताई,’ जिसे तात्कालिक सफलता मिली।

हिन्दुस्तान में प्रकाशित मन्ना डे की आत्मकथा यादें जी उठी’ (पेंगुइन बुक्स इंडिया) से साभार

Add comment

We welcome comments. No Jokes Please !

Security code
Refresh

Books

Who's Online

We have 1596 guests online
 

Visits Counter

751094 since 1st march 2012