Thursday, November 23, 2017
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mahabodhi temple

बोधगया के महाबोधि मंदिर में हुए धमाके से पूरी दुनिया हैरान है। ये वो स्थान है जहां दुनिया को अहिंसा और प्रेम का संदेश देने वाले गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। बुद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए ये मंदिर सबसे बड़ा तीर्थ है। कैसे ये हमला बुद्ध की शिक्षा का सबसे बड़ा अपमान है, आखिर क्या है बुद्ध की कथा और महाबोधि मंदिर का महत्व...

                बिहार के बोधगया में उस मंदिर में बम धमाके हुए जिसका रिश्ता अहिंसा के दर्शन को जन्म देने वाले से है। वो जगह खून से सन गई जहां एक पीपल के वृक्ष के नीचे 2600 साल पहले वैरागी राजकुमार गौतम को बोध प्राप्त हुआ था। ये वो जगह है जहां ऐसा ज्ञान प्रस्फुटित हुआ जो हजारों साल बाद भी दुनिया को आलोकित कर रहा है। ये वो जगह है जिसने गौतम को बुद्ध बनाया। इस मंदिर का शिखर, भारत दार्शनिक परंपरा की ऊंचाई का गवाह है। लेकिन पागलपन में हर तर्क बेमानी हो जाता है। वरना बोधगया के मंदिर में धमाके करने वालों के हाथ जरूर कांपते। वे नहीं जानते कि उन्होंने क्या किया है। बोधगया मंदिर के मुख्य पुजारी भंते चालिंदा ने बताया कि यहां पर भगवान बुद्ध आए थे और उनको यहां ज्ञान प्राप्त हुआ था। कोई भी किस प्रकार का पाप क्रम ना करके पुण्य संचय करना है और अपने मन को पवित्र रखना है। ये भगवान बुद्ध का उपदेश है।

यहां वहीं पीपल का वृक्ष है जिसके नीचे उनको ज्ञान प्राप्त हुआ था। इसलिए जितने भी बौद्ध धर्म के अवलंबी है, उनके लिए पीपल का पत्ता भी बहुत महत्वपूर्ण है। दुनिया में जहां-जहां बौद्ध धर्म के अवलंबी हैं वहां एक पत्ता भी लाखों रुपए में बिकता है। यहां से लोग इसे लेकर जाते हैं। बौद्ध धर्म के अवलंबियों के लिए ये सबसे पवित्र जगह है। इस मंदिर का निर्माण 2 से ढाई हजार साल पहले हुआ था। भारत में कोई ऐसा मंदिर नहीं है जो दुनिया में इतना प्रसिद्ध हो। वाकई दुनिया ये सोच के हैरान है कि दुनिया को रोशनी देने वाले इस बोधस्थान से किसकी क्या दुश्मनी हो सकती है। ये वही जगह है जहां वैशाख पूर्णिमा की रात सात हफ्ते से हड्डियां गला रहे गौतम को ज्ञान का वो मार्ग सूझा जो आज भी विचार मात्र से मन की उथल-पुथल को शांत कर देता है।

                भारत का स्वतंत्रता आंदोलन। महात्मा गांधी के नेतृत्व में देश अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़ा हुआ। लेकिन उस दौरान एक महान शख्सियत और थी, जो दोहरी गुलामी का सवाल उठा रही थी। वे थे डॉ. भीमराव अंबेडकर। उन्होंने हिंदू धर्म में मौजूद ऊंच-नीच, जांति-पाति का सवाल बेहद तीखेपन से उठाया। उनके मुताबिक दलित और पिछड़ी जातियों में बंटा शूद्र समाज विदेशी शासन के साथ-साथ देशी वर्णव्यवस्था का भी गुलाम है। उनके लिए देशी गुलामी को खत्म किए बिना आजादी अधूरी रहेगी। शुरुआत में डॉ. अंबेडकर ने हिंदू धर्म में सुधार की तमाम कोशिशें कीं। लेकिन हार गए। आखिरकार उन्होंने 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर की दीक्षाभूमि में पांच लाख समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। ये एक युगांतकारी घटना थी।

                इस लिहाज से वे भारत के अकेले विचारक माने जा सकते हैं जिनके विचारों के समाने सरहदें बेमानी हो गईं। ढाई हजार साल बाद की दुनिया को देने के लिए बुद्ध के पास बहुत कुछ है। जी हां, ये किस्सा ढाई हजार साल पुराना है। ईसा से 623 साल पहले की बात है। आज के नेपाल और भारत की सीमा पर कोशल राज के अधीन शाक्यों का एक गण था। शाक्यों के राजा थे शुद्धोदन जिनकी पत्नी माहामाया ने राजधानी कपिलवस्तु से कुछ दूर लुंबिनी वन में एक पुत्र को जन्म दिया। नाम रखा गया गौतम, जिसे बाद में सिद्धार्थ भी कहा गया। लेकिन सात दिन बाद ही महामाया का देहांत हो गया। ज्योतिषियों ने घोषणा की कि या तो ये बालक चक्रवर्ती सम्राट बनेगा या फिर महान वैरागी। शुद्धोदन घबरा गए। उन्होंने पूरी कोशिश की कि गौतम पूरी तरह रास-रंग में डूबे रहें। उनपर दुख की परछाईं भी न पड़े। उम्र बढ़ने के साथ-साथ गौतम सिद्धार्थ को लेकर उनकी ये सतर्कता बढ़ती गई। 16 वर्ष की उम्र में गौतम का शाक्य कन्या यशोधरा के साथ विवाह कर दिया गया। राजा शुद्धोदन ने सिद्धार्थ के भोग-विलास का भरपूर प्रबंध किया। ऋतुओं के हिसाब से महल बनवाए, जहां नाच-गाने और मनोरंजन की भरपूर चीजें जुटाई गईं। दास-दासियों की फौज राजकुमार की सेवा में रात-दिन जुटी रहती थी। लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद सिद्धार्थ का मन भोग-विलास में रम नहीं पा रहा था।

                एक दिन राजकुमार सिद्धार्थ रथ में बैठकर सैर के लिए जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने एक बेहद बूढ़े आदमी को देखा। कांपता शरीर टेढ़ा पड़ गया था। न मुंह में दांत बचे थे और न सर पर बाल। एक लाठी के सहारे वो कांपता हुआ आगे बढ़ रहा था। सिद्धार्थ ने अपने सारथी सौम्य से उसके बारे में पूछा। सारथी ने बताया कि कभी ये बूढ़ा भी सुदर्शन नौजवान था। सिद्धार्थ बेचैन हो गए। उन्होंने पूछा कि क्या वे भी एक दिन ऐसे ही हो जाएंगे। सारथी ने बताया कि बुढ़ापे के प्रहार से कोई नहीं बच पाता। राजकुमार सिद्धार्थ खिन्न मन से महल में लौट आए। ऐसी ही उन्हें तब हुई जब उन्होंने एक रोगी को देखा। सौम्य ने बताया कि शरीर तो रोग का घर है। एक बार वे सैर को गए तो उन्हें शवयात्रा दिखाई पड़ी। सौम्य से लोगों के रोने-पीटने की वजह पता की तो मृत्यु का मतलब समझ में आया। सारथी ने बताया कि मृत्यु के पाश से कोई नहीं बच पाएगा। सिद्धार्थ के मन में वैराग फूट पड़ा। राजा शुद्धोदन ने सुना तो उनके इर्द- गिर्द तमाम सुंदरियों को तैनात कर दिया गया। लेकिन सिद्धार्थ यही सोच रहे थे कि इन संदुरियों का रूप नष्ट हो जाने वाला है। क्या रखा है इसमें।

चौथी बार उन्होंने सैर के दौरान एक संन्यासी को देखा। शांत और गंभीर मुद्रा में संन्यासी को देखकर गौतम का मन खिल उठा। सौम्य ने बताया कि संन्यासी इसलिए प्रसन्न और शांत हैं क्योंकि उन्हें संसार से कोई लेना देना नहीं। उन्हें सभी तरह के मोह से मुक्ति पा ली है। बुद्ध को वो रास्ता सूझ गया जिसकी उन्हें तलाश थी। आखिरकार एक रात पत्नी यशोधरा और बेटे राहुल को सोता छोड़कर गौतम सिद्धार्थ घर से निकल पड़े। उस समय उनकी उम्र 29 साल थी। बौद्ध ग्रंथों में इस घटना को महाभिनिष्क्रमण कहते हैं। वे तपस्या करने लगे। लेकिन दुखों का कारण उन्हें समझ में नहीं आया। घूमते-फिरते वे गया पहुंचे। वहां एक पीपल के पेड़ के नीचे वे चिंतन-मनन में लीन हो गए। गौतम की उम्र तब 35 वर्ष थी। वैशाख पूर्णिमा की रात थी। उसी बरसती चांदनी में गौतम को बोध यानी ज्ञान प्राप्त हुआ। ये ज्ञान उस समय मौजूद तमाम अवधारणाओं की बुनियाद हिला देने वाला था।

                बुद्ध का मार्ग था- मध्यम मार्ग। बुद्ध ने चार आर्य सत्य का सिद्धांत समझ में आया। संसार में दुख है। दुख का कारण तृष्णा है। तृष्णा के नाश से दुख समाप्त होता है। तृष्णा के नाश का उपाय है आष्टांगिक मार्ग।

बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग में आठ बातें हैं- सम्यक ज्ञान- आर्य सत्यों का ठीक से ज्ञान। सम्यक संकल्प-पक्का निश्चय। सम्यक वचन-सत्य बोलना। सम्यक कर्मांत-हिंसा, द्रोह और दुराचरण से बचना। सम्यक आजीवन-न्यायपूर्ण जीविका चलाना। सम्यक व्यायाम-सत्यकर्म के लिए सतत प्रयास करना। सम्यक स्मृति-लोभ से बचना। सम्यक समाधि-राग-द्वेष से मुक्त होकर चित्त की एकाग्रता।

                बुद्ध ने धर्मचक्रप्रवर्तन यानी पहला उपदेश वाराणसी के पास मृगदाव यानी हिरनों से भरे वन में दिया। ये जगह अब सारनाथ कहलाती है। उनके विचार तत्कालीन समाज में एक क्रांति की तरह थे। ये वो समय था जब ज्ञान और दर्शन का अध्ययन विशिष्ट जातियों तक सीमित था, लेकिन बुद्ध ने अपने द्वार सबके लिए खोल दिए। संस्कृत के बजाय उस समय की जनभाषा पाली में उपदेश दिया। ताकि सबको उनकी बात समझ में आ जाए। बहुजन हिताय और लोककल्याण की भावना बौद्ध धर्म की बुनियाद थी। इसी के साथ यज्ञों और उनमें दी जाने वाली पशुबलि का विरोध करके उन्होंने तत्कालीन धर्मव्यवस्था की नींव हिला दी। सत्य, अहिंसा, प्रेम, करुणा सेवा, त्याग से परिपूर्ण जीवन की बातें एक ताजा हवा के झोंके की तरह थीं। बुद्ध ने आसान शब्दों में समझाते हुए पांच शील निर्धारित किए- हत्या न करना, चोरी न करना, व्याभिचार न करना, झूठ न बोलना, नशा न करना।

जाहिर है, बुद्ध का दर्शन मनुष्य को बेहतर बनाने का उपक्रम है। उन्होंने भाग्यवाद, अवतारवाद और पुनर्जन्मवाद जैसी मान्यताओं के विरुद्ध बुद्धि को जाग्रत करने पर बल दिया। उन्होंने ईश्वर के होने या न होने पर विचार करने को बेमानी बताते हुए सत्य पथ पर चलने की शिक्षा दी। उन्होंने भिक्षुओं को संघों में संगठित किया। उनके विचार तेजी से फैले। जगह-जगह विहार बनने लगे। बिहार राज्य का नाम भी विहारों की अधिकता से पड़ा। इसी बिहार का गया शहर तथागत बुद्ध की वजह से बोधगया के नाम से मशहूर है।

                पहली बार यह बम धमाकों की वजह से चर्चा में है, वरना शांति और ध्यान ही यहां की पहचान थी। इस मंदिर में गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त किया था इसलिए ये प्रसिद्ध है। यहां लोग को लिए यहा लोग शांति और मेडिटेशन के लिए आते हैं। गौतम बुद्ध का परिनिर्वाण 80 साल की उम्र में हो गया। लेकिन उनके विचार लगभग सदियों तक अबाध गति से फैलते रहे। मगध सम्राट अशोक के समय तो बौद्ध धर्म राजधर्म हो गया। अशोक ने दुनिया के तमाम देशों में बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए भिक्षुओं को भेजा। लेकिन फिर ऐसा समय भी आया जब वर्णव्यवस्था के पोषकों की तरफ से बौद्ध धर्म पर भीषण प्रहार हुए। एक तरफ तो बुद्ध को विष्ण का नवां अवतार घोषित कर दिया गया, दूसरी तरफ विहारों को खत्म कर दिया गया। जो बुद्ध मूर्तिपूजा के विरुद्ध थे, उन्होंने विचारों के बजाय मूर्तियों तक सीमित कर दिया गया। बौद्ध धर्म दुनिया के तमाम देशों में फैल गया, लेकिन भारत से लगभग खत्म हो गया। 20 वीं सदी में डॉ. अंबेडकर ने बुद्ध धर्म के महत्व को फिर से स्थापित किया और कारवां बढ़ने लगा। दलित आंदोलन ने राजनीति में नया तेज भरा और बुद्ध धर्म उसका वैचारिक आधार बना।

       बोधगया मंदिर पर धमाके करने वालों का जो भी इरादा रहा हो, लेकिन वे शायद ये नहीं जानते कि बुद्ध बमों से घबराते नहीं। वे बमों के बीच मुस्कराते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि हिंसा से भरे दिमाग को भी शांति की जरूरत होती है। जब धमाकों की गूंज शांत होगी, जब बारूद की गंध खत्म हो जाएगी, दुनिया लड़ते-लड़ते थक जाएगी तो फिर इंसान एक ही चीज तलाशेगा---शांति---शांति---शांति।

साभार: डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट

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