Monday, November 20, 2017
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moon guru poornima

आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि गुरू पूर्णिमा के नाम से विख्यात है क्योंकि इस दिन गुरु पूजन का विधान है। पौराणिक संदर्भों के अनुसार इस दिन महाभारत ग्रन्थ के रचयिता महर्षि वेदव्यास जी का जन्मोत्सव है। उनके सम्मान में गुरू पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। शास्त्रों के अनुसार अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को व्यकित को गुरु की संज्ञा प्रदान की गई है। जीवन में गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है।


कैसे करें गुरुपूर्णिमा व्रत -
• गुरु पूर्णिमा के दिन प्रात: घर की सफाई, स्नानादि नित्य कर्म से निवृत्त हो जाएँ।

• चौकी पर अथवा घर में ही किसी पवित्र स्थान पर पटिए पर सफेद वस्त्र फैलाकर उस पर पूर्व से पशिचम तथा उत्तर से दक्षिण गंध से बारह-बारह रेखाएँ बनाकर व्यासपीठ बनाएँ।

• तत्पश्चात 'गुरुपरंपरासिद्धयथर्ं व्यासपूजां करिष्ये मंत्र से संकल्प करें।

• इसके बाद दसों दिशाओं में अक्षत छोड़ें।

• अब ब्रह्राजी, व्यासजी, शुकदेवजी, गोविंद स्वामीजी और शंकराचार्यजी के नाम मंत्र से पूजा, आवाहन आदि करें।

• फिर अपने गुरु अथवा उनके चित्र की पूजा कर उन्हें दक्षिणा दें।

• व्यासजी द्वारा रचे हुए ग्रंथों का अध्ययन-मनन करके उनके उपदेशों पर आचरण करना चाहिए।

• इस दिन वस्त्र, फल, फूल व माला अर्पण कर गुरु को प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए क्योंकि गुरु का आशीर्वाद ही विधार्थी के लिए कल्याणकारी तथा ज्ञानवर्दधक होता है।

• इस दिन केवल गुरु (शिक्षक) ही नहीं, अपितु माता-पिता, बड़े भाई-बहन आदि की भी पूजा का विधान है।

• गुरु पूर्णिमा के दिन अपने गुरु की शरण में जाना चाहिए तथा उन्हें उत्तम वस्त्रों से सुसजिजत कर गुरु दक्षिणा श्रद्धा सुमन के रूप में अर्पित करनी चाहिए।

• ग्रन्थ लेखक विद्वान शिष्य ने यदि किसी कृति की रचना की है और वह अपने गुरु को वह कृति अर्पित करना चाहता है तो गुरु पूर्णिमा के दिन उसे वह कृति सादर अपने गुरुदेव को समर्पित कर देनी चाहिए।

• यदि कोई शिष्य संसार विरक्त सन्यासी है तो वह फल से और फल के अभाव में केवल पुष्प से निम्नलिखित मं«ा का उच्चारण करते हुए गुरु की पूजा करे-
गुरुब्र्रह्रा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर:। गुरुसाक्षात परब्रह्रा तस्मै श्री गुरुवे नम:।।

• हे गुरुदेव! आप ही ब्रह्राा हैं, आप ही विष्णु हैं, आप ही महेश्वर हैं,

• आप साक्षात परम ब्रह्रा हैं, आपको नमस्कार है।

• तत्पश्चात यदि कोई भी वस्तु गुरू को अर्पित करने के लिए उपलब्ध न हो तो गुरु की आरती उतार कर साष्टांग प्रणाम करना चाहिए।

ऋषि मुनियों ने पुराणों में गुरु महिमा का बड़ा गुणगान किया है। गुरु पूर्णिमा का पर्व हजारों साल पुराना है। आज से शताबिदयों पहले की घटना है कि 16 शास्त्रों और 18 पुराणों के रचयिता व्यासजी की शिष्य मंडली ने निर्णय किया कि गुरुजी की पूजा की जाय। व्यास जी के अनेक शिष्य थे। उनके अनेकों शिष्यों में पांच शिष्य बहुत विद्वान थे, गुरुजी की पूजा का प्रस्ताव उन्होंने ही रखा था, सभी शिष्य इस प्रस्ताव से सहमत हो गये किन्तु गुरु की पूजा किस दिन की जाय इस प्रश्न पर उन सभी में विवाद हो गया किन्तु इस विवाद ने एक सर्वसम्मत दिन गुरु की पूजा के लिए चुन लिया। सबने मिलकर निश्चय किया कि गुरु की पूजा आषाढ़ मास, शुक्ल पक्ष की पूर्णमासी को की जाय। तिथि निशिचत हो जाने के बाद जब नियत दिवस अर्थात आषाढ़ मास की पूर्णमासी का दिन आया तो बड़े हर्षोल्लास के साथ सबने मिलकर एक फूलों से सजा मंडप तैयार कर उसमें व्यास जी को सुन्दर आसन पर बिठाकर, पुष्प मालाएं अर्पित कर उनकी आरती उतारी। व्यासजी के विद्वान लेखक शिष्यों ने उन्हें अपने-अपने स्वरचित ग्रन्थ समर्पित किये। व्यास जी के विरक्त शिष्यों ने पुष्प अर्पित कर उनकी आरती उतारी। तत्पश्चात सभी शिष्यों ने अपने गुरु को साष्टांग प्रणाम किया। व्यासजी ने अपने सभी शिष्यों को शुभाशीष प्रदान किये। व्यास जी के शिष्यों ने इस उत्सव को एक परम्परा का रूप देकर बरसों तक इसका नियमित निर्वाह किया। गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु के पूजन का परम्परा ने एक पर्व का रूप ग्रहण कर लिया। तब से हमेशा ही गुरु पूर्णिमा के दिन गृहस्थ, विरक्त एवं सन्यासी सभी गुरु पूर्णिमा को अपने गुरु का पूजन कर आशीर्वाद ग्रहण करने लगे हैं। भगवान भी गुरु का महत्व बताते हुए कहते हैं कि बिना गुरु का सहयोग प्राप्त किये, मैं भी किसी को नहीं प्राप्त होता हूँ।

 

 

 

 

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