Monday, November 20, 2017
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maharishi arvind

महर्षि अरविंद की जयंती के अवसर पर उनके दर्शन और राष्ट्रवादी चिंतन की याद

        महर्षि अरविंद ने न तो किसी धर्म को जन्म दिया, न ही किसी पंथ को। उनका चिंतन एक व्यावहारिक दर्शन है, जो हर व्यक्ति के लिए सुलभ है। उसमें पाप और पुण्य की अवधारणा नहीं है, रूढ़िवादिता के लिए स्थान नहीं है, और न ही ऐसा कोई विचार या सिद्धांत है, जो अक्सर विवादों को जन्म देता हो। वह इस आत्मविश्वास को जागृत करता है कि हर प्राणी में परम सत्ता का अस्तित्व है, आवश्यकता है उसे पहचानने की। योग साधना से उसे जागृत कर परिष्कृत करने की और लोक कल्याण के मार्ग पर मोड़ देने की।

राष्ट्र के  उत्थान में विश्व के उत्थान के सूत्र जुड़े हैं और समष्टि के कल्याण से व्यक्ति के कल्याण के सूत्र जुड़े हैं। संसार से मुंह मोड़ना मोक्ष का मार्ग नहीं है। जो निर्वाण चाहते हैं, वे सांसारिक कर्मों को अवसर देते हैं कि वे मुक्ति का मार्ग बन जाएं। अरविंद की जीवन कथा प्रेरणादायी है। माता-पिता की आज्ञा मान उन्होंने  विदेश में शिक्षा प्राप्त की, लेकिन स्व:प्रेरणा से उन्होंने संस्कृत और अन्य कई भाषाएं सीखीं और भारतीय चिंतन और संस्कारों का पोषण किया। युवावस्था में ही वे क्रांति की ओर बढ़े। वंदे मातरम  के जनघोष के साथ उन्होंने भारत माता को विदेशी चंगुल से मुक्त कराने का संकल्प लिया। उन्हें कारागार भी जाना पड़ा।

        अरविंद ने 1908-09 में, प्रथम कारावास में गीता की योग साधना की। गीता के प्रथम साक्षात्कार में उन्हें लगा था कि यह संसार मिथ्या है, नश्वर है। किन्तु, दूसरे कारावास में उनकी चेतना और परिष्कृत हुई। उन्हें अनुभूति हुई कि यह संसार भी एक चेतना है, सभी प्राणियों में ईश्वर का सूक्ष्म अस्तित्व है और मनुष्य की क्रियाओं का संचालन परमसत्ता से आदेशित है इसलिए वे भी आध्यात्मिक उपलब्धि का साधन बन सकती हैं। यह रूपान्तरण योग साधना के द्वारा संभव है।

        भारतीय संविधान में जिस धर्म-निरपेक्ष, पंथ-निरपेक्ष राज्य शासन और व्यवस्था की अपेक्षा की गई है, उसकी व्याख्या अरविंद के दर्शन से सहज संभव हैं। अरविन्द की शिक्षा और साधना पद्धति विलक्षण किन्तु प्रासंगिक है। उन्हीं के शब्दों में- किसी एक धर्म विशेष को उन्नत करना, या प्राचीन धर्मों को एक साथ मिला देना या कोई नया धर्म प्रचलित करना मेरा उद्देश्य नहीं है। उनके संपूर्ण दर्शन का सार या निचोड़ है कि योग साधना के माध्यम से, व्यक्ति अपना आंतरिक विकास करे, और अपने ही अंदर की मानसिक चेतना से ऐसी उच्चतर, आध्यात्मिक व अतिमानसिक चेतना को विकसित करे जो मानव प्रकृति को रूपांतरित कर उसे दिव्य बना दे। इसी में जीवन की पूर्णता है, इसी में भागवत चेतना से मिलन है, इसी में नश्वरता से ईश्वरत्व का प्रदीपन और परिवर्तन का रहस्य छिपा है। अरविन्द का संदेश उन्हीं के शब्दों में, उन्हीं के महाकाव्य सावित्री  से कुछ इस प्रकार है- प्रकृति रहेगी बनी व्यंजन गुह्य ईश की/ परमात्मा नायक होगा मानव गतिविधि का/ पार्थिक जीवन दिव्य सुजीवन बन जाएगा।

(लेखक सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व प्रधान न्यायाधीश हैं)

साभार: हिन्दुस्तान

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