Monday, November 20, 2017
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पैठनी केवल साड़ी का नाम या विशेष प्रकार की बुनार्इ का नाम नहीं है। पैठनी एक परंपरा है जो आज भी पैठन की गलियों से निकलकर महाराष्ट्र का गौरव बढ़ाने के लिए आगे रही है। भारत के महाराष्ट्र सिथत औरंगाबाद जिले का एक छोटा सा शहर है पैठन। औरंगाबाद शहर से लगभग 50 किमी दूर यह शहर पैठनी साडि़यों का गढ़ है।पैठनी को मराठी में पैठणी कहते हैं।

 

पैठनी एक विशेष प्रकार की साड़ी है जिसका नाम पैठन शहर पर पड़ा। पैठनी आज भी पारंपरिक रूप से हाथों द्वारा बुना जाता है। यह साडि़यां महीन सिल्क से बनती हैं। पारंपरिक पैठनी साडि़यों के बार्डर में चौकोर या तिरछा डिजायन और पल्लू में मोर का डिजायन बनता है। प्लेन तथा स्पाटेड डिजायन भी बनते हैं। परंपरा का दामन छोड़ते  हुए आजकल पैठनी साड़ीयों में भी कुछ विभिन्नता देखने को मिल रही है।

पैठनी साड़ी का इतिहास -

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इस पारंपरिक साड़ी का इतिहास 2000 साल पुराना है। एक मत के अनुसार यह सातवाहन वंश के शासक शालीवाहन के काल  200 र्इसा पूर्व में प्रारंभ हुआ। दूसरे मत के अनुसार पैठनी का इतिहास यादव वंश 7 र्इसा पूर्व के काल से संबंधित है। परंतु दोनों मतों के अनुसार पैठनी साड़ी को उसका नाम पैठन शहर से मिला।

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औरंगजेबी डिजार्इन की पैठनी साड़ी

पैठन का प्राचीन नाम प्रतिष्ठान था। सातवाहन शासकों के शासन काल में प्रतिष्ठान सिल्क और जरी के अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक केंद्र के रूप में जाना जाता था। 200 र्इसा पूर्व में प्रतिष्ठान सातवाहन वंश की राजधानी था और रोम साम्राज्य से सिल्क तथा सूत का आयात करता था। 17वीं सदी के दौरान औरंगजेब ने बुनकरों को प्रोत्साहित किया और इस समय जो डिजार्इन बने वह औरंगजेबी कहलाए।

पेशवाओं के शासन काल के दौरान पैठनी की लोकप्रियता अपने चरम पर थी। पैठनी से पेशवाओं का लगाव था और उन्होने उसे बढ़ावा दिया। पैठन से उसके उत्पादन को प्रोत्साहित किया। पैठनी पैठन के अलावा योला से भी बनता है।

हैदराबाद के निजाम भी पैठनी से प्रभावित थे एवं पैठन जैसे छोटे से शहर में कर्इ बार जा चुके हैं। माना जाता है कि उनकी पुत्र-वधू निलोफर ने पैठनी साड़ी के बाडर्र और पल्लू को नए डिजार्इनों से परिचित करवाया। साहित्य में भी प्रमाण मिलते हैं कि पैठनी साड़ी मुगल काल के पहले से ही था। पेशवा ही पैठनी के अंतिम शुभचिंतक रहे। एक समय था जब पीढ़ी दर पीढ़ी लगभग 500 परिवार इसकी बुनार्इ करते थे। मुसिलम आक्रमणों के साथ ही उनका पलायन प्रारंभ हुआ। खत्री समुदाय के बुनकर तितर बितर हो गए और उन्हे जहां जो काम मिला कर लिया। अन्य भारतीय कलाओं की तरह बि्रटिश राज में पैठनी का भी पतन प्रारंभ हुआ।यह तो हुर्इ इतिहास की बात। आज पैठनी महाराष्ट्र के विरासत के रूप में फिर से उठ खड़ी हुर्इ है।

पैठनी साड़ी की विशेषता -

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पारंपरिक पैठनी साड़ी महीन सिल्क पर सोने की तारों से बनती है। पुर्नजीवित होने के बाद पैठनी का उत्पादन निर्यात को ध्यान में रखकर होने लगा। पहले पैठनी साड़ी सूती पर बनती थी। सिल्क से बार्डर पर डिजार्इन बनता था। आजकल सूती का प्रयोग बिल्कुल नहीं होता है।

पैठनी साड़ी देखने में जितनी सुन्दर होती है, उतनी ही टिकाउ। एक ही साड़ी कर्इ पीढ़ीयों तक चलती है। अंत में जब साड़ी का सिल्क खराब हो जाए तो भी उसके पल्लू और बार्डर जलाने से सोना मिलता है।

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जिस प्रकार उत्तर भारत में विवाह के दौरान नववधू के साज सज्जा का अहम अंग होता है बनारसी साड़ी ठीक उसी तरह महाराष्ट्र के विवाह में वधू के साज सज्जा का अहम अंग होता है पैठनी साड़ी। पैठनी साड़ी हमेशा से ही कुछ खास रही है। जब साड़ी खास होगी तो पहनने वाले भी खास ही होंगे। पेशवाओं की रानियां विशेष अवसर पर पैठनी साड़ी पहनती थी। आज भी उसके कद्रदान हैं। कुछ उन्नत रूचि वाले अमीर लोग इसे विशेष अवसर के लिए खरीदते हैं। एक पारंपरिक पैठनी साड़ी की कीमत सात आठ हजार से प्रारंभ होकर एक लाख के उपर जाती है।

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पैठनी साड़ी की बनावट -

इस साड़ी को बनाने के लिए तीन प्रकार के सिल्क धागे का प्रयोग होता है।

चरखा- सस्ता होने के कारण अधिक इस्तेमाल होता है,

गटटा - महीन सिल्क धागा,

चायना सिल्क- अत्यधिक महंगा होता है।

कच्चे सिल्क को कासिटक सोडा से साफ करके आवश्यकता अनुसार छांव में सुखाया जाता है। इसके पश्चात धागों को सावधानी पूर्वक अलग किया जाता है। सोने के धागों को सूरत से लाया जाता है। पहले जरी का निर्माण योला में होता था, अब सूरत में होने लगा है। प्रारंभ में जरी केवल शुद्ध सोने से बनती थी। आजकल कीमत को ध्यान में रखकर चांदी से भी काम चलाया जाता है।

पैठनी साड़ी का नक्शा -

पूरी साड़ी पर छोटी छोटी कलाकृतियां बनी होती हैं जैसे गोलार्इ में, तारे, फूल, कलश, चन्द्रकोर, पत्ते। अजंता की गुफाएं पास होने के कारण पैठनी के डिजार्इन में बौद्ध धर्म का प्रभाव देखा जा सकता है -

1.कमल का फूल जिस पर बुद्धा बैठे या खड़े हों।

2.हंस की कलाकृति।

3.अशर्फी की कलाकृति।

4.मोर।

5.तोता मैना।

6.पंछी।

7.अमर बेल।

पल्लू का नक्शा -

1.तोता,

2.ज्यामितीय फूलों की कलाकृति,

3.ज्यामितीय कलाकृति,

4.गुलदस्ते में फल या पौधा,

5.मोर।

पैठनी साड़ी की रंगार्इ और रंग -

योला के बुनकर धागों की रंगार्इ स्वयं ही करते हैं। ब्लीचिंग और रंगार्इ तांबे के बर्तन में की जाती है। एक किलो सूत की रंगार्इ के लिए 20 या 30 ग्राम रंग के पाउडर का उपयोग किया जाता है। इसको पुख्ता बनाने के लिए ऐसिड का प्रयोग होता है। अंत में नारियल तेल से सिल्क को नरम किया जाता है। सूत को रंगों में 30 से 40 मिनट तक तांबे की छड़ों की सहायता से डुबोया जाता है। रंगों के पानी से निकालकर सादे पानी में कर्इ बार धोने के पश्चात निचोड़ा जाता है एवं छांव में सुखाया जाता है।

पैठनी साड़ी के पारंपरिक रंग -

1.पीला,

2.लाल,

3.मोतिया रंग,

4.नारंगी,

5.आसमानी नीला,

6.मजेंटा,

7.पीच पिंक,

8.पर्ल पिंक,

9.पिकाक ब्लू\ग्रीन,

10.पीली आभा वाला हरा रंग,

11.व्यालेट रेड,

12.सफेद और

13.काला।

पैठनी साड़ी की खूबसूरती चंद शब्दों में बयां नहीं की जा सकती। जिसने उसे नहीं देखा उसने कुछ मिस किया है। टीवी पर जब पेशवा काल पर आधारित कोर्इ धारावाहिक आता है तो उसमें रानियां पैठनी साड़ी पहनती हैं। यह कहना मुशिकल है कि पैठनी साड़ी का बार्डर ज्यादा खूबसूरत होता है या पल्लू या साड़ी का भीतरी भाग। तीनों की खूबसूरती को मिलाकर ही पैठनी साड़ी में निखार आता है। एक साधारण पैठनी साड़ी बनने में एक से डेढ़ महीना लगता और ज्यादा कढ़ार्इ की हुर्इ शानदार पैठनी बनाने में नौ दस महीना लगता है। आज भी पैठनी साड़ी पारंपरिक ही बनती है।परंतु वर्तमान दौर को ध्यान में रखते हुए पैठनी के डिजार्इनों में पुराने के साथ नए का मेल किया जा रहा है। डिजायनर पैठनी साडि़यां भी बन रही हैं। यदि पैठनी साड़ी पारंपरिक रूप को छोड़ते हुए इसी तरह आगे बढ़ती रहे तो संपूर्ण भारत का गौरव बनने में इसे देर नहीं लगेगी।

Comments 

 
#1 सूरज 2014-08-26 10:48
मैंने लेख पड़ा मुझे अच्छा लगा, क्या पैठनी साड़ी का कोई प्रशिक्षण केंद्र हैं अगर ऐसा कोई केंद्र हैं तो हमे बताये ।
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