Thursday, November 23, 2017
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african dance

अपनी आदिवासी संस्कृति के बिना अफ्रीका अधूरा है।  वहां के आदिवासीयों की संस्कृति का अभिन्न अंग है अफ्रीकन डांस।

आदिवासी केवल मनोरंजन के लिए ही यह नृत्य नहीं करते बलिक अपनी भावनाओं को एक दूसरे तक पहुंचाने के लिए भी नृत्य करते हैं। आदिवासी कबीला नृत्य द्वारा एकजुट रहने की शकित जुटाता है। सुर ताल लय तो अफ्रीकी आदिवासीयों में जन्म जात पाया जाता है।

निराली है अफ्रीकन नृत्य की कला -

अफ्रीकन नृत्य शैली दुनिया के अधिकांश नृत्य शैलियों से अलग है। यह आदिवासी, संगीत के विभिन्न ताल के अनुसार अपने शरीर के विभिन्न अंगों को अलग अलग क्षेत्र में गतिमान बनाते हैं। नृत्य की यह शैली बहुत जटिल है जिसमें पारंगत होना बहुत कठिन है।

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अफ्रीका का पारंपरिक मसार्इ नृत्य

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कालाबारी नृत्य शैली

आदिवासी कबीले के सदस्य बहुत छोटी आयु से ही यह नृत्य सीखना प्रारंभ कर देते हैं। अधिकतर अफ्रीकी गांवों में इसके लिए नृत्य शिक्षक होते हैं जो कबीले के सदस्यों को नृत्य में पूरी तरह पारंगत होने से पहले किसी तरह के बदलाव या अलेकरण की  इजाजत नहीं देते। अफ्रीका के विभिन्न क्षेत्रों के नृत्य शैलियों में कुछ विशेष होता है जैसे मसार्इ हवा में उंची छलांग लगाने के लिए जाने जाते हैं, कालाबारी कूल्हे को हिलाते हैं। यह सभी नृत्य सदियों से एक ही तरह से होता रहा है अर्थात पारंपरिक तरीके से।

दास व्यापार और अफ्रीकन नृत्य -

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दास  बने अफ्रीकी आदिवासीयों का नृत्य

पन्द्रहवीं सदी के प्रारंभ में अफ्रीकियों को गुलाम बनाकर उत्तर एवं दक्षिण अमरीका तथा कैरीबियार्इ द्वीपों में ले जाया गया। अफ्रीकी आदिवासीयों  के रोज मर्रा के जिंदगी के विशेष अंग है नृत्य। इसलिए दूसरे देशों में दास बनकर  जाने के बाद भी उन्होने पारंपरिक अफ्रीकी नृत्य से नाता नहीं तोड़ा। इसके फलस्वरूप यूरोपियन नृत्य शैली और अफ्रीकन नृत्य शैली का विलय हुआ।

दक्षिण अमरीका, कैरीबियार्इ द्वीपों,स्पेन, पुर्तगल में लाए गए अफ्रीकी दासों को पारंपरिक अफ्रीकी नृत्य करने की पूरी छूट थी। उत्तरी अमरीका में अफ्रीकी दासों को अपना पारंपरिक नृत्य करने की इजाजत नहीं थी लेकिन अफ्रीकियों को नृत्य से दूर रखना नामुमकिन है। अफ्रीकी दासों ने नृत्य शैली में थोड़ा बदलाव करके इसे गुपचुप तरीके से जारी रखा। दासों को पैर उठाने की मनाही थी इसलिए उन्होने पैरों को घसीटकर कूल्हे और शरीर को हिलाकर अपनी सुविधानुसार नृत्य की नर्इ शैली बनार्इ।

एक दूसरे के पूरक हैं अफ्रीकी नृत्य और संगीत 

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     अफ्रीकी नृत्य एवं संगीत को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। यह एक ही कि्रया के दो अंग हैं। अफ्रीकी नृत्य में ड्रम का प्रयोग महत्वपूर्ण है। ड्रम की आवाज नृत्य का मिजाज बनाने में सहायक होता है। संगीत में अन्य वाध यंत्रों का भी प्रयोग होता है। इसके अलावा तालियां,पैर पटकना और उनके गीत भी संगीत में चार चांद लगा देते हैं।

 

 

 

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