Saturday, November 25, 2017
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durga puja visarjan

प्रयाग यानि इलाहाबाद के दशहरे की चर्चा पूरे भारत में हैं। लेकिन दुर्गा पूजा के बिना दशहरा अधूरा है और विसर्जन के बिना दुर्गा पूजा। इलाहाबाद में अनगिनत दुर्गा पूजा होते हैं , हर साल विजया दशमी के दिन सभी प्रतिमाओं का विसर्जन सरस्वती घाट पर यमुना नदी में होता है। सभी प्रतिमा जब एक साथ विसर्जन के लिए आती है तो समां देखने लायक होता है।

पिछले साल ही इलाहाबाद हार्इ कोर्ट ने प्रतिमा विसर्जन से नदी में हो रहे प्रदूषण को देखते हुए आदेश दिया था कि दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन सरस्वती घाट पर किया जाए। प्रशासन से वैक्लपिक व्यवस्था करने के लिए भी कहा था। परंतु पिछले साल यह संभव हो सका , तब कोर्ट के आदेश से सरस्वती घाट पर ही विसर्जन हुआ। कोर्ट ने एक साल का वक्त प्रशासन को दिया था। इस एक साल में प्रशासन को विसर्जन की दूसरी जगह खोजकर सारी सुविधाएं उपलब्ध करानी थी। लेकिन दुर्गा पूजा के चंद रोज पहले ही प्रशासन की नींद खुली।

विसर्जन के लिए अन्य स्थानों की खोज प्रारंभ हुर्इ। प्रशासन ने कुछ तालाबों के नाम  सुझाए जो शहर से बहुत दूर था जिसे पूजा कमेटियों ने नकार दिया। अंतत: प्रशासन ने फाफामउ में एक झील खोज निकाला लेकिन तब पूजा सर पर था।कुछ पूजा कमेटियों के अनुसार उन्होने उस झील का अष्टमी के दिन भी दौरा किया था - तो वहां पर दुर्गा प्रतिमा विसर्जित करने के लिए पर्याप्त जल था , ही प्रकाश की सही व्यवस्था और सड़कें इतनी संकरी की ट्रक का जाना मुशिकल ,उस पर सड़कों की हालत दयनीय थी और इंद्र देवता इस साल पूजा के दौरान कुछ ज्यादा ही मेहरबान रहे, इसलिए गंदगी भी कुछ ज्यादा ही था। ऐसे हालात में शहर के पूजा कमेटियों को झील में विसर्जन करना बेहद असुविधाजनक लग रहा था। अंत में हार्इ कोर्ट ने शहर के पूजा कमेटियों को सरस्वती घाट पर प्रतिमाओं को विसर्जित करने की अनुमति देकर राहत प्रदान किया।

पहले शहरी इलाके के बाहर की प्रतिमाएं भी सरस्वती घाट पर ही विसर्जित होती थी परंतु इस साल उन्हें सरस्वती घाट पर प्रतिमा विसर्जन की अनुमति नहीं मिली और उनके लिए दूसरी व्यवस्था की गर्इ थी। बहरहाल शहर के पूजा कमेटियों के लिए सरस्वती घाट पर मां दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन समारोह का यह अंतिम अवसर था। अब कोर्ट का आदेश मानते हुए इस एक साल में प्रशासन को विसर्जन की वैक्लपिक व्यवस्था कर लेनी होगी और पूजा कमेटियों को भी मन पक्का करना होगा। हार्इ कोर्ट का आदेश तो सबके लिए मान्य है , पर यह भी सुनने में रहा है कि इससे हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं आहत होंगी। यह सरासर गलत है , कहना है इलाहाबाद के जाने माने पुरोहित अशोक कुमार भटटाचार्या जी का। इन्हें शहरवासी बाबू पुरोहित के नाम से जानते हैं। उनके अनुसार पूजा से पहले मंत्र द्वारा प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा किया जाता है और दशमी पूजा के बाद ही मंत्र से मां का विसर्जन कर दिया जाता है , जिसे दर्पण विसर्जन कहते हैं। दर्पण विसर्जन के बाद मां दुर्गा केवल प्रतिमा बन जाती हैं। इसके बाद प्रतिमा को पानी में विसर्जित करना जरूरी है लेकिन बहते पानी में ही होना चाहिए ऐसा धर्म नहीं कहता। उनके अनुसार झील में विसर्जन धर्म के विरूद्ध नहीं है केवल पानी में विसर्जन से पहले प्रतिमा खंडित नहीं होनी चाहिए।

एकिटव इंडिया की टीम ने कुछ बारवारियों का दौरा किया और पूजा कमेटियों के विभिन्न मत उनके सामने आए। हार्इ कोर्ट के फैसले का मान रखते हुए हम कमेटियों के विचार आपके सामने प्रस्तुत करते हैं। सबसे पहले टीम ने इलाहाबाद के प्रीतम नगर का दौरा किया।

Preetam nagar barwari durga puja 1

preetam nagar durga puja

प्रीतम नगर - यूं तो पंडाल किसी विशेष भवन की प्रतिकृति नहीं थी। परंतु कुछ विशेष था जो सबका ध्यान आकर्षित कर रही थी। पंडाल के बाहर बिल्कुल उपर देवी द्वारा महिषासुर वध को दर्शाया जा रहा था। उपर देवी का प्रतीक था उसके नीचे कटा महिष का सिर और लाल रंग जो खून का प्रतीक था। थीम तो साधारण था बुरार्इ पर अच्छार्इ की विजय। पर इसका गूढ़ अर्थ है देवी का अंश कही जाने वाली नारियां भी आज के महिषासुरों का वध करने में सक्षम है। प्रीतम नगर के पंडाल को इको फ्रेंडली और आंतरिक सज्जा  का पुरस्कार मिला।

वहां के प्रेसीडेंट अनूप कुमार चैटर्जी ने प्रतिमा विसर्जन पर अपना मत व्यक्त किया। उनके अनुसार बेंगाली एसोसिएशन हमेशा ही सरस्वती घाट की बात कर रहा है अगर ऐसा नहीं होता तो सुप्रीम कोर्ट  का दरवारा भी खटखटा सकती है। अनुप जी व्यकितगत रूप से सरस्वती घाट पर विसर्जन ही चाहते हैं और इस साल के दुर्गा पूजा के बाद बेंगाली एसोसिएशन और प्रशासन से बात करेंगे। प्रीतम नगर के पूजा का यह 28वां साल है।प्रतिमा पारंपरिक और सुंदर थी। यहां के सेक्रेटरी हैं अभिजीत राय। अनूप जी के अनुसार पूजा तो ठीक है परंतु विभिन्न कार्यक्रमों के द्वारा इसे तीन दिन के उत्सव का रूप देने की कोशिश करते हैं।

lukerganj barwari durga puja1

lukerganj durga puja

लूकरगंज -मां दुर्गा यहां 107वीं बार यहां आर्इ है। यह पंडाल राम कृष्ण मिशन इलाहाबाद की प्रतिकृति था। वहां के सेक्रेटरी देबोब्रोतो डे के अनुसार लूकरगंज की प्राथमिकता विधि विधान मानकर और पारंपरिक ढ़ग से पूजा करना है। यहां की प्रतिमा हमेशा की तरह पारंपरिक ही थी। देबोब्रोतो जी के विसर्जन पर विचार रू बेंगाली एसोसिएशन ने सरस्वती घाट पर विसर्जन के मसले को सुलझाने का बहुत प्रयास किया परंतु प्रशासन ने कुछ नहीं किया। वह व्यकितगत रूप से हिंदुओं की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए बहते हुए पानी में विसर्जन चाहते हैं। लूकरगंज की पूजा कमेटी हार्इ कोर्ट के आदेश का सम्मान करती है।

City bharwari duga puja

सिटी बारवारी - यहां की पूजा का 131वां साल है। यहां की प्रतिमा और पूजा अपने पारंपरिक रूप के लिए सम्पूर्ण इलाहाबाद में जाना जाता है। यहां के पूर्व सेक्रेटरी सपन डे के अनुसार विसर्जन के मसले को सुलझाने के लिए प्रशासन ने कुछ नहीं किया। इस बारवारी के सदस्य अपनी चेष्टा पर विसर्जन के मसले को सुलझाने का प्रयास भी कर रहे हैं और सरस्वती घाट पर ही विसर्जन समारोह चाहते हैं। यहीं पर कमेटी के सदस्य वरूण डे से भी बात हुर्इ। कोर्ट के आदेश का सम्मान करते हुए उन्होने अपने विचार रखे रू सरस्वती घाट पर प्रतिमा विसर्जन की परंपरा बहुत पुरानी है। इसके साथ हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं जुड़ी हैं। उन्होने एक अहम सवाल उठाया है कि कोर्ट का आदेश सर्व मान्य है परंतु यमुना का प्रदूषण तो दिल्ली , आगरा से ही प्रारंभ हो जाता है। कानपुर में गंगा वहां के फैकिट्रयों के दूषित जल से बहुत प्रदूषित हो रही है जिसका असर सभी जगहों पर गंगा नदी में हो रहा है। इसको रोकने के लिए कोर्इ पुख्ता आदेश क्यों नहीं दिया जाता है। गंगा एक्शन प्लान पर इतने रूपये खर्च हुए पर नतीजा क्या निकला।

South malaka durga puja

साउथ मलाका - इनकी प्रतिमा पारंपरिक थी। व्यस्तता के कारण यहां किसी के पास बात करने की फुरसत नहीं थी।

bai ka bagh barwari durga puja1

bai ka bagh durga puja

बार्इ का बाग - प्रतिमा पारंपरिक थी और पंडाल भव्य था। यह गौरीगंज, नेपाल के मंदिर की प्रतिकृति थी। इस पूजा का 87वां साल है। यहां पर 42 साल से पूजा इंचार्ज हैं प्रदीप बैनर्जी।  प्रदूषण की समस्या को वह स्वीकार करते हैं। परंतु यह भी कहते हैं कि  विसर्जन बहते पानी में होना चाहिए क्योंकि इससे हिंदुओं की भावनाएं जुड़ी हैं। वह चाहते हैं कि कोर्ट का आदेश गंगा यमुना में प्रदूषण फैलानी वाली सभी स्रोतों पर लागू हो, केवल दुर्गा प्रतिमा पर नहीं। प्रदीप जी की इस बात से शायद सभी सहमत होंगे - प्रदूषण फैलाने वाली चीजें बनती क्यों हैं जैसे कि सिंदूर और आलता दो तरह के बनते हैं। एक से प्रदूषण फैलता है दूसरे से नहीं। प्रदूषण फैलाने वाले आलता और सिंदूर के बनने पर रोक क्यों नहीं लगाया जाता जिससे कि इसका प्रयोग ही हो सके।

kyedganj barwari durga puja1

kyedganj durga puja

कीडगंज - यह बारवारी  इस साल 75वां साल मना रहा है। यहां का पंडाल चर्च के प्रतिकृति जैसी थी। पंडाल का थीम था सर्व धर्म सम्भाव। प्रतिमा राजस्थानी  संस्कृति के अनुसार बनार्इ गर्इ थी इसलिए महिषासुर दाहिनी ओर और सिंह बार्इं और था। प्रतिमा और पोशाक  राजस्थानी होने के कारण उसमें एक नयापन था। यहां की प्रतिमा को द्वितीय पुरस्कार मिला है। यहां के चीफ कोआर्डिनेटर अपूर्व कुमार आर्इच के अनुसार कोर्ट और प्रशासन के आदेश का पालन करेंगे। परंतु वह यह भी कहते हैं कि नदी में  प्रदूषण फैलाने वाले अन्य स्रोतों को भी अवश्य रोका जाय।

Sobatiyabagh

सोहबतियाबाग - यहां की प्रतिमा पारंपरिक थी और सजावट से अदभुत सुनहरी छटा निखर आर्इ थी।

यह पूजा 56वां साल मना रहा है।प्रेसिडेंट रामेंदु राय के अनुसार प्रशासन ने कोर्ट के आदेश के बावजूद विसर्जन मसले पर कुछ नहीं किया। कोर्इ भी इस मसले को सुलझाने के लिए नहीं लड़ रहा है। पिछले साल से लेकर इस पूजा के पहले तक किसी ने कुछ नहीं किया। कोर्ट के आदेश से सरस्वती घाट पर विसर्जन की जो समस्या पैदा हुर्इ है उसे इस साल दशमी के दिन विसर्जन के बाद सभी भूल जाएंगे। कोर्इ गंभीरता से प्रयास नहीं करेगा। अगले साल दुर्गा पूजा के पहले यही समस्या सबके सामने आएगी।

gorge town durga puja

जार्ज टाउन - यहां भी पारंपरिक प्रतिमा देखने को मिली।यहां पर 85 सालों से दुर्गा पूजा हो रही है। 55 साल से इस बारवारी से जुड़े भानू सेनगुप्ता से बात हुर्इ जो एक पत्रकार भी हैं। उन्होने कहा हार्इ कोर्ट का आदेश बिल्कुल सही है। सरस्वती घाट पर विसर्जन की परंपरा को बदलने का प्रारंभ अगर हार्इ कोर्ट दुर्गा पूजा से करे तो कोर्इ ऐतराज नही। कहीं कहीं से तो शुरूआत होनी ही चाहिए तो दुर्गा पूजा से क्यों नहीं। यहां के सेक्रेटरी सुमित भटटाचार्या की आयु बहुत ही कम है। इतने बुजुर्ग व्यकित के सामने उन्होने खास कुछ नहीं कहा , लेकिन जितना भी कहा उससे उनके सकारात्मक रवैये का पता चलता है। उनसे एक महत्वपूर्ण खबर मिली - वह डी एम के मीटिंग से लौटकर आए थे जहां डी एम ने कह दिया  है कि अन्य सभी पूजा के सभी प्रतिमाओं का विसर्जन अगले साल से फाफामउ के झील में ही होगा।

satya gopal ashram

सत्य गोपाल आश्रम -यह बारवारी पूजा नहीं एक आश्रम की पूजा है।परंतु यहां दर्शन के लिए कोर्इ भी जा सकता है। यहां अन्य कोर्इ कार्यक्रम नहीं होता सिर्फ और सिर्फ पूजा होती है। यहां दुर्गा पूजा के अवसर पर केवल मां दुर्गा की प्रतिमा आती है क्योंकि आश्रम में हर देव देवी की पूजा अलग अलग होती है। उस परिवार के सदस्य निलेंदु माधव चैटर्जी के अनुसार कोर्इ भी प्रतिमा प्राण प्रतिष्ठा के बाद ही देव देवी बनते हैं। विजया दशमी के दिन मां को अनके निवास स्थान कैलाश प्रस्थान करना पड़ता है एवं निरंजन पूजा होती है। मां दुर्गा का विसर्जन मंत्र द्वारा हो जाता है जिसे दर्पण विसर्जन कहते हैं। मंत्र द्वारा विसर्जन होते ही देवी कैलाश लौट जाती हैं। इसके बाद प्रतिमा का विसर्जन नदी में हो या झील में कोर्इ फर्क नहीं पड़ता। परंतु उन्होने ने भी कहा कि नदी केवल प्रतिमा से ही प्रदूषित नहीं हो रही , प्रदूषण के अन्य स्रोतों पर भी रोक लगनी चाहिए।

Alenganj durga puja

एलनगंज - यहां की प्रतिमा पारंपरिक थी। मैरून पृष्ठभूमि पर प्रतिमा खिल रही थी। पूजा का 42वां साल है।  पहले साल 1971 से ही इस पूजा से जुड़े अंजन चैटर्जी के अनुसार प्रतिमा विसर्जन मसले पर प्रशासन ने इस एक साल में कुछ भी नहीं किया। बेंगाली एसोसिएशन ने अवश्य कोशिशें की थीं। वह यह भी कहते हैं कि नदी प्रदूषण के लिए सभी पूजा की प्रतिमाएं जिम्मेदार हैं केवल दुर्गा प्रतिमा नहीं। वह किसी झील में प्रतिमा विसर्जन के लिए तैयार हैं परंतु बेहतर सुविधाएं होनी चाहिए। वहां के सेक्रेटरी अमित किरण सिंह के अनुसार नदी में प्रदूषण फैलाने वाले स्रोतों की कमी नहीं है। सिर्फ दुर्गा पूजा की प्रतिमा पर रोक लगाने से कोर्इ फायदा नहीं होगा।

conelganj durga puja

कर्नलगंज - यहां पंडाल काल्पनिक लेकिन भव्य था। प्रतिमा पारंपरिक और र्इको फ्रेंडली थी। यहां तक कि प्रतिमा के वस्त्र भी। मुख्य द्वार के बाहर दोनो ओर पेड़ बनाए गए थे। हरे रंग के यह पेड़ हरियाली का संदेश दे रहे थे। इस साल यहां पूजा का 161वां साल था। यहां के ज्वाइंट सेक्रेटरी और बेंगाली सोशल एंड कलचरल एसोसिएशन के सेक्रेटरी शंकर चैटर्जी हार्इ कोर्ट का पूरा सम्मान करते हुए कहते हैं कि केवल दुर्गा पूजा में प्रतिमा विसर्जन पर रोक क्यों। नदी में प्रदूषण तो अनेक स्रोतों से फैल रहा है। उस पर रोक क्यों नहीं लग रहा है। वह सरस्वती घाट पर विसर्जन का समारोह चाहते हैं।

Darbhanga Durga barwari puja 1

Darbhanga Durga barwari puja 2

दरभंगा - यहां का पंडाल काफी दूर से ही ध्यान आकर्षित कर रहा था। पंडाल के भीतर की सजावट तो और मन मोहक थी। प्रतिमा पारंपरिक थी परंतु दक्षिण भारत की छाप उसका आकर्षण कुछ और बढ़ा रही थी। पंडाल के भीतर की थीम शिरडी सांर्इ बाबा पर आधारित थी। पूरे पंडाल में सांर्इ बाबा के जीवन को चिति्रत किया गया था। पंडाल की पूरी आंतरिक सजावट मोतियों और बटन से की गर्इ थी। इसमें कुल 104 बटन लगे थे। सांर्इ बाबा के जीवन को चिति्रत करते उनके मूर्तियों को मोतियों से बनाने का बेहतरीन प्रयास किया गया था। यहां की सजावट वास्तव में प्रभावित करने वाली थी और उसे पंडाल की आंतरिक और बाहरी सजावट के लिए प्रथम पुरस्कार मिला।

यहां के ज्वाइंट सेक्रेटरी संजय मुखर्जी के अनुसार विसर्जन के मसले पर हमें अपने आपको बदलना होगा। यदि विसर्जन से प्रदूषण फैल रहा है तो उसे रोकने के लिए कदम उठाना पड़ेगा लेकिन प्रशासन को दूसरी जगह पर बेहतरीन व्यवस्था करनी पड़ेगी।

Ashok nagar barwari durga puja1

Ashok nagar barwari durga puja

अशोक नगर - यहां के पंडाल के मुख्य द्वार पर वेलकम टू नागालैंड लिखा था। नागालैंड के अंदर प्रवेश करने पर पहाड़ और नागालैंड के लोगों की जिंदगी की झलक मिली। पंडाल उपर से पूरा ढ़ंका नहीं था, खुला था। थीम बहुत अच्छी थी परंतु पूजा के दौरान हुर्इ बारिश की वजह से इसका सौंदर्य पूरी तरह निखर नहीं पाया किंतु बारिश ने नागालैंड को जीवंत कर दिया। जब एकिटव इंडिया की टीम वहां पहुंची तो बारिश बहुत जोरों से हो रही थी लेकिन भीगते हुए ही नागालैंड को देखा और भीगने का अहसास भी नहीं हुआ। प्रतिमा पर नागालैंड की स्पष्ट छाप थी और यह सबसे अलग थी , तभी तो इस प्रतिमा को प्रथम पुरस्कार भी मिला।

15 साल से इस पुजा से जुड़े अमित नियोगी के विसर्जन पर विचार बेहद सकारात्मक थे।  उनहोने भी कहा कि हमें अपने आपको बदलना होगा परंतु प्रशासन को भी दूसरे स्थान पर विसर्जन के लिए पर्याप्त व्यवस्था करनी होगी। आखिर हम लोग पढ़े लिखे लोग हैं हमें इस मसले को समझना होगा लेकिन प्रदूषण के अन्य स्रोतों का भी ख्याल करना चाहिए।

यह बात तो सच है कि अन्य किसी भी स्थान पर विसर्जन होने से सरस्वती घाट जैसा समारोह नहीं होगा बरसों से चली रही  इस परंपरा को अचानक बदलना आसान नहीं है। इसिलिए इस बात को सभी मन से स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। परंतु नदी को प्रदूषण से बचाने के लिए सबको इस बदलाव को स्वीकार करना ही पड़ेगा , खुले मन से स्वीकार करें तो अच्छा

Comments 

 
#2 subeer mukherjee 2013-10-27 13:22
Hello madam...it is very well conducted survey of all the barwaris and the way barwaris responded is also important now I guess Bengali cultural association will understand the matter of immersion and will respond accordingly before next year durga pujo...my best wished is with you.
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#1 anup Chatterjee 2013-10-27 11:31
Dear madam.. indeed a comprehensive survey of Durga puja barwaris in Allahabad...my haerty Regards for the same......plz keep this up...
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