Monday, November 20, 2017
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bhaiyadooj

भैया दूज पांच दिनी दिपावली पर्व के अंतिम दिन पर मनाया जाता है। इस दिन बहन अपने भार्इ की लंबी जिंदिगी के लिए उसे टीका लगाती हैं। इस पर्व को हिंदू मनाते हैं और इस तरह का अनोखा त्यौहार भारत में मनाया जा सकता है।

रोशनी और पटाखों से दिवाली मनाने के बाद भारत की सभी बहनें भैया दूज का इंतजार करती हैं।मंत्र पढ़ते हुए बहनें भार्इ के मस्तक पर पवित्र टीका लगाकर बुरी बलाओं से उसे बचाने के लिए उनकी आरती करती हैं। भार्इ बहनों को तोहफा देते हैं और बड़े भार्इ आशीष भी देते हैं। छोटे भार्इ बहनों के पैर छूते हैं।

हर साल दिवाली के दो दिन बाद द्वितिया के दिन भैया दूज मनाया जाता है। भैया का अर्थ है भार्इ और दूज का अर्थ है दूसरा दिन। दूसरा दिन का मतलब अमावस्या से दूसरा दिन।

भैया दूज को यम द्वितिया भी कहते हैं। माना जाता है कि इस दिन मृत्यु के देव यमराज अपनी बहन यमी के घर गए थे। यमी ने अपने भार्इ के माथे पर तिलक लगाकर उनकी भलार्इ के लिए प्रार्थना की थी। यमराज ने यमी को वरदान दिया था कि यह दिन हमेशा भार्इ बहन के पर्व के रूप में मनाया जाएगा।

अन्य कथा के अनुसार नरकासुर राक्षस को मारकर श्री कृष्ण अपनी बहन सुभद्रा के पास गए थे। सुभद्रा ने आरती , फूलों और मिठार्इयों से कृष्ण का स्वागत किया एवं अपने भार्इ के माथे पर पवित्र रक्षा टीका लगाया।

एक और कथा कहती है कि जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर के निर्वाण के बाद उनके भार्इ राजा नंदीवर्धन बेहद परेशान रहने लगे थे और तब उनकी बहन सुदर्शना ने नंदीवर्धन को सांत्वना दी थी। इस मत के अनुसार तब से भैया दूज के दौरान बहनों को मान मिलने लगा।

भैया दूज का सामाजिक महत्व भी है। इस दिन सभी भार्इ बहन एकति्रत होते हैं और पूरा परिवार इसे एक साथ मनाता है। दूसरे शहर में ब्याही बहन को मायके आने का मौका मिलता है , नही तो भार्इ बहन के ससुराल जाता है और पारिवारिक बंधन मजबूत होता है। परंतु आज के मशीनी युग  में इस पर्व का रूप भी बदल गया है। अब इस दिन पर भी हमेशा भार्इ बहन से नहीं मिल सकते। मोबार्इल पर ही बहनें भार्इ को भैया दूज की बधार्इ दे देती हैं।यहां तक तो ठीक है। लेकिन कहीं कहीं पर तो यह पर्व एस एम एस , र्इ मेल , र्इ कार्ड तक सिमट कर रह गया है। लेकिन जैसे भी मनाया जाए यह पर्व आज भी भार्इ बहन के रिश्ते को और भी मजबूत बनाता है।

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