Thursday, November 23, 2017
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इस्लामिक कैलंडर का पहला माह है मुहर्रम । यह उन चार पवित्र महीनों में से एक है जिसमें लड़ना मना है। मुसिलम समुदाय के लोग अलग अलग कारणों से इसे मानते हैं। किसी के लिए यह मातम का समय है तो किसी के लिए खुशी का। मुसिलम मुहर्रम के पूरे महीने को पवित्र मानते हैं परंतु इस महीने के दसवें दिन का विशेष महत्व है। इस दिन इमाम हुसैन इब्न अली का कत्ल किया गया था इसलिए शिया मुसिलम , कुछ सुन्नी भी पूरे महीने मातम मनाते हैं। सुन्नी मुसिलमों के लिए यह खुशी का अवसर है क्योंकि इस दिन मोसेस ने मिस्र के बादशाह पर विजय प्राप्त की थी।

शिया मुसिलमों के अनुसार मुहर्रम के दसवें दिन करबला के युद्व में इमाम हुसैन इब्न अली का सर कलम कर दिया गया था। इमाम हुसैन इब्न अली पैगम्बर मोहम्मद के पौत्र हैं और इस्लाम धर्म में उनका विशेष स्थान है। माना जाता है कि याजि़द के शासन काल में इमाम हुसैन इब्न अली ने याजि़द के इस्लामी नियमों को मानने से इंकार किया और शासक के खिलाफ विद्रोह किया। इसके फलस्वरूप करबला का युद्व हुआ। इस युद्व में इमाम हुसैन का सर कलम कर दिया गया और बच्चों तथा सित्रयों को दमिश्क में बंदी बना लिया गया।
सुन्नी मुसिलमों के अनुसार उनके धर्म गुरू मोसेस को धार्मिक शिक्षा का प्रचार करने के लिए विश्व भ्रमण पर भेजा गया। मुहर्रम के दसवें दिन मोसेस ने मिस्र के बादशाह पर विजय प्राप्त की थी। चाहे सुन्नी हो या शिया सभी लोग उस दिन रोजा रखते हैं। इस दिन के पहले या बाद में एक दिन और रोजा रखने का भी नियम है। देखा जाता है कि कभी कभी शिया मुसिलम पूरे महीने रोजा रखते हैं। डंडे ,राड इत्यादि से अपने आपको चोट पहुंचाते हैं। इमाम हुसैन इब्न अली ने याजि़द के शासन काल में जो कुछ झेला उसी को याद करके यह अपने आपको चोट पहुंचाते हैं। 

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लखनऊ में अज़ादारी-लखनऊ में मुहर्रम के जुलूस और रस्मों को अज़ादारी कहते हैं। आज लखनऊ उत्तर प्रदेश की राजधानी है पर पहले यह अवध की राजधानी थी।अवध की राजधानी लखनऊ में सोलहवीं सदी या उससे भी पहले से मुहर्रम का जुलूस निकलता है। जिसमें चुप ताजि़या भी शामिल होता है। बीसवीं सदी में सरकार ने इसे कुछ कारणों से बंद करा दिया। काफी विरोध के बाद कुछ वर्ष पहले अजादारी जुलूस निकालने की अनुमति मिली लेकिन उसकी हद निशिचत कर दी गई।

शोक प्रकट करने के कुछ तरीके

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जि़यारत (इमाम हुसैन का मकबरा)-मुसिलम संप्रदाय के बहुत लोग इस समय करबला में इमाम हुसैन के मकबरे पर जि़यारज के लिए जाते हैं। मक्का मदीना के बाद यह उनका सबसे बड़ा पवित्र स्थल है। इमाम हुसैन की याद में इस समय भारी तादाद में लोग वहां जाते हैं।

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मातम-पुरूष और स्त्री दोनो ही अलग अलग गम को व्यक्त करने के लिए अपना सीना पीटते हैं और चोट पहुंचाते हैं। वह इमाम हुसैन के दर्द को महसूस करने के लिए ही ऐसा करते हैं। बहराइन , पाकिस्तान , भारत , अफगानिस्तान , इराक में कुछ पुरूष मातम के लिए चेन के साथ साथ खंजर का भी प्रयोग करते हैं।


ताजिया-करबला के युद्व की नाटकीय प्रस्तुती भी शोक प्रकट करने का एक तरीका है। इरान में इसे ताजिया कहते हैं। इस नाटकीय प्रस्तुती में विशेष योग्यता हासिल करने वाले दल को ताजिया दल कहते हैं।कजर वंश के दौरान यह बहुत लोकप्रिय था। बीसवीं सदी प्रारंभ होने के कुछ बाद यह नाटकीय प्रस्तुती कम होने लगी। 1940 के आस पास बड़े शहरों में तो नाटकीय प्रस्तुती बंद हो गई पर इरान में छोटे पैमाने पर यह चलती रही। विशेषकर ग्रामीण और पारंपरिक क्षेत्रो में। पहलवी वंश के रज़ा शाह ने ताजि़या पर प्रतिबंध लगा दिया। कुछ प्रयासों के बाद 1979 से मुहर्रम के जुलूस और रौजा खानी के कई प्रकार देखने को मिलते हैं।

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दक्षिण एशिया में नाटकीय प्रस्तुती कम महत्वपूर्ण है। मुहर्रम के जुलूस में छोटे मकबरे के रूप में ताजि़या का प्रयोग होता है। भारत से करबला बहुत दूर है और जियारत के लिए बार बार वहां जाना मुशिकल था। मौत के बाद भी इमाम हुसैन के कब्र के पास दफनाना संभव नहीं था। इसलिए उपमहाद्वीप में स्थानीय करबला बनाए गए , जहां करबला की मिटटी छिड़की गई। अगला कदम इमाम हुसैन के मकबरे को यहां लाना था। इसके लिए इमाम हुसैन के मकबरे की प्रतिकृति बनाई गई , जिसे ताजि़या कहा गया।

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हर साल मुहर्रम के जुलस में विभिन्न प्रकार के ताजि़या निकलते हैं। पुरूष और सित्रयां इन दिनों इमाम हुसैन की याद में दुख भरी कविताएं पढ़ते हैं , शोक प्रकट करने के लिए नगाड़ों की धुन पर या हुसैन या अली की सदाएं गूजती हैं , कहीं कहीं करबला के युद्व और याजि़द के हाथों इमाम हुसैन की मौत की नाटकीय प्रस्तुती होती है। वह इमाम -ऐ- ज़माना के प्रति श्रद्वा प्रकट करते हैं जिन्हें इमाम -अल- मेहदी भी कहते हैं। उनका विश्वास है कि वह इमाम हुसैन का बदला लेकर एक दिन दुनिया को न्याय दिलाएंगे।ढोल ,ताशों के साथ घोड़े और ऊंट पर सवार बच्चे ,नौजवान सभी जुलूस के साथ जाते हैं।

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