Monday, November 20, 2017
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bhartiya lok dance

जिस धरती पर विभिन्न संस्कृति एवं परंपराओं का मेल होता है वही भारत है। इस देश की हर प्रांत की अपनी विशेषता है। अपनी संस्कृति है , जो उस प्रांत की लोक कथाओं में नजर आती है। सभी प्रांतों की  अपनी लोक संगीत व लोक नृत्य होते हैं। इसमें वहां की परंपराओं और समुदायों की भावनाओं की अभिव्यकित देखने को मिलती है।

इन लोक नृत्यों में ग्रामीण भारत की माटी की महक आती है और इसी महक से इन नृत्यों की सुंदरता बढ़ जाती है। कोर्इ भी त्यौहार हो या खुशी का मौका जैसे विवाह , जन्म इत्यादि इन नृत्यों के बिना संपूर्ण नहीं होता।

चाहे वह बंगाल का छाउ नृत्य हो या पंजाब का भंगड़ा अथवा असम का बीहू या आंध्र प्रदेश का गोनी। इन सभी में एक विशेष संस्कृति की परंपराओं की झलक दिखती है। यह लोक नृत्य देखने में जितना आसान लगता है करने में उतना ही कठिन। यह नृत्य पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती है। इसके लिए लोक कलाकारों में जोश और शकित भरा होना चाहिए। कुछ लोक नृत्य केवल सित्रयां करती हैं तो कुछ केवल पुरूष। कुछ दोनों मिलकर करते हैं। जैसे बंगाल का छाउ नृत्य केवल पुरूष करते हैं , राजस्थान का घूमर केवल महिलाएं करती हैं, असम का बीहू दोनों मिलकर करते हैं।ज्यादातर मौकों पर ही लोक नृत्य की प्रस्तुती झुंड में होती है।

लोक नृतक स्वयं ही गाते हैं और उनके साथ वाध यंत्र बजाने वाले प्रशिक्षित होते हैं। प्रत्येक लोक नृत्य की पोशाक अलग होती है। यह पोशाकें बहुत रंग बिरंगी होती हैं और इनके साथ मेल खाते हुए परंपरागत गहने पहने जाते हैं।भारत में अनेक प्रकार के लोक नृत्य हैं। इन में से कुछ पर हम आज नजर डालेंगे।

बाथुकम्मा -आंध्र प्रदेश की महिलाएं नवरात्र के दौरान बाथुकम्मा नाम का त्यौहार मनाती है और बाथुकम्मा नृत्य करती हैं। यह नृत्य महिलाएं पारंपरिक पटटू साड़ी पहन कर झुंड में करती हैं।

 

भांगड़ा - यह नृत्य शैली पंजाब की है और इसे केवल पुरूष ही करते हैं। सन 1880 के दशक के दौरान पंजाब के उत्तरी क्षेत्र में एक सामुदायिक नृत्य होता था जिसे भांगड़ा नृत्य कहा जाता है। भांगड़ा एक मौसम आधारित नृत्य था जो अप्रैल के महीने मे शुरू होता था  और बैसाखी तक चलता था। इस महीने में फसलें विशेषकर गेंहू बोर्इ जाती है। बैसाखी के दौरान स्थानीय मेला लगता था और इन दिनों  नये फसल तथा बैसाखी के त्यौहार के उपलक्ष्य में कर्इ दिनों तक पुरूष इस नृत्य को करते थे। 1947 में पंजाब क्षेत्र के विभाजन के बाद बैसाखी मेलों की परंपरा टूट गर्इ और जिन क्षेत्रों में सामुदायिक नृत्य भांगड़ा होता था उनमें से ज्यादातर पाकिस्तान में चले गए। परंतु भारत के पंजाब प्रांत के पंजाबियों ने इस नृत्य को जीवित रखा। अब भांगड़ा केवल बैसाखी के मेले तक सीमित नहीं रहा । इसे पूरे साल किसी भी खुशी के अवसर पर देखा जा सकता है। आजकल पुरूषों के साथ सित्रयां भी यह नृत्य करती हैं। पंजाबियों के खुशी की अभिव्यकित का एक रूप है भांगड़ा नृत्य।

 

बीहू - यह लोक नृत्य असम प्रांत का है और इसे बीहू के त्यौहार के साथ जोड़ा जाता है। इस नृत्य को स्त्री और पुरूष मिलकर रंग बिरंगे असमिया पोशाक पहनकर करते हैं। बीहू आसामी नए साल को कहते हैं जो मध्य अप्रैल में पड़ता है।   यूं तो यह नृत्य असम में कब से हो रहा है यह कहना मुशिकल है। परंतु1694 में इस नृत्य का आधिकारिक जिक्र मिलता है जब अहोम राजा रूद्र सिंह ने पहली बार बीहू नृत्य करने वालों को रांघर के मैदानों में रोंगाली बीहू के अवसर पर नृत्य करने के लिए बुलाया था।

चांगू - यह लोक नृत्य ओडिशा का आदिवासी नृत्य है। चांगू ओडिशा में बहुत लोकप्रिय है।   भुर्इंया ,बाथुडी, खारिया , जूयांग ,मेची एवं सुंदरगढ़ के कोंधा समुदाय , केअनझर, मयूरभंज तथा कंधामल जिले के स्त्री पुरूष मिलकर इस नृत्य को करते हैं। सित्रयां ज्यादातर लाल किनारे की सफेद साड़ी पहनती हैं और पुरूष वहां का रंग बिरंगा पारंपरिक पोशाक। यह नृत्य खुले आसमान के नीचे चांद की रोशनी में किया जाता है। इस नृत्य से यहां के लोगों के सीधी साधी जीवन शैली की झलक मिलती है।

गरबा - यह गुजरात प्रांत का लोक नृत्य है। इसका नाम संस्कृत के शब्द गर्भ और दीप से आर्इ है। गरबा को नवरात्र के साथ जोड़ा जाता है।  बीच में एक मिटटी के कंदील में दीया जलाकर या देवी शकित की चित्र अथवा मूर्ति के चारों ओर पारंपरिक गरबा की जाती है। गरबा की कुछ मुद्राएं  सूफी संस्कृति से मिलती जुलती है। परंपरा के अनुसार गरबा नवरात्र के नौ दिनों तक किया जाता है। गरबा नृत्य करने वालों की पारंपरिक पोशाक लाल, गुलाबी , पीला , नारंगी इत्यादि चमकीले रंगों की होती है। चमकीले रंगों की चन्या चोली या घाघरा चोली , बांधनी  अथवा अबला या गुजराती बार्डर की ओढ़नी गरबा की पारंपरिक पोशाक है। इसके साथ भारी गहने जैसे 2 - 3 हार , मोटे मोटे कड़े , करधनी ,पायल, कान की लंबे लंबे झुमके इत्यादि पारंपरिक गहने पहनते हैं।

आधूनिक गरबा में गरबा और डांडिया रास का मिश्रण हो गया है। पारंपरिक रूप में डांडिया रास केवल पुरूष करते थे। नृत्य के इस पारंपरिक रूप को आजकल पारंपरिक  और रंग बिरंगी पोशाक तथा गहने पहनकर स्त्री और पुरूष मिलकर करते हैं। आज गरबा गुजरात की सीमा पार करके सारे भारत में फैल चुका है और भारत की सरहद पार करके विदेशों में भी पहुंच गया है।

घूमर - यह राजस्थान प्रांत का लोक नृत्य है। घूमर का विकास भील कबीले के लोगों द्वारा किया गया। उसके पश्चात राजस्थान के अन्य समुदायों ने इसे अपनाया। यह महिलाओं द्वारा किया जाता है। घूमर नृत्य में महिलाएं गोल गोल घूमती है और महिलाएं तथा पुरूष एक साथ गाते हैं।

इस लोक नृत्य को अपना नाम घूमना से मिला है। घूमना अर्थात राजस्थानी महिलाओं के साथ साथ उनके द्वारा पहनी गर्इ रंग बिरंगी घाघराओं का  भी हवा में घूमना। नृत्य करने वाली इन महिलाओं का चेहरा दुपटटे से ढ़ंका होता है और उनका घाघरा हवा में लहराता है, उनके कदम नपे होते हैं , शरीर का लचीलापन, बीच बीच में ताली बजाना कुल मिलाकर दृश्य देखने लायक होता है। ज्यादातर इस नृत्य के दौरान देवी सरस्वती की पूजा होती है।

यह तो एक झलकी भर है। भारत के सभी प्रांतों में लोक नृत्यों का चलन है। एक प्रांत में कर्इ तरह के लोक नृत्य होते हैं। यह माटी से जुड़े होते हैं लेकिन इन्हें ग्रामीणों का नृत्य नहीं समझना चाहिए। भारत के यह लोक नृत्य विदेशों में भी नाम कमा रहे हैं। परंतु कहीं न कहीं भारत में इनकी जडे़ं कमजोर होती जा रही हैं। जिस प्रांत का लोक नृत्य है उस प्रांत के बाहर इसकी पहचान नहीं होती है। हां इसका एक अपवाद है भांगड़ा और गरबा। हम भारतीयों को ही इन लोक नृत्यों को भारत में जीवित रखना पड़ेगा ताकि लोक नृत्य भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग बना रहे।

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