Monday, November 20, 2017
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सैंटा क्लास को सेंट निकोलस , फादर क्रिसमस भी कहते हैं। प्यार से हम सब उन्हें सैंटा कहते हैं। पशिचमी सभ्यता में सैंटा एक पौराणिक चरित्र है जिसका मूल इतिहास और लोक कथा में मिलता है।

पशिचमी सभ्यता के अनुसार क्रिसमस से एक दिन पहले वाली रात अर्थात 24 दिसंबर की रात को सैंटा क्लास अच्छे बच्चों के घर पर जाकर उन्हें उपहार देते हैं। कहा जाता है कि सैंटा चिमनी के द्वारा घरों में प्रवेश करते हैं एवं सोते हुए बच्चों के सिरहाने बड़े बड़े मोजों यानि स्टाकिंग्स में उपहार भर कर रख देते हैं।

santa claus and christmas2

      डच चरित्र सिंटरक्लास                फादर   क्रिसमस

कुछ यूरोपीय देशों में बच्चों को उपहार सेंट निकोलस  डे यानि 6 दिसंबर को मिलता है। डच चरित्र सिंटरक्लास से आज के आधूनिक  सैंटा क्लास का चरित्र आया है। समय के साथ बि्रटिश लोक कथा का चरित्र फादर क्रिसमस  का विलय हो गया  और आधूनिक सैंटा क्लास के नाम से पहचाने जाने लगे।

सैंटा क्लास मोटे , उत्साह और खुशियों से भरे , जोशीले , सफेद दाढ़ी वाले होते हैं। वह सफेद कौलर और कफ वाली लाल कोट , सफेद कफ वाली लाल ट्राउजर , लाल- सफेद टोपी , चमड़े की काली बेल्ट और बूट पहनते हैं। साथ में एक बड़े से झोले में अच्छे बच्चों के लिए उपहार होते हैं। कभी कभी सैंटा कलास चश्मा भी पहनते हैं। 19वीं सदी में  सैंटा क्लास का यह चित्र अमरीका और कनाडा में लोकप्रिय हो गया। धीरे धीरे सैंटा क्लास का यह चित्र लोगों के दिल में बस गया और आज सैंटा क्लास की कल्पना करते ही उनका यही रूप उभरकर सामने आता है।

सैंटा क्लास के चरित्र का मूल सेंट निकोलस को जाता है जो चौथी सदी में माएरा में रहते थे। माएरा आज भी तुर्की का एक शहर है। सेंट निकोलस लोगों में बहुत लोकप्रिय हो गए थे। कारण वह गरीबों के प्रति बहुत दयालु थे। कहा जाता है कि वह गरीबों के घरों की खिड़की से सोने के सिक्के फेंक देते थे ताकि वह अपनी बेटियों का विवाह कर सकें। शायद सेंट निकोलस के इसी स्वभाव के कारण ही सैंटा क्लास भी उपहार बांटते हैं।

 

 स्लेज की सवारी करते सैंटा

क्या आपको पता है कि सैंटा कलास की सवारी कौन सी है। सैंटा क्लास पशिचमी सभ्यता से निकले और पूरे विश्व में फैल गए। परंतु आए तो पशिचम  से हैं न यानि बर्फ के देश। तो बर्फ में उन दिनों तो स्लेज ही चलते थे। स्लेज पर उपहार लादकर सैंटा सवारी करते हैं।

 

आज के सैंटा

सैंटा क्लास वाकर्इ में थे या नहीं यह तो बताना संभव नहीं है। हो सकता है कि सैंटा क्लास केवल कल्पना हों। पहले क्या होते था यह कोर्इ नहीं जानता। पता नहीं वाकर्इ में सैंटा आते थे या नहीं परंतु आज भी क्रिसमस के दौरान सैंटा हमारे बीच आते हैं। बहुत लोग सैंटा क्लास की पारंपरिक पोशाक पहनकर सैंटा बनकर बच्चों के बीच में जाते हैं , उन्हें उपहार बांटते हैं , नाचते गाते हैं , बच्चों के साथ क्रिसमस की खुशियों को दोगुना करते हैं, क्रिसमस पार्टियों में जाते हैं। बच्चों को आज भी 24 दिसंबर की रात को  उपहार मिलता है पर मम्मी पापा से। बड़े बच्चे इस बात को समझते हैं पर कहते हैं कि उपहार सैंटा ने दिया है। छोटे बच्चे जानते हैं साल भर अच्छा बनकर रहने पर सैंटा उपहार देते हैं। इस तरह से सैंटा आज भी संपूर्ण विश्व में जीवित हैं और उनके बिना क्रिसमस अधूरा होता है।

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