Sunday, January 21, 2018
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basant panchmi kal aur aaj

देवी सरस्वती का आर्शीवाद पाने के लिए बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा किया जाता है। यह पूजा कब से हो रहा है इसकी सही जानकारी किसी को नहीं है। इसका कोर्इ लिखित प्रमाण नहीं है परंतु इस पूजा के बारे में तरह तरह की कथा प्रचलित है।

एक लोकप्रिय कथा के अनुसार यह त्यौहार आर्यों के समय से मनार्इ जा रही है। आर्य खैबर पास द्वारा भारत में बसने के लिए आए थे। राह में उन्होने सरस्वती समेत कर्इ नदी पार किए। आर्यों के प्राचीन सभ्यता की अधिकतर गतिविधियां सरस्वती नदी के तट पर ही होती थी। अत: इस नदी को ज्ञान और उपजाउपन से जोड़ा जाने लगा और इसी से देवी सरस्वती की पूजा प्रारंभ हुर्इ। सरस्वती को बसंत ऋतु का प्रतीक माना जाता है। इसीलिए बसंत पंचमी के दिन देवी सरस्वती की पूजा होती है। तब से आज तक देवी सरस्वती की पूजा ज्ञान का वरदान पाने के लिए की जाती है।

बसंत पंचमी को बसंत ऋतु के आरंभ का सूचक माना जाता है। सभी ऋतुओं में बसंत को ऋतुराज कहा गया है। प्राचीन  भारतीय साहित्य के अनुसार प्राचीन भारत में बसंत पंचमी का त्यौहार श्रंगार रस से जोड़ा जाता था। कामदेव और उनकी पत्नी रति की याद में इस त्यौहार को मनाया जाता था। आज भी बसंत पंचमी पर कहीं कहीं कामदेव और रति की पूजा होती है। कहा जाता है कि बसंत कामदेव  के मित्र थे।


प्राचीन समय में बसंत पंचमी के दिन नतृकियां और ढ़ोल इत्यादि वाध यंत्र बजाने वाले शाही राजघराने में राजघराने की महिलाओं के साथ अनौपचारिक दरबार लगाते थे। नतृकियां और राजघराने की युवतियां बसंती रंग के वस्त्र पहनते थे। बसंत पंचमी के दिन नतृकियां शाही बागीचे से फूल और आम के पत्ते एकति्रत करती थीं जो कामदेव के प्रेम के तीर के प्रतीक थे। इन फूल और पतितयों को पीतल के बर्तन में रखकर दरबार प्रारंभ होता था। कार्यक्रम का प्रारंभ विभिन्न रागों पर आधारित प्रेम के गीतों से होता था। यह गीत राधा कृष्ण या गोपियों के इर्द गिर्द घूमता था। कार्यक्रम का समापन फूलों और लाल गुलाल के छिड़़काव के साथ होता था और नतृकियां इस गुलाल को अपने गालों पर लगाती थी। शाही घराने की महिलाएं नृत्य करने वाली लड़कियों को उपहार में रूपए देती थीं।

बीतते समय के साथ यह प्राचीन परंपरा बंद हो गर्इ और आर्यों के आगमन के बाद बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा का प्रारंभ हुआ जो आज भी चल रहा है। परंतु बसंत पंचमी के दिन के साथ विवाह और प्रेम का नाता आज भी है क्योंकि यह दिन विवाह के लिए बहुत शुभ माना जाता है और विवाह प्रेम का सबसे बड़ा प्रतीक है। आज भी सरस्वती पूजा में आम के बौर और पत्ती तथा लाल गुलाल आवश्यक है।

 

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