Saturday, November 25, 2017
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महाशिवरात्रि का पर्व क्यों मनाया जाता है ? शायद सबको पता हो या इस सवाल को नजर अंदाज करते हुए ही शिवरात्रि का पर्व मनाते हैं। हर पर्व त्यौहार की तरह ही इस पर्व से जुड़ी हुर्इ कुछ कथाएं हैं।

1.एक बार एक शिकारी शिकार पर गया था।वह एक तालाब के किनारे पहुंचा और शिकार करने के लिए पास के पेड़ पर चढ़कर बैठा। वह पेड़ बेल का था। पेड़ की एक शाखा पर बैठकर वह शिकार का इंतजार कर रहा था। परंतु पेड़ की पतितयों से उसकी दृशिट बाधित हो रही थी। उसने कुछ बेल की पतितयां तोड़कर नीचे फेंक दी। संयोग से बेल की वह पतितयां पेड़ के नीचे मौजूद एक शिवलिंग पर गिरा। उसके बाद हिरणों का एक झुंड तालाब में पानी पीने आया। शिकारी एक मादा हिरण पर निशाना साधने लगा। लेकिन हिरणी ने शिकारी को देख लिया था, उसने कहा कृप्या करके थोड़ा इंतजार करो, मुझे मारने से पहले एक बार घर जाने दो ताकि मैं आखिरी बार अपने बच्चों को देख सकूं। इसके बाद मुझे मार देना। शिकारी ने हिरणी को घर जाने की अनुमति दे दी और स्वयं पेड़ की शाखा पर बैठकर उसका इंतजार करने लगा। पूरी रात बीत गर्इ। उसने भोजन भी नहीं किया और गिरने के डर से जागता रहा। अंजाने में उसने शिवलिंग पर बेल पत्ते चढ़ाए, हिरणी की प्रतीक्षा करते करते उसे रात भर उपवास रखना पड़ा और इस दौरान उसके मुंह से शिव का नाम भी निकला। इस तरह महाशिवरात्रि व्रत की सभी शर्तें उसने पूरी की।उसे पता ही नहीं चला कब उसका हदय परिवर्तन हो गया और वह क्षमा की भावना से भर गया।

भोर से ठीक पहले हिरणी अपने पूरे झुंड के साथ वापस आर्इ और बोली अब आप खुशी से मेरी जिंदगी ले सकते हो। हिरणी की इमानदारी देखकर शिकारी का हदय और भी कोमल हो गया। उसने हिरणी को मारने का ख्याल अपने दिमाग से पूरी तरह निकाल दिया। शिव इस बात से इतने खुश हुए कि तुरंत ही उन्हें स्वर्ग लेकर चले गए। शिकारी और हिरणी दोनों को आज भी रात के समय आकाश में तारों के बीच मृगशीर्ष नकक्षत्र के रूप में देखा जाता है।

समुद्र मंथन से निकला विष पीते भगवान शिव

2.शिवरात्रि की एक और पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान अमृत और विष दोनों का कलश निकला था। विष का पात्र देखकर देवता और राक्षस दोनों डर गए , यह विष पूरी दुनिया को तबाह कर सकता था। दुनिया को बचाने के लिए भगवान शिव से मदद मांगी गर्इ और शिव जी ने पूरा विष स्वयं पी लिया,परंतु उन्होने विष को निगला नहीं। विष को गले में ही रोक लिया जिससे उनके गले का रंग नीला हो गया।  शिव जी का एक नाम नीलकंठ भी है। भगवान शिव ने दुनिया की रक्षा की थी इसीलिए आज भी धरतीवासी महाशिवरात्रि का पर्व मनाकर शिव जी के प्रति अपना आभार प्रकट करते हैं।

इस तरह की कर्इ कथाएं प्रचलित हैं। गंगा नदी धरती पर राजा भगीरथ के प्रयासों से आर्इं परंतु तब जब शिव जी गंगा के बहाव को कम करने के लिए उसे अपने जटाओं में रोकने को तैयार हुए, नहीं तो पूरी धरती बह जाती।

महाशिवरात्रि की प्रत्येक कथा से प्रतीत होता है कि विपतित में पड़कर कोर्इ भी भगवान शिव की मदद मांगे तो वह उसकी सुनते हैं। भगवान शिव की पूजा में जल और बेलपत्र आवश्यक है। महादेव को यह दोनो बहुत पसंद है। पर क्यों ?

भोलेनाथ ने विष को गले में रोक लिया परंतु इसका कुछ तो प्रभाव होना ही था। उनका मसितष्क गर्म होने लगा। तब मसितष्क को ठंडा करने के लिए देवताओं ने जल उड़ेलना प्रारंभ किया। इससे शिव जी को थोड़ी राहत मिली। बेल के पत्तों की तासीर ठंडी होती है, इसलिए जल के साथ बेलपत्र भी चढ़ाया गया। जल और बेलपत्र चढ़ाने से शिव जी को शीतलता मिली। तभी से भगवान शिव की पूजा जल और बेलपत्र से होने लगा। भोलेनाथ की पूजा उनके इन पसंदीदा चीजों से की जाए तो वह खुश हो जाते हैं। परंतु भोले बाबा इतने भी भोले नहीं हैं कि वह श्रद्धा , भकित के बिना जल और बेलपत्र की पूजा से खुश हो जाएं। इसलिए श्रद्धा, भकित के साथ शिव लिंग पर जल और बेलपत्र चढ़ाकर पूजा करें भोले बाबा आपकी जरूर सुनेंगे।

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