Thursday, November 23, 2017
User Rating: / 0
PoorBest 

चातुर्मास, क्या करें क्या न करें

      प्रतिवर्ष आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तक के कालखंड, समय को चार्तुमास कहते हैं क्योंकि यह, वह चार महीनों का समय है जब प्रकृति खुद इंसान और भगवान को मिलाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन चार महीनों में शुभ मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश, देवी-देवताओं की प्राण-प्रतिष्ठा, यज्ञादि संस्कार बंद रहते हैं। चातुर्मास्य (चातुर्मास) का सम्बन्ध देवशयन अवधि से है। पुराणों में कहा गया है कि भगवान विष्णु आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चारमास पर्यन्त पाताल में राजा बली के यहाँ निवास करते हैं।

चातुर्मास व्रत कब प्रारम्भ करें - वर्षाकाल के चार महीने सावन, भादों, आश्विन और कार्तिक में सम्पन्न होने वाला उपवास का नाम है चातुर्मास। कुछ भक्त व्रतारम्भ आषाढ़़ शुक्ल एकादशी से करते हैं, कुछ द्वादशी या पूर्णिमा को या उस दिन जब सूर्य कर्क राशि में प्रविष्ट होता है, चातुर्मास व्रत का आरम्भ करते हैं। यह चाहे कभी भी आरम्भ हो, लेकिन कार्तिक शुक्ल द्वादशी को समाप्त हो जाता है। सन्यासी लोग सामान्यतः गुरू पूर्णिमा से चातुर्मास का आरम्भ मानते हैं।

चातुर्मास, आज के वैज्ञानिक परिपेक्ष्य में - चातुर्मास धर्म के माध्यम से सुखी एवं सफल जीवन जीने के लिए पर्याप्त धीरज और संयम रखकर स्वस्थ रहने का मार्ग दिखाता है। इन चार माह में साधना के साथ अगर परहेज किया जाए तो व्यक्ति की जिन्दगी का स्वरूप और जीने के ढंग में विशेष बदलाव आता है। चातुर्मास का समय वर्षाकाल का होता है। आग बरसाती गर्मी की तपन के बाद मनमोहक वर्षा, मौसम परिवर्तन के साथ प्रकृति करवट लेती है और इसी के साथ वातावरण में जीवाणु एवं रोगाणु अधिक सक्रिय हो जाते हैं, ऐसे में चातुर्मास के व्रत में बताया गया परहेज एवं नियम-संयम शरीर को स्वस्थ रखने के लिए कारगर सिद्ध होता है, साथ ही इस काल में यात्राओं एवं आयोजनों का निषेध किया गया है ताकि अनेक लोगों के एकत्र होने से संक्रमण फैलने की सम्भावनाऐं क्षीण रहें।

चातुर्मास उपवास विधि - चातुर्मास की अवधि में साधक व्रत रखकर प्रतिदिन सूर्योदय के समय स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु की आराधना करें। चातुर्मास का आरम्भ निम्नलिखित संकल्प के साथ करना चाहिए हे देव! मैनें यह व्रत आपकी उपस्थिति में लिया है। यदि आप मेरे प्रति अनुग्रह करें तो यह निर्विघ्न समाप्त हो जाए, व्रत ग्रहण के उपरांत बीच ही में मैं मर जाऊँ तो आपके अनुग्रह से यह पूर्ण रूपेण समाप्त माना जाए। 

चातुर्मास व्रत के नियमों का पालन - चातुर्मास में व्रत के साथ-साथ कुछ नियमों का पालन करना चाहिए -

1. चार मासों तक व्रती को कुछ खाद्य पदार्थ त्यागने चाहिए, इस संबंध में सिद्धांत यह है कि श्रावण मास में शाक, भाद्रपद में दही, आश्विन मास में दूध और कार्तिक मास में दालें ग्रहण नहीं करनी चाहिए।

2. चातुर्मास्य का व्रत करने वाले को शय्या-शयन, मांस, मधु आदि का त्याग करना चाहिए। उसे जमीन पर शयन करना चाहिए, पूर्णतः शाकाहारी रहना चाहिए तथा मधु आदि रसदार वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए।

3. गुड़, तेल, दूध, दही, बैंगन, शाकपत्र आदि का सेवन नहीं करना चाहिए। उक्त खाद्य पदार्थों के त्याग का शास्त्रों में निम्नलिखित फल कहे गए हैं -

      (१) गुड़ त्याग से मधुर स्वर प्राप्त होता है।

      (२) तेल त्याग से पुत्र-प©त्र आदि की प्राप्ति होती है और अंग-प्रत्यंग सुंदर हो जाते हैं।

      (३) कड़वे तेल त्याग से शत्रु का नाश होता है।

      (४) घृत त्याग से सौंदर्य मिलता है।

      (५) शाक त्याग से बुद्धि एवं बहुपुत्र प्राप्त होते हैं।

      (६) शाक एवं पत्रों के त्याग से पकवान की प्राप्ति होती है।

      (7) दधि-दुग्ध त्याग से वंशवृद्धि होती है तथा व्रती ग©ओं के लोक में जाता है।

      (८) चातुर्मास्य में जो व्यक्ति उपवास करते हुए नमक का त्याग करता है, उसके सभी कार्य सफल होते हैं।

चातुर्मास व्रत महत्व - चातुर्मास्य में व्रत का विशेष महत्व है, व्रत के भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं, यथा दिन में एक बार भोजन करना, दिन में एक बार अयाचित भोजन करना, दो दिन में एक बार भोजन करना, तीन रात उपवास करके च©थे दिन भोजन करना, पाँच रात उपवास करके छठे दिन भोजन करना इत्यादि। शास्त्रों में इनके फल इस प्रकार कहे गए हैं।

1. जो व्यक्ति प्रतिदिन नक्षत्रों का दर्शन करके ही एक बार भोजन करता है, वह धनवान, रूपवान एवं माननीय होता है।

2. चातुर्मास्य में जो साधक अयाचित भोजन करता है, उसे अपने भाई-बंधुओं से कभी वियोग नहीं होता है।

3. जो व्यक्ति एक दिन अन्तर देकर भोजन करते हुए चातुर्मास्य व्यतीत करता है वह सदा बैकुण्ठ धाम में निवास करता है।

4. जो छठे दिन भोजन करता है, वह राजसूय एवं अश्वमेघ यज्ञों का सम्पूर्ण फल पाता है।

5. जो सदा तीन रात उपवास करके च©थे दिन भोजन करते हुए चातुर्मास्य करता है, वह मोक्ष को प्राप्त होता है।

चातुर्मास व्रत उद्यापन - चातुर्मास्य के व्रत समाप्त होने पर व्रती को ब्राह्मणों को निमंत्रित कर भोजन कराना चाहिए। उन्हें दक्षिणा देकर यह प्रार्थना करनी चाहिए, हे प्रभु! आपको प्रसन्न करने के लिए मेरे द्वारा यह व्रत लिया गया था, हे जनार्दन! जो भी दोष हो आपकी कृपा से यह पूर्ण हो।

culture

Who's Online

We have 665 guests online
 

Visits Counter

750290 since 1st march 2012