Monday, November 20, 2017
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ज्योतिषाचार्य आशुतोष वार्ष्णेय के अनुसार बुधवार को आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि प्रातः 10:54 तक है, उसके बाद आश्विन शुक्ल प्रतिपदा का संचरण होगा जो कि 25 सितम्बर, गुरूवार को दोपहर 12:14 तक रहेगी। उदिया तिथि में प्रतिपदा 25 तारीख को होने के कारण नवरात्र में भगवती का पूजन गुरूवार से प्रारम्भ होगा। कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त बृहस्पतिवार को सूर्योदय से लेकर प्रातः 9:49 तक और प्रातः 11:26 से दोपहर 12:14 तक होगा।

 

डोली पर आएगी मां दुर्गा - शास्त्रों के अनुसार आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तिथि तक मां दुर्गा पृथ्वी पर निवास करती हैं इसलिए इसे नवरात्र के नाम से जाना जाता है। पितृपक्ष समाप्ति पर जब सभी पितृगण पृथ्वी से अपने लोक लौट रहे होते हैं उसी दिन मां अपने लोक से पृथ्वी के लिए प्रस्थान करती हैं। ग्रह नक्षत्रम् ज्योतिष शोध संस्थान के निदेशक ज्योतिषाचार्य आशुतोष वार्ष्णेय के अनुसार माता का वाहन यूं तो सिंह है लेकिन वार के अनुसार हर साल माता का वाहन अलग-अलग होता है। यानी माता सिंह की बजाय दूसरी सवारी पर सवार होकर भी पृथ्वी पर आती हैं। इस संदर्भ में शास्त्रों में कहा गया है कि

शशिसूर्ये गजारूढ़ा शनिभौमे तुरंगमे। गुरौ शुक्रे च दोलायां बुधे नौका प्रकीर्ति्तता

      अर्थात सोमवार व रविवार को प्रथम पूजा यानी कलश स्थापना होने पर मां दुर्गा हाथी पर आती हैं। शनिवार तथा मंगलवार को कलश स्थापना होने पर माता का वाहन घोड़ा होता है। गुरुवार अथवा शुक्रवार के दिन कलश स्थापना होने पर माता डोली अर्थात् पालकी पर चढ़कर आती हैं। बुधवार के दिन कलश स्थापना होने पर माता नाव पर सावर होकर आती हैं। माता जिस वाहन से पृथ्वी पर आती हैं उसके अनुसार वर्ष में होने वाली घटनाओं का भी आंकलन किया जाता है। इस वर्ष कलश स्थापना 25 सितम्बर 2014 दिन गुरूवार को होगा, अतः इस बार माता डोली अर्थात् पालकी पर सवार होकर आ रही हैं। वर्तमान में देवगुरू बृहस्पति एवं शनि ग्रह अपनी-अपनी उच्च राशि में हैं। ग्रह-नक्षत्रों के प्रभाव से इस बार का नवरात्रि पूजन भक्तों को धन-धान्य की प्राप्ति कराएगा, साथ ही महिलाओं के वर्चस्व में भी बढ़ोत्तरी होगी, महिलाओं को विभिन्न क्षेत्रों में सम्मानित किया जाएगा। गुरूवार के दिन नवरात्र का आरम्भ होना भक्तों के मन-मस्तिष्क की प्रगति का मार्ग प्रशस्त करेगा।

प्रथम दिन होगा मां शैलपुत्री रूप का पूजन - भगवती के शैलपुत्री के स्वरूप का पूजन किया जाएगा। नवरात्र के प्रथम दिन माँ शैलपुत्री के स्वरूप की आराधना होती है। माँ दुर्गा का शैलपुत्री नाम पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने से पड़ा है। सती द्वारा यज्ञ अग्नि में स्वयं को भस्म करने के पश्चात् ये पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में जन्मीं। माँ शैलपुत्री वह शक्ति हैं, जो हमें साधना में लीन होने की शक्ति, साहस एवं बल प्रदान करती हैं। पर्वतों वाली देवी भी शैलपुत्री का ही स्वरूप है। भगवान शंकर प्रकृति के देव हैं। कैलाश पर्वत पर उनका वास है अ©र माँ शैलपुत्री का भी वास पर्वतों पर ही है। माँ शैलपुत्री के दाहिने हाथ में त्रिशूल एवं बाएँ हाथ में कमल पुष्प सुशोभित रहता है। प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को ‘मूलाधार’ चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योग साधना का प्रारम्भ होता है।

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