Monday, November 20, 2017
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नेपाल में अनेक मंदिर हैं। शनिवार 25 अप्रैल 2015 को आए विनाशकारी भूकंप से नेपाल के कई धरोहरों को नुकसान पहुंचा है तो कुछ का नामों निशान मिट चुका है। एक ऐसा ही मंदिर काष्ठमंडप शनिवार को भूकंप आने से पहले तक काठमांडू में गर्व से सर ऊंचा करके खड़ा था। परंतु 7.9 तीव्रता के भूकंप ने इसको भी धाराशयी कर दिया। आइए इस मंदिर के इतिहास पर एक नजर डालते हैं।

काष्ठमंडप का अर्थ है लकड़ी से ढ़का आश्रय स्थल। यह मारू, काठमांडू में स्थित तीन मंजिला मंदिर है। यह नेपाल के सबसे बड़े और लोकप्रिय पैगोडाओं में से एक है। इस पैगोडा में गोरखनाथ की मूर्ति लगी है।

पैगोडा स्टाइल से बने इस मंदिर का निर्माण 16वीं सदी के शुरूआत में राजा लक्ष्मी नरसिंह मल्ल ने करवाया था। संपूर्ण मंदिर एक ही पेड़ की लकड़ी से बना है। कहते हैं काठमांडू शहर का नाम भी काष्ठमंडप से ही पड़ा। साल में एक बार मंदिर में एक बड़ा अनुष्ठान होता है। यह मंदिर पर्यटकों में बहुत लोकप्रिय है। सभी लोगों को इस मंदिर में जाने की अनुमति है पर मंदिर के भीतर फोटोग्राफी की इजाजत नहीं है। मंदिर में गोरखनाथ की मूर्ति है।

काष्ठमंडप के विषय में नेपाल में कई कथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि मछिन्द्रनाथ के शिष्य गोरखनाथ मछिन्द्रनाथ के रथो के जुलूस के दौरान साधारण मानव के रूप में नेपाल आए थे। इसके बावजूद एक तांत्रिक ने उन्हें पहचान लिया। उस तांत्रिक ने गोरखनाथ को पहचान कर पकड़ लिया जिससे वह काठमांडू छोड़कर न जा पाएं। जब गोरखनाथ को पता चला कि वह पकड़े जा चुके हैं तो उन्होने तांत्रिक से कहा कि वह उनसे कुछ भी मांगे, और बदले में उन्हें काठमांडू से जाने दे। तांत्रिक ने उनसे एक मंदिर निर्माण के लिए आवश्यक सामग्री मांगी। अगले वर्ष तांत्रिक के खेत में एक विशालकाय पेड़ उगा। पेड़ इतना विशाल था कि  तांत्रिक ने उस पेड़ की लकड़ी से ही पूरा मंदिर बना डाला। अब इस बात में कितनी सच्चाई है यह कोई नहीं जानता, न ही कोई ऐसी बातों में सच्चाई का पता करने की कोशिश करता है। परंतु आज की सच्चाई है काष्ठमंडप भूकंप को सह नहीं पाया। भले ही यह मंदिर अब हमारे बीच नहीं है लेकिन भक्त हमेशा ही जिस जगह पर मंदिर बना था वहां सर झुकाने आते रहेंगे।

 

 

 

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