Sunday, February 25, 2018
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भारत के विभिन्न राज्यों में लक्ष्मी पूजा विभिन्न तिथियों पर होती है। उत्तर भारत के अधिकतर लोग दिवाली पर लक्ष्मी की पूजा करते हैं। दक्षिण में वार लक्ष्मी पूजा होती है। पूर्वी भारत में लक्ष्मी पूजा बिल्कुल अलग तरीके से होती है। बंगाली समुदाय धन की देवी लक्ष्मी की पूजा कोजागरी पूर्णिमा के दिन करते हैं , इसलिए बंगालियों द्वारा किये जाने वाले लक्ष्मी पूजा को कोजागरी लक्ष्मी पूजा कहते हैं। नवरात्र के बाद पड़ने वाले पूर्णिमा के दिन कोजागरी लक्ष्मी पूजा होती है। पश्चिम बंगाल में यह पूजा बहुत महत्वपूर्ण है।
कोजागरी की कथा- बहुत समय पहले की बात है। एक राजा था, दिल का बहुत उदार। उसे अपनी प्रजा बहुत प्रिय थी। उसे अपने राज्य में रहने वाले शिल्पकारों की बहुत चिंता थी। राजा ने शिल्पकारों को आश्वासन दिया था कि उनके द्वारा बनाया गया जो शिल्प साप्ताहिक बाजार में नहीं बिकेगा उसे वह स्वयं खरीद लेंगे।
इसी तरह एक बार गरीबी की देवी अलक्ष्मी की लोहे की प्रतिमा राजा के महल में आ गई। राजा ने प्रतिमा पूजा कक्ष में रखी। उसी रात राजा ने एक स्त्री के रोने की आवाज सुनी। वह आवाज पूजा कक्ष से आ रही थी। राजा जल्दी से पूजा कक्ष में गए और देखा कि एक सुंदर स्त्री पूजा कक्ष में बैठी हुई रो रही है। राजा ने स्त्री से पूछा कि वह क्यों रो रही है। उस सुंदर स्त्री ने कहा कि वह धन की देवी लक्ष्मी है। वह दुखी है क्योंकि वह गरीबी की देवी अलक्ष्मी के साथ नहीं रह सकती। राजा ने देवी लक्ष्मी की बात सुनी तथा गरीबी की देवी अलक्ष्मी की प्रतिमा को महल से बाहर फेंकने का निर्णय लिया। देवी लक्ष्मी इस बात से खुश हो गईं। जब राजा उस प्रतिमा को महल से बाहर ले जा रहे थे तभी उन्हें महसूस हुआ कि यह प्रतिमा बनाने वाले शिल्पकार का अपमान है। राजा ने प्रतिमा को किसी दूसरे कक्ष में रखने का निर्णय लिया। राजा के ऐसा करने पर सभी देव देवी राजा को छोड़कर जाने लगे क्योंकि राजा अलक्ष्मी को महल में लाए थे।
धीरे धीरे भाग्य, सफलता, और ज्ञान की देवियां राजा को छोड़कर चली गईं। राज्य अपनी गरिमा खोने लगा और एक गरीब राज्य बन गया। प्रत्येक रात एक देवी रोतीं और राजा को छोड़कर चली जाती। राजा बहुत परेशान थे और क्या करें यह समझने में असमर्थ । एक रात धर्म के देवता रोने लगे और कहा कि वह राज्य छोड़कर चले जाएंगे। राजा बहुत चिंतित हुए। राजा ने सोचा कि यदि धर्म देव चले गए तो राज्य की खोई गरिमा कभी नहीं लौटेगी। राजा ने धर्म देव को किसी भी तरह रोकने का मन बनाया। उन्होने धर्म देव से कहा कि वह अलक्ष्मी की प्रतिमा एक शिल्पकार से लाए थे। अगर वह प्रतिमा फेंक देते तो शिल्पकार की प्रतिभा का अपमान होता, इसलिए उन्होने प्रतिमा नहीं फेंकी।
धर्म देव राजा की इस बात से बहुत खुश हुए और राजा की मदद करने का फैसला किया। उन्होन कहा कि रानी को कोजागरी लक्ष्मी पूजा व्रत करना चाहिए।
रानी ने आश्विन माह में पूर्णिमा के दिन कोजागरी लक्ष्मी पूजा का व्रत रखा। वह पूरी रात ध्यान करती रहीं। एक पल के लिए भी नहीं सोईं। रानी ने पूरे दिल से पूजा की और उसकी पूजा में बहुत शक्ति थी। रानी की धार्मिक भावना और निष्ठा देखकर गरीबी की देवी अलक्ष्मी की लोहे की प्रतिमा गल गई।
इससे राजा की चिंता दूर हो गई। उन्हें शिल्पकार का अपमान भी नहीं करना पड़ा और प्रतिमा भी गल गई। अब राज्य का गौरव वापस लौटने लगा। जब देश के लोगों ने यह कहानी सुनी तो उन्होने भी कोजागरी लक्ष्मी पूजा का व्रत करने का निश्चय किया। इस तरह कोजागरी लक्ष्मी पूजा का व्रत लोकप्रिय हुआ।
धीरे धीरे हर घर में यह प्रथा मशहूर हो गई। लोग आज भी इस परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं। ज्यादातर कोजागरी लक्ष्मी पूजा बंगाली समुदाय के लोग मनाते हैं। यह पूजा घर पर तो कर ही सकते हैं। आजकल अनेक बारवारियों में भी लक्ष्मी पूजा मनाया जाता है।
कोजागरी पूर्णिमा को शरद् पूर्णिमा भी कहते हैं। शरद् पूर्णिमा के चांद का बहुत महत्व है। कहते हैं इस दिन का चांद धरती पर अमृत बरसाता है। अरे आपने आज का चांद नहीं देखा, जल्दी करिये कहीं रात न बीत जाए।

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