Monday, November 20, 2017
User Rating: / 0
PoorBest 

didiwa

दिपावली कल भी मनाई जाती थी,आज भी मनाई जाती है और आने वाले वर्षों,युगों में भी मनाई जाएगी पर इसका स्वरूप दिन प्रतिदिन बदलता जा रहा है। आज की दिपावली पर आधूनिक तकनीक हावी हो गई है और साल दर साल नई तकनीक आती ही जा रही है। हम लोग भी हर साल इसे अपना लेते हैं। हां पहले जमाने की दिपावली में आधूनिक तकनीक का प्रयोग नहीं होता था पर खुशियों में कमी नहीं थी। अनेक लोगों का मानना है कि आज की दिपावली में रोशनी और आनंद दोनों ही अधिक है क्योंकि पहले की दिपावली परंपरागत होती थी, इसमें आज की तरह तड़क भड़क नहीं होती थी। परंतु ये लोग नहीं जानते कि पहले दिपावली कैसे मनाई जाती थी और इसमें कितना आनंद आता था।

पहले जमाने में सभी घरों में मिट्टी का दीया जलाया जाता था। कुम्हारों के लिए यह कमाने का सबसे बड़ा अवसर होता था इसलिए महीनों पहले से ही वे लोग दीया बनाना प्रारंभ कर देते थे। बड़े बड़े जमींदार, रईसों के घर या हवेलियों में हजारों दीया जलाया जाता था। उस समय दीया का स्थान मोमबत्ती ने नहीं लिया था। पहले भी पांच दिन ही दिपावली मनाई जाती थी। छोटी दिवाली और बड़ी दिवाली के दिन घर को दीयों से सजाया जाता था, बाकी तीन दिन मुख्य द्वार पर दीया जलाया जाता था, घर में पूजा होती थी,पकवान बनते थे। कुल मिलाकर वातावरण आनंद का होता था।
छोटी दिवाली को नरक चतुर्दशी कहते हैं। बंगाली समुदाय के लोग इसे भूत चतुर्दशी कहते हैं। उस दिन सिर्फ चैदह दीया जलाया जाता है और इन दीयों को घर के अंधेरे स्थानों पर रखा जाता है ताकि घर का कोई भी कोना अंधेरा न रहे। बड़े बुजुर्गां का मानना था कि भूत चतुर्दशी के दिन अगर कोई स्थान गंदा या अंधकार रहे तो भूत वहां आकर बैठ जाता है। मैं जब छोटी थी तब मेरी मां भी मुझसे यही कहती थीं और मैं उनकी बात मानती थी। मेरी बेटी बचपन में कुछ कुछ इसे मानती थी पर आज के बच्चों के लिए ऐसी बातें मजाक है। अब मुझे भी यह सोचकर हंसी आती है और मैं सोचने को मजबूर हो जाती हूं कि बचपन में हम लोग कितने बेवकूफ थे। परंतु आज बंगाली समुदाय के लोग इस कारण को नहीं मानते , परंपरा को मानते हैं।
धीरे धीरे दीया का स्थान मोमबत्ती ने ले लिया। दीया जलाने के लिए बाती बनानी पड़ती थी, दीया को पहले पानी में भिगोना पड़ता था, फिर दीया को सुखाकर प्रत्येक दीये में बाती लगाकर तेल डालकर उसे जलाना पड़ता था। मोमबत्ती बाजार से खरीद लाए और जला दिया। खुशी तो इसमें भी मिली लेकिन देखिए किस तरह खुशी का स्वरूप बदलता गया और व्यक्तिगत भागीदारी कम होने लगी। बीतते समय के साथ दीया और मोबत्ती का स्थान बिजली के झालरों ने ले लिया। इलेक्ट्रीशियन को बता दिया, झालर लग गए, बस शाम को स्विच आॅन कर दिया। रोशनी तो हुई पर व्यक्तिगत भागीदारी और कम हो गई।
झालर लगाना बुरी बात नहीं है। लेकिन दीया जलाने से कीड़े मकौड़े मर जाते थे और पहले के जमाने में दिवाली के बाद कीड़ा कम हो जाता था। आजकल झालर लगाने की वजह से बढ़ जाता है। झालर रात भर जल सकता है लेकिन दीया कुछ घंटे बाद बुझ जाता है जो कि दिवाली में होना चाहिए। आजकल दिवाली पर भी झालर से घर को इस तरह सजाया जाता है मानो शादी का घर हो । समझना मुश्किल हो जाता है कि शादी का घर है या दिवाली की सजावट। झालर रात भर जलने से बिजली की बहुत खपत होती है और यह पर्यावरण के लिए नुकसानदेह है। इसलिए एक बार घर को दीयों से सजाकर व्यक्तिगत भागीदारी निभाएं और महसूस करें कि इसमें कितना आनंद आता है। इसमें बच्चों को भी शामिल कीजिए और उन्हें ईको फ्रेंडली दिवाली का मतलब समझाएं।
आजकल बाजार में कागज पर पेंट की बनी हुई रंगोली मिलती है। कुछ लोग उसे खरीदकर रंगोली की जगह प्रयोग करते हैं। आपको जैसी रंगोली आती है आप वैसा ही बनाएं लेकिन स्वयं बनाएं। कई रंगों से आप जैसी भी रंगोली बनाएंगी घरवालों को अच्छी ही लगेगी और खुद को संतुष्टि मिलेगी सो अलग तथा ईको फ्रेंडली तो होगा ही।
कंदील लगाना भी दिवाली की परंपरा है।बाजार में तरह तरह के बने बनाए कंदील मिलते हैं। यह कंदील घर पर भी बनाए जा सकते हैं।हां दिवाली की व्यस्तता के कारण आपको कंदील बनाने का वक्त नहीं मिल पाएगा। बच्चों से कंदील बनवाएं। यदि उन्हें कंदील बनाना न आता हो तो वह नेट से सीखकर बना सकते हैं। अपने हाथ से कंदील बनाकर बच्चों को अवश्य अधिक आनंद आएगा।
आजकल लोग बाजार से बना बनाया घरौंदा खरीद लाते हैं। परतु पहले जमाने में घरौंदा घर ही में बनता था। बच्चे बड़ों की मदद से इसे बागीचे या आंगन में बनाते थे। मिट्टी और ईंट से बने इस घरौंदे की पुताई होती थी।फिर दिवाली के दिन इस पर दीया लगाया जाता था और घर में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को बच्चे बड़े गर्व के साथ अपना घरौंदा दिखाते थे। आज ज्यादातर लोग फ्लैटों में रहते हैं जहां आंगन और बागीचा नहीं होता है तो आप छोटा घरौंदा बाॅलकनी या मुख्य द्वार के बगल में बना सकती हैं। बच्चों के साथ मिलकर घरौंदा बनाएं । आजकल के बच्चे तो जानते ही नहीं कि घरौंदा घर पर भी बन सकता है और बाजार के घरौंदे तथा अपने हाथ से बनाए घरौंदे में क्या फर्क है।
दिवाली में घर में मेहमान आते हैं, मिठाईयां मंगाई जाती है। यह भी एक परंपरा बन चुका है। इन दिनों बाजार के मिठाई और पकवान में मिलावट बहुत ज्यादा होता है। बड़े से बड़े दुकान पर भी अब भरोसा नहीं किया जा सकता। आप जिस प्रांत में रहती हैं उस जगह की दिवाली की पारंपरिक मिठाईयां घर पर बनाएं। अगर बनाना न आता हो तो रेसीपी बुक से सीख सकती हैं।
आईए इस बार दिवाली पर अपनी व्यक्तिगत भागीदारी बढ़ाएं और अपने हाथों से सब कुछ बनाकर यह त्यौहार मनाएं। साथ साथ आपकी दिवाली ईको फ्रेंडली भी होनी चाहिए। ईको फ्रेंडली दिवाली मनाने के कुछ तरीके तो मैने आपको बता ही दिए हैं परंतु दिवाली पूणतः ईको फें्रडली तभी होगी जब पटाखों पर रोक लगाई जाए। रोक लगाने का मतलब पटाखे न जलाना नहीं है। पटाखे जलाएं पर सीमित मात्रा में। आप स्वयं ही देखते हैं कि दिवाली पर अत्यधिक पटाखे जलाने से कई दिन तक पर्यावरण कितना प्रदूषित रहता है। यह बात बच्चों को समझाएं। पटाखे जलाते वक्त हर साल कितने बच्चे, बड़े आग से जल जाते हैं। कितने तो हमेशा के लिए अपाहिज हो जाते हैं। कितने घरों में दिवाली के दिन हमेशा के लिए अंधेरा छा जाता है। इससे बचें । पटाखे कम जलाएंगे तो इसका डर भी नहीं रहेगा।
दिवाली पर परंपरा के नाम पर कुछ कुरीतियां चल रही हैं। जैसे दिवाली के दिन जूआ खेलने से घर में लक्ष्मी आती है। जूआ खेलने पर कभी भी लक्ष्मी नहीं आती है बल्कि जूआ खेलने से लक्ष्मी घर से चली जाती है। अगर आप जीत भी जाते हैं तो ऐसा धन कभी भी नहीं रहता है। जूआ खेलकर घर को न बर्बाद करें। दिवाली के दिन शराब पीना ही चाहिए। दिवाली के दिन भी शराब उतनी ही नुकसानदायक होती है जैसा की हमेशा। यह परंपरा हो ही नहीं सकती। जिससे लोगों को क्षति पहुंचे वह परंपरा नहीं है। कहा जाता है कि दिवाली के दिन रात को भी बाहर का दरवाजा खोलकर रखना चाहिए ताकि लक्ष्मी घर में प्रवेश कर सकें। दरवाजा खोलकर रखेंगे तो लक्ष्मी आएं न आएं चोर अवश्य आ जाएंगे और लक्ष्मी यानि धन,गहने इत्यादि लेकर चले जाएंगे।भगवान के आने के लिए क्या दरवाजा खोलकर रखना पड़ता है। दिवाली ऐसे मनाएं जिससे की आपको बच्चों और परिवार के दूसरे सदस्यों के सामने मुंह न छिपाना पड़े तथा दिवाली बीत जाने के बाद भी आप इसे खुशी खुशी याद कर सकें।

Add comment

We welcome comments. No Jokes Please !

Security code
Refresh

culture

Who's Online

We have 1520 guests online
 

Visits Counter

749580 since 1st march 2012