Saturday, November 25, 2017
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होली शब्द सुनते ही रंग, अबीर,गुलाल, पिचकारी आंखों के आगे आ जाती है। होली को रंगों का त्यौहार कहते हैं। कुमाँऊ की होली या कुमाँऊनी होली भी रंगों से ही खेली जाती है परंतु इसकी शुरूआत कुछ हटके होती है। कुमाँऊनी होली केवल उत्तराखंड ही नहीं बल्कि पूरे देश में बहुत प्रसिद्ध है।
कुमाँऊ के लोगों के लिए यह बहुत बड़ा त्यौहार है। यंwतो होली को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में देखा जाता है परंतु कुमाँऊ में होली को किसी और रूप में भी देखा जाता है जो वहां के कृषि प्रधान समाज के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, वह है शीत ऋतु की समाप्ति और बोआई के नए साल की शुरूआत।
रंगों से तो होली हर जगह खेली जाती है पर कुमाँऊनी होली की असली सुंदरता रंगों से खेली जाने वाली होली में नहीं बल्कि संगीत से खेली जाने वाली होली में है। इसे बैठकी होली, खड़ी होली और महिला होली कहते हैं। यह तीनों प्रकार की होली बसंत पंचमी से शुरू होती है। कुमाँऊ में होली का त्यौहार दो महीने तक मनाया जाता है। बैठकी होली को निर्वाण की होली भी कहा जाता है। बैठकी होली और खड़ी होली के गीतों को सुर, मस्ती और धार्मिकता का स्पर्श अनूठा बना देता है।
यह तीनों रूप कुमाँऊनी होली की संगीतमय परंपरा है। इनका मूल विशेषतः बैठकी होली का 15वीं सदी को जाता है। 15वीं सदी में चांद राजाओं के चम्पावत राज महल और उसके आस पास के क्षेत्र कालीकुमाँऊ, सूई और गुमदेश में ब्रज और कुमाँऊनी संगीत का मिश्रित रूप प्रचलन में था। चांद राजाओं के राज्य विस्तार और कुमाँऊ के उनके अधीन आने से होली की परंपरा संपूर्ण कुमाँऊ में फैल गया और उसमें एक अलग ही कुमाँऊनी रस घुल गया।

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बैठकी होली
बैठकी होली मंदिरों से प्रारंभ होती है, वहां होली गीत गाने वाले होल्यार और अन्य लोग गीत गाने के लिए संगीत वाद्य हारमोनियम और तबला लेकर एकत्रित होते हैं। बैठकी होली गीत हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के शास्त्रीय परंपरा पर आधारित है परंतु यह कुमाँऊनी लोक संगीत के परंपरा से भी अत्यधिक प्रभावित है।
बैठकी होली का अर्थ है बैठकर गाए जाने वाले होली गीत। यह बसंत पंचमी से प्रारंभ होकर पूरे कुमाँऊ में धुलंडी तक चलता है। कुमाँऊ के कुछ क्षेत्रों में सर्दी के दौरान पौष माह के पहले रविवार से ही प्रारंभ हो जाता है। यह बैठकें स्थानीय सामुदायिक केंद्रों या घर पर भी होता है। यह होली गीत सामान्यतः हिंदूओं के भगवान श्री कृष्ण के जीवन पर आधारित होती हैं परंतु बैठकी होली में मुसलमान और इसाई भी भाग लेते हैं।

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खड़ी होली
खड़ी होली ज्यादातर कुमाँऊ के ग्रामीण इलाकों में मनाई जाती है।खड़ी होली बैठकी होली के कुछ दिन बाद प्रारंभ होती है। खड़ी होली के गीत गाने वाले नोकदार टोपी, चूड़ीदार पैजामा और कुर्ता पहनते हैं। यह लोग ढ़ोल और हुरका के धुनों पर गाते हुए नाचते हैं।
पुरूषों का समूह खड़े होकर खड़ी होली के गीत गाता है। खड़ी होली की तुलना में बैठकी होली अधिक सभ्य होती है। इसका अर्थ यह नहीं कि खड़ी होली असभ्य है। खड़ी होली में मस्ती अधिक है और उसके गीत कुमाँऊनी रंग से सराबोर होते हैं।
महिला होली
महिला होली ठीक बैठकी होली के जैसा ही होता है। बस बैठकी होली में पुरूषों का समूह गाता है और महिला होली में महिलाओं का समूह।

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कुमाँऊनी होली के रस्म 

चीर बंधन और चीर दहन
होलिका दहन प्रत्येक शहर में होता है। कुमाँऊ में होलिका दहन को चीर दहन कहते हैं। धुलंडी के पंद्रह दिन पहले चीर को तैयार किया जाता है। उस समारोह को चीर बंधन कहते हैं। हर गांव और मोहल्ले के चीर का बहुत ध्यान रखा जाता है अर्थात पहरा दिया जाता है, ताकि दूसरे गांव या मोहल्ले वाले उसे चुरा न सकें। यह चीर होली के त्यौहार का केंद्र बिंदु है।
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छरड़ी
धुलंडी को कुमाँऊ में छरड़ी कहते हैं। छरड़ी प्राकृतिक रंगों से खेली जाती है जो फूलों के रस से बनती है। छरड़ी में मुख्यतः अबीर और गुलाल का प्रयोग होता है जो सभी रंगों के होते हैं। गीले रंगों का भी प्रयोग होता है जो टेसू के फूलों से बनते हैं। होली खेलने की एक पारंपरिक वस्तु अब कभी कभार दिख जाती है, लाख के गोले में लाल रंग का पाऊडर जो अचानक भीड़ पर टूटता है और लाल पाऊडर भीड़ पर गिरती है।
शुभकामना
होली के त्यौहार की समाप्ति के समय सभी लोग अबीर, गुलाल हवा में उड़ाते हुए जोर जोर से कुमाँऊनी भाषा में स्वस्थ और समृद्ध साल के लिए प्रार्थना करते हैं।
इस तरह कुमाँऊनी होली का समापन होता है। वहां के कृषि प्रधान समाज के लोगों के आंखों में अच्छे फसल का सपना होता है और वे अगली होली का इंतजार करते हैं।

 

 

 

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