Saturday, November 25, 2017
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'' आज बिरज में होली रे रसिया "

होरी की इस पंकित से उड़ते हुए अबीर गुलाल और पिचकारी से रंगों की बौछार की छवि चिति्रत होती है। यह छवि इलाहाबाद की होली में भी कभी नजर आती थी । बुद्धिजीवी , रईस और सर्वसाधारण मिलकर जो रंगीन होली मनाते थे उसका एक सांस्कृतिक महत्व था। इलाहाबाद बुद्धिजीवी और रईसों का शहर कहलाता था। इलाहाबाद में होली का इतिहास बहुत पुराना है। प्राचीन काल से हर दौर - मुसिलम शासन काल , अंग्रेजी शासन काल और विभाजन के बाद से लेकर आज तक होली खेली जा रही है।लेकिन उसका चेहरा बदल गया है। शहर में सभ्य और मर्यादित होली का स्थान अश्लील और फूहड़ होली ने ले लिया है। यहां साहित्यकार ,बुद्धिजीवी, रईस और सर्वसाधारण मिलकर होली खेलते थे। होली के बदलते स्वरूप के साथ साथ संभ्रांत लोगों को अलग होना पड़ा।

शहर के साहित्यकारों की होली का समां ही कुछ और होता था। भारती , लक्ष्मीकांत वर्मा ,गिरधर गोपाल की टोली इत्यादि नन्हे भइया ,पाठक जी या महादेवी जी के यहां होली खेलने जाती थी।रंगों की बौछार से अधिक यहां साहित्य की बौछार होती थी। डाण्एण्पीण्वर्मा ,बाबू काशी प्रसाद जायसवाल ,उमाकांत मालवीय आदि हीवेट रोड सिथत भोलानाथ गहमरी के घर होली खेलने जाते थे।रंगों के साथ ही साहित्य का दौर चलता, कविताएं होती ,मिठाई खाई जाती थी। कुल मिलाकर उल्लासमय वातावरण होता था।लेकिन इससे भी अधिक उल्लास से भरपूर होते थे भोलानाथ जी के पड़ोसी। वह हर साल होली के दिन र्निवस्त्र होकर अपने घर से मोतीमहल तक जाते थे। उनके पीछे पीछे भारी भीड़ चलती थी। लेकिन लोग इसमें अश्लीलता नहीं देखते थे।

चलते हैं रईसों की होली की ओर जो पारंपरिक ढ़ंग से मनाई जाती थी। इनके दरवाजे समान रूप से अमीर गरीब सभी के लिए खुले रहते थे। दारागंज में रामचरन अग्रवाल बच्चा जी, जार्ज टाउन में पंण् मदन मोहन मालवीय , चौधरी नौनिहाल सिंह ,डाण्डीण्आरण् भटटाचार्या और अनेक रईसों के घर पर सिवमिंग पुल या हौज में रंग घोला जाता था। उस समय प्राकृतिक रंगों का ही प्रयोग होता था। कुछ रंग सूखने पर उड़ जाते थे। रंग में गुलाबजल ,गुलाब की पंखुडि़यां या केवड़ा डाला जाता था।रंग हल्के गरम पानी में ही घोला जाता था । गीली होली केवल दिन में ही पीतल या चांदी की पिचकारी से खेली जाती थी। पुरूष और महिलाएं मर्यादा में रहते हुए एक साथ मिलकर होली खेलते थे।

होली का अटूट हिस्सा होता है भांग। वहां भी भांग की कुल्फी खाई जाती थी। कई तरह के मिठाईयों व नमकीन के अलावा विशेष रूप से महिलाओं के लिए ठंडई होती थी। भांग घोटने के लिए अलग से आदमी बुलाए जाते थे। महिलाएं होली के गीत गाती थीं। आज कोई भी तयौहार हो उसके लिए डिजायनर कपड़े बाजार में आ जाते हैं।उस जमाने में डिजायनर कपड़े तो नहीं थे पर शाम को होली मिलन समारोह में महिलाएं साड़ी और गहने , पुरूष चुन्नटदार तंजेब का नया कुर्ता और महीन लठठे का पैजामा या धोती पहनते थे।इसकी शान डिजायनर कपड़ों से कम नहीं थी। शाम को लाल अबीर व गुलाबी गुलाल तथा इत्र एक दूसरे को लगाने के पश्चात सभी लोग सांस्कृतिक कार्यक्रम का आनंद उठाते थे।सांस्कृतिक कार्यक्रम के अंतर्गत गायन ,नृत्य और कुछ स्थानों पर मुजरा भी होता था।होली का उत्सव राति्रभोज के बाद ही सम्पन्न होता था।

 

सर्वसाधारण भी बाल्टी में रंग घोलकर पीतल या टिन की पिचकारी से दिन में गीली होली खेलती थी। यह लोग मुहल्ले में निर्धारित जगह पर टोलियों में एकति्रत होकर होली खेलते थे। रंग के साथ गुलाल भी गीला करके लगाते थे। यहां भी भांग , माजूम , ठंडई और मिठाईयां होती थी। शाम को होली मिलन में यह वर्ग भी नया या धुला सफेद कपड़ा पहनता था। साधारण लोग सब कुछ अपनी हैसियत के अनुसार करते थे। लेकिन इन तीनों तरह की होली में गाली की फुहार एक परंपरा थी जो आज गाली- गलौज में बदल गई है। ब्रज में आज भी रंगों के साथ गाली की फुहार परंपरा ही है।

सत्तर के दशक से ही होली का स्वरूप बदलने लगा। बसंत के मौसम में जब प्रकृति रंग-बिरंगे फूलों के साथ होली का स्वागत करते हैं तो होली के गीत प्रकृति के सौंदर्य को कई गुना बढ़ा देती थी। लेकिन आजकल होली के गीत नहीं लाउडस्पीकर पर सस्ते और फूहड़ फिल्मी गीत होते हैं। इस कानफोड़ू संगीत से ध्वनि प्रदूषण फैलता है। अब अबीर , गुलाल या प्राकृतिक रंगों का स्थान पेंट , वार्निश , कालिख ,कीचड़ अथवा रसायनिक रंगों ने ले लिया है जो त्वचा के लिए हानिकारक है और जल्दी छूटता नहीं। आजकल सबेरे भांग खाई जाती है और शाम को शराब।

शहर में बसंत ऋतु के दौरान होली के आस पास कार्यक्रमों का सिलसिला शामों को रंगीन बना देता था।आकाशवाणी इलाहाबाद होली के पूर्व सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन आकाशवाणी परिसर में करता था जहां झूला ,कजरी और होरी की धूम होती थी। यहां गिरजादेवी , रसूलनबाई, सिद्धेश्वरी देवी ,बड़ी मोती बाई जैसे कलाकार बनारस से आते थे।कोतवाली के पीछे रानी मंडी में बरसों कोठी पर खास लोगों के लिए महफिल जमती थी जो बाद में सर्वसाधारण के लिए खोल दी गई। मानसरोवर चौराहे पर राजा भैया ; राजा पांडेद्ध गीत संगीत का कार्यक्रम करवाते थे। स्वरूपरानी पार्क में साहितियक कार्यक्रम लंठ सम्मेलन होता था। आज वह खुल्दाबाद गुरूद्वारे के पास होता है जिसमें सभी धर्म के लोग हिस्सा लेते हैं। महामूर्ख सम्मेलन आज भी होता है।इन दोनों कार्यक्रमों में विद्वानों को सम्मानित किया जाता है।

अहियापुर में क्षति्रयों की होली आज भी अपने अनोखेपन के लिए प्रसिद्ध हैं। पहले होली पर साम्प्रदायिक झगड़ा और कफयर्ू लगना आम बात थी।अब ऐसा नहीं होता है। होली जैसी भी हो युवाओं में सदभाव की जागरूकता आ रही है। होलिका दहन की अपनी परंपरा होती थी। होली और किसान का रिश्ता पुराना है। ये फसल पकने का समय है इसलिए होलिका में जौ और गेहूं की बालियां डाली जाती हैं। परंपरा के अनुसार होलिका पूरे सात दिन तक जलनी चाहिए इसलिए एक बड़ा सा लकड़ी का कुंदा भी जलाते हैं। लेकिन आजकल हर चौराहे पर होली जलती है जिसमें पतली टहनियां होती हैं जो सात दिन तो क्या सात घंटे भी नहीं जलती। होली जलाने के नाम पर मुहल्ले के लोगों से चंदा वसूला जाता है पर खर्च होता है चंदा वसूलने वालों की मौज मस्ती पर। पहले जहां होली जलती थी वहां पूर्णिमा की रात को आग में गुझिया डालते थे और होली की शाम को वहां सामुहिक होली मिलन होता था। होली का अभिन्न अंग है घर में मिठाई , गुझिया ,पापड़ , चिप्स इत्यादि बनाना जो लुप्त होती जा रही है। आजकल लोग यह सब बाजार से लेकर आते हैं। बाजारवाद ने होली को सामाजिक त्यौहार से परिवार तक सीमित करने में बहुत मदद की है।

होली पहले भी खेली जाती थी ,आज भी जाती है और आगे भी खेली जाएगी। आज की होली में कुछ बुराइयां हैं जो पहले नहीं थीं और पहले की होली में कुछ खामियां थीं जो आज नहीं हैं।पहले होली परंपरागत होती थी। आज लोग परंपरा का दामन छोड़कर केवल मौज-मस्ती एवं हुड़दंग चाहते हैं। आज भी शहर में कुछ आयोजनों के द्वारा इलाहाबाद की पुरानी होली की परंंपरा को बनाए रखने का प्रयास किया जा रहा है। शहर में हास्य कवि सम्मेलनों की परंपरा बहुत पुरानी है। आज भी कुछ स्थानों पर कवि सम्मेलन होता है। शनिवार 23 मार्च को शहर में दो जगहों पर होली के उपलक्ष्य में हास्य कवि सम्मेलन हुआ। इलाहाबाद सिथत कल्याणी देवी चौराहे पर प्रयाग सरोवर कवि सम्मेलन हुआ और दारागंज मुहल्ले में निराला सांस्कृतिक संस्थान की ओर से निराला चौक पर कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ। ऐसे कुछ और भी आयोजन होते हैं। कहीं कहीं पर सभ्य होली भी खेली जाती है पर क्या यह कोशिशें पुरानी होली की गरिमा को लौटा पाएगी। मौज मस्ती और हुड़दंग तो हर त्यैहार में होना चाहिए। परंतु यदि लोग परंपरा का दामन थामकर मौज मस्ती और हुड़दंग करें तो कहना नहीं पड़ता - सपना बन गई है इलाहाबाद की वह होली।

Comments 

 
#1 Dr abdul jamil khan 2016-08-05 08:02
we always had agreat time in holi--though warned that "' every spot on the body with holy color will b burned in Dozakh/narakh;;;BUt holi is spring festival globally celebrated--rooted in ancient IRAQ--( 3000 Bc)--coincided with spring eqinox--22 march---but had initiated the new years day of man's oldest calendar---still obsereved as nau roz in Iraq/iran, vaisakhi in Punjab and holi in UP/Bihar and Easter in Christianity--BUT root is Iraq's ancient calendar and advent of weather change and initiation of farming/planting.
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