Monday, November 20, 2017
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तूलसी विवाह मानसून के अंत और हिंदुओं में विवाह के मौसम का सूचक है। तुलसी विवाह कार्तिक माह में प्रबोधिनी एकादशी पर होता है। 

हिंदू धर्म में तुलसी को देवी माना जाता है, कभी कभी उन्हें भगवान विष्णु की पत्नी के रूप में देखा जाता है। पद्म पुराण में तुलसी विवाह की कथा का वर्णन है। 
तुलसी का पौधा एक स्त्री थी, जिसका नाम था वृंदा। उनका विवाह एक राक्षस राजा जालंधर से हुआ था। वृंदा की विष्णु के प्रति भक्ति और समर्पण से जालंधर बेहद शक्तिशाली हो गया। भगवान शिव जिन्हें हिंदू धर्म में विनाशक कहा जाता है भी जालंधर को हरा नहीं पाए। तब शिव ने विष्णु जिन्हें हिंदू धर्म में रक्षक कहा जाता है को समस्या का समाधान निकालने के लिए कहा। विष्णु जालंधर का रूप धरकर वृंदा के पास गए और उन्हें धोखा दिया।


वृंदा की पवित्रता भंग हो गई और जालंधर की शक्ति खत्म हो गई। वह भगवान शिव के हाथों मारा गया। वृंदा ने भगवान विष्णु को शाप दिया कि वह काले रंग के हो जाएंगे और वह भी अपनी पत्नी लक्ष्मी से अलग हो जाएंगे। ऐसा हुआ भी बाद में भगवान विष्णु काले शालीग्राम पत्थर में तव्दील हो गए और अपने राम अवतार में वह अपनी पत्नी सीता से अलग हो गए। वृंदा ने समुद्र में छलांग लगा दी और डूब गई। देवों ने उसकी आत्मा को एक पौधे में डाल दिया, जो उसके बाद में तुलसी का पौधा कहलाया।
विष्णु ने वृंदा को अगले जन्म में विवाह करने का वरदान दिया था। उन्होने शालीग्राम रूप में प्रबोधिनी एकादशी के दिन तुलसी से विवाह किया। आज भी इस दिन तुलसी का विवाह शालीग्राम के साथ होता है और इसके बाद ही हिंदुओं में विवाह प्रारंभ होता है। 
तुलसी विवाह, घरों में भी होता है और मंदिरों में भी। तुलसी विवाह के दिन व्रत रखा जाता है। घर के आंगन या मंदिर के प्रांगण में मंडप बनाया जाता है जहां पर तुलसी का पौधा रोपा जाता है। साधारणतः तुलसी का पौधा आंगन के बीचों बीच लगाया जाता है और उसके चारों ओर ईंटों का घेरा बनाया जाता है जिसे तुलसी वृंदावन कहते हैं। यह माना जाता है कि वृंदा की आत्मा रात को पौधे में रहती है और सुबह चली जाती है। दुल्हन तुलसी पर एक कागज का मानव चेहरा लगाया जाता है जिस पर नथ, बिंदी बनी होती है। उसे साड़ी, गहने दिए जाते हैं। दूल्हा विष्णु अथवा कृष्ण की तस्वीर या मूर्ति होता है या शालीग्राम पत्थर। इसको धोती पहनाया जाता है। विष्णु और तुलसी दोनों को स्नान कराकर फूलों से सजाया जाता है और विवाह से पहले माला पहनाया जाता है। 
महाराष्ट्र में बहुत धूम धाम से यह त्यौहार मनाया जाता है। वहां पर वर और वधू अर्थात तुलसी और विष्णु के बीच में एक सफेद कपड़ा पकड़ा जाता है तथा पुरोहित मंगलाष्टक मंत्र पढ़ते हैं। इन मंत्रों से ही विवाह संपूर्ण होता है। सिंदूर मिला हुआ चावल विवाह के अंत में आमंत्रितों पर डाला जाता है। सफेद कपड़ा हटा लिया जाता है और आमंत्रित लोग तालियां बजाकर विवाह को अपनी सहमति देते हैं।विष्णु को पिसा हुआ चंदन, पुरूषों के वस्त्र और जनेऊ दिया जाता है। तुलसी को साड़ी, हल्दी, आभूषण, सिंदूर और मंगल सूत्र दिया जाता है। विवाह के अवसर पर जैसे मिठाई और पकवान बनते हैं वैसे ही तुलसी विवाह के त्यौहार पर भी बनता है। इस विवाह में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भक्तों में गन्ना, नारियल के टुकड़े, फल और मूंगफली का प्रसाद वितरित किया जाता है। 
तुलसी विवाह का सारा खर्चा ऐसा दंपति उठाता है जिनकी पुत्री न हो। वही तुलसी के माता पिता की भूमिका निभाते हैं। ऐसे दंपति को बहुत खुशनसीब माना जाता है जिन्हें अपनी पुत्री का ब्याह विष्णु के साथ करने का अवसर प्राप्त हो। तुलसी को दुल्हन के रूप में जो कुछ भी दिया जाता है वह ब्राहमण पुरोहित को मिल जाता है।
भारत के हर प्रांत में तुलसी विवाह मनाया जाता है। वृंदा के रूप में विष्णु ने उसकी पवित्रता भंग कर दी थी परंतु तुलसी जितना पवित्र कुछ भी नहीं है क्योंकि विष्णु भगवान थे।

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