Thursday, November 23, 2017
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नरक निवारण चतुर्दशी को सामान्यतः नरक चतुर्दशी कहते हैं। यह एक हिंदू त्यौहार है जो पांच दिवसीय दिपावली पर्व का दूसरा दिन है।कहा जाता है कि इस दिन नरकासुर को कृष्ण और काली ने मार डाला था। 
नरक चतुर्दशी को काली चैदस भी कहते हैं। भारत के कुछ क्षेत्रों में काली चैदस के दिन महाकाली या शक्ति की पूजा होती है, उन क्षेत्रों में माना जाता है कि उस दिन काली ने नरकासुर को मारा था। काली चैदस या नरक चतुर्दशी के दिन आलस और बुराई को दूर भगाया जाता है। नरक चतुर्दशी को छोटी दिपावली भी कहते हैं।


इस दिन की पूजा तेल, फूल और चंदन से होती है। हनुमानजी को नारियल चढ़ाया जाता है और तिल, गुड़ तथा चूड़ा; पोहाद्ध , घी, चीनी का प्रसाद बनता है। 
इसी दिन पर कृष्ण ने नरकासुर नामक राक्षस को मारा था। नरकासुर बेहद खुंखार और धूर्त राक्षस राजा था। नरकासुर ने अपने पड़ोसी राजाओं ़से युद्ध किया और देवताओं तथा ऋषियों के सोलह हजार कन्याओं को बंदी बनाया। उसने इन्द्र देवता को भी हराया और देवताओं की माता अदिति के कानों की भव्य बाली छीन ली थी। जब श्री कृष्ण ने नरकासुर के अत्याचारों के बारे में सुना, तो उन्होने उसे मारने की ठानी।
श्री कृष्ण और नरकासुर के संभावित युद्ध की बात सुनकर श्री कृष्ण की पत्नी सत्यभामा ने नरकासुर को स्वयं मारने का निश्चय किया। श्री कृष्ण की मदद से सत्यभामा ने कृष्ण के सुदर्शन चक्र से नरकासुर का वध कर दिया। विजय की निशानी के रूप में श्री कृष्ण ने अपने कपाल पर राक्षस का रक्त लगाया। युद्ध से लौटने के पश्चात महिलाओं ने श्री कृष्ण के शरीर पर सुगंधित तेल मलकर उन्हें अच्छी तरह से स्नान कराया ताकि दुर्गंध दूर हो।नरक चतुर्दशी के दिन सुर्योदय से पहले सुगंधित तेल लगाकर स्नान करना एक परंपरा बन गया।
नरकासुर के वध के पश्चात सोलह हजार कन्याएं भी रिहा हो गईं। इन कन्याओं ने श्री कृष्ण से कहा कि समाज उन्हें नहीं स्वीकारेगा। समाज में इन कन्याओं को सम्मान दिलाना भी आवश्यक था अतः सत्यभामा के कहने पर श्री कृष्ण ने इन सोलह हजार कन्याओं से विवाह कर लिया।

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भारत के दक्षिण पश्चिमी राज्य गोवा में नरक चतुर्दशी अनोखी तरह से मनाई जाती है। कई महीने पहले से ही नरकासुर का पुतला बनाया जाता है। नरक चतुर्दशी के दिन सुबह से लेकर सायं काल तक इन पुतलों को सड़कों पर घुमाया जाता है। अन्त में पुतलों को आग लगा दी जाती है। पुतलों के भीतर पटाखे भरे रहते हैं और आग लगते ही नरकासुंर के साथ साथ पटाखे भी जलने लगते हैं।
नरकासुर का वध हो गया और सोलह हजार कन्याएं भी रिहा हो गईं। उस शुभ अवसर पर दीपदान की प्रथा प्रारंभ हो गई। एक अन्य मान्यता के अनुसार नरक चतुर्दशी के दिन सुर्योदय से पहले स्नान करके यमराज की पूजा करने से और सायं काल दीपदान करने से अकाल मृत्यु का भय नहीे रहता ।

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