Monday, November 20, 2017
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PoorBest 

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ऋतु परिवर्तन हो चुका है l सुबह-शाम का खुनक भरा वातावरण तन-मन को ताजगी के साथ ही उत्फुल्लता भी दे रहा है l और ? और आश्विन मास की शारदीय नवरात्रि  का संगीतमय आलोक-पुंज जन-जन के द्वार पर दस्तक दे रहा है l धरा-गगन के वाह्य वातावरण एवं प्रकृति के अन्तः करण में ज्योतिर्मयी माँ के आगमन का उल्लास दीप शिखा की भाँति जाग्रत होने लगा है l चितशक्तिरूपिणी विश्वजननी करुणामयी देवी का प्रभाव सम्पूर्ण विश्व पर धीरे-धीरे छाता जा रहा है l माँ दुर्गा की ज्ञानमयी ज्योति से जीव-जगत के अज्ञानान्धकार के नाश होने का समय अब दूर नहीं है l गाँव-गाँव, शहर-शहर, हर गली-मुहल्लों के मंदिरों में शारदीय शोभा से अभिमंडित माँ की प्रतिमा की पूजा-अर्चना की तैयारियाँ चालू हो गई हैं l  

                 इतना पवित्र वातावरण हो, मन में भक्ति की उमंग हो तो भला किसका मन उसमें घुल-मिल जाने के लिए लालायित नहीं होगा l हर व्यक्ति कुछ-न-कुछ पूजा-पाठ तो करता ही है फिर इन नौ दिनों का तो महत्व ही कुछ ऐसा होता है कि नास्तिक-से-नास्तिक व्यक्ति भी देवी की किसी-न-किसी रूप में थोड़ी बहुत आराधना तो करता ही है भले ही माँ की एक तस्वीर या कलेंडर के आगे ही धूप-अगरबत्ती जलाये l आधुनिकता की बहती हुई बयार के बावजूद भी भारत की संस्कृति में पूजा-पाठ का आज भी महत्वपूर्ण स्थान है l कुछ लोग  माँ की प्राण-प्रतिष्ठा करके अपने घर में ही मंदिर बना लेते है और जीवन-पर्यंत माँ की पूजा का व्रत ले लेते हैं l  ऐसे लोग कुछ अधिक ही विधि-विधान से नवरात्रि का पूजन करते हैं l  कहीं-कहीं स्थानाभाव  के कारण कुछ लोग आलमारी या घर के किसी कोने में ही माँ की पूजा के लिए एक स्थान निर्धारित कर लेते हैं l किसी भी स्थिति में की जाये, ह्रदय से की गई माँ की पूजा-अर्चना जीवन में सुख-शांति देती ही है l यों तो जगन्माता महाशक्ति की पूजा कर सकने की शक्ति इस लोक के प्राणियों में भला कहाँ हो सकती है पर जो भी यथा-शक्ति संभव हो सकता है वह हम सभी करते ही हैं l जब किसी के घर कोई मेहमान आने वाला होता है तो लोग अपने घर की खूब साफ़-सफाई, सजावट करते हैं , कोशिश यही रहती है कि किसी तरह की कमी न रह जाये , फिर यह तो आनन्दमयी महामाया माँ जगदम्बा के आगमन की वेला है l सम्पूर्ण जगत उन्हीं का स्वरूप है, तो जब उन्हीं सर्वस्वरूपा सर्वेश्वरी, परम प्रकृति का आगमन होने वाला हो तो  इस अनमोल अवसर पर, माँ के स्वागत में जो भी किया जा सके वह कम ही होगा l   

                ऐसे पवित्र अवसर पर सर्वप्रथम हमारा ध्यान पूजा-घर की सजावट पर जाता है l माँ के पूजा स्थल की सफाई व सजावट तो नवरात्रि की पूर्व संध्या तक पूरी हो ही जानी चाहिए l तैयारी के अंतर्गत जिस स्थान पर पूजा होनी है उसकी लिपायी-पुतायी, पेंटिंग इत्यादि तो पहले ही हो जानी चाहिए,  फिर यदि माँ की प्राण-प्रतिष्ठा हुई है तो माँ का आसन भी नवरात्री की पूर्व संध्या को ही बदल देना चाहिए क्योंकि फिर नौ दिन तक माँ को  आसन से हिलाया नहीं जाता है और जहाँ प्राण-प्रतिष्ठा होगी वहाँ माँ की ध्वजा भी अवश्य ही लगी होगी जिसे अमावस्या के सूर्यास्त से पूर्व ही बदल देना चाहिए l पूजा स्थल पर अपने इष्ट के साथ अन्य जितने भी देवी-देवताओं के विग्रह हों सभी की झाड़ -पोंछ , साफ - सफाई भी करनी चाहिए l कहने का तात्पर्य यह है कि पूजा घर या पूजा स्थल कैसा भी हो नवरात्रि के आगमन से पूर्व वहाँ की सफाई-सजावट व शुद्धता पर विशेष ध्यान देना चाहिये l  
              प्रधान विग्रह यदि माँ दुर्गा का है और उनका परिवार भी साथ में है तो उनको रखने/स्थापित करने का एक निश्चित नियम भी होता है जैसे सिंह पर सवार माँ दुर्गा के दाहिने हाथ की तरफ माँ लक्ष्मी अपने वाहन उल्लू के साथ और बाँये हाथ की तरफ माँ सरस्वती अपने वाहन हंस के साथ होनी चाहिए l इसी प्रकार माँ लक्ष्मी के दाहिने विघ्नहर्ता गणेश अपने वाहन मूषक तथा माँ सरस्वती के बाँये कार्तिकेय भगवान् अपने वाहन मोर के साथ होने चाहिए l यह तो हुआ  जगतजननी माँ जगदम्बा को उनके परिवार सहित स्थापित करने का तरीका l किन्तु यह आवश्यक नहीं कि माँ की पूजा उनके पूरे परिवार के साथ ही की जाये, अधिकतर घरों में सिंह पर सवार माँ दुर्गा की ही पूजा की जाती है l यहाँ पर एक और बात ध्यान देने की है कि घरों की पूजा में माँ की जो प्रतिमा रखी /स्थापित की जाती है वह अधिकतर अष्टभुजी ही होती हैं और सिंह का मुँह बंद होता है पर कुछ विशेष साधना करने वाले लोग दसभुजी प्रतिमा और खुले मुँह वाले सिंह की पूजा भी करते   हैं l यद्यपि पूजा-पाठ की गहराई में जाना हमारा विषय नहीं है तथापि माँ दुर्गा की पूजा के प्रारम्भ में ही तरह-तरह के डिज़ाइन बना कर कलश की स्थापना और उसके चारों ओर जौ बोने के नियम का पालन करना  नवरात्रि का एक विशेष अंग माना जाता है क्योंकि जौ की खेती जब बढती है और लहलहाने लगती है तो माँ अत्यंत प्रसन्न होती हैं l माँ जगदम्बा के अतिरिक्त हमारे पूजा घर में गणेश-लक्ष्मी,शंकर-पार्वती, राधा-कृष्ण, राम-सीता, बजरंगबली, साईंनाथ, वैष्णो-माता इत्यादि भी होते हैं सभी की पूजा-अर्चना यथा-शक्ति हम लोग करते हैं l 
                 पूजा घर की साफ-सफाई के बाद हमें वहाँ की सजावट पर भी ध्यान देना होता है l सभी देवी-देवताओं पर नित्य चढाई जाने वाली ताज़े फूलों की मालाओं और फूलों के आलावा बाज़ार में उपलब्ध तरह-तरह की रेशम व मोतियों की रंग-बिरंगी मालाएँ पहना दी जायें तो मूर्तियों की छटा ही मनमोहिनी हो उठेगी l मंदिर के भीतर लाल-पीली, सुनहली-रुपहली चुनरियों से चारों ओर की दीवारों को सजाया जा सकता है l कागज़ के रंगीन  फूलों की लड़ियाँ, तरह-तरह के रिबन,और एक-से-एक बढ़िया चंदीली-रुपहली पन्नियों के बने हुए झाड़-फानूस आपके मंदिर/पूजास्थल की शोभा को चौगुना करने में बहुत सहायक सिद्ध होंगे l हमारी संस्कृति में रंगोली का भी अपना अलग ही महत्त्व होता है किसी भी शुभ अवसर पर घरों में रंगोली बनायी जाती है, द्वार पर तरह-तरह के रंगों से बनी रंगोली देख कर बरबस ही मन हर्षित हो उठता हैl सब कुछ बहुत बढ़िया हो, सुन्दर हो पर अगर आप प्रवेश द्वार को ही भूल जायें तो मेहमान भला क्या सोचेंगे ? जबकि यह अवसर किसी साधारण मेहमान के आने का न हो कर असीम शक्तियों से संपन्न दिव्य रूप देवि दुर्गा के, अपने नौ रूपों सहित, पधारने का अनमोल अवसर है l इस अवसर पर बन्दनवार के बिना, सूना द्वार भला किसे अच्छा लगेगा ! इसलिए द्वार पर भी आम/अशोक की पत्तियों से बना कर बन्दनवार लगाना बहुत ज़रूरी है l इतना ही नहीं दरवाजे के दाहिने-बाँयें दोनों तरफ भी खूबसूरत बेल-बूटे, फूल-पत्ते, पेड़-पौधे, स्वस्तिक इत्यादि को  विविध रंगों में उकेर कर सुन्दरता को और भी बढ़ाया जा सकता है l 
                अंत में, उपरोक्त सभी सजावटों में चार-चाँद लगाने वाला प्रकरण आता है वह है बिजली की सजावट l वैसे तो बिजली की सजावट की कोई सीमा नहीं है लेकिन जहाँ माँ का दरबार हो उस स्थान को छोटे-छोटे रंग-बिरंगे बल्बों, रंगीन लतरों, खड़ी व लेटी ट्यूब-लाइट्स से सजा कर और कुछ रंगीन व सफेद बड़े बल्बों को लगा कर प्रकाश की भर-पूर व्यवस्था करने से वातावरण में एक प्रकार का उत्साह सा व्याप्त हो जाता है l वैसे सच तो यह है कि ह्रदय में जब भक्ति रस का संचार हो जाये तो माँ की सेवा और सजावट से कभी संतुष्टि  हो ही नहीं सकती, कितना भी सजा-संवार लें मन में कुछ और ऐसा करने की इच्छा बनी ही रहती है ताकि दर्शन-मात्र से ह्रदय प्रसन्न हो जाये l 

Comments 

 
#1 meenu 2012-10-16 21:29
very informatic
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