Friday, February 23, 2018
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kalash

पितृ पक्ष समाप्त होने के अगले दिन नवरात्र प्रारंभ होता है। पितृ पक्ष में पूर्वजों को जल चढ़ाया जाता है। गमगीन माहौल नवरात्र के प्रारंभ होते ही एक दिन में उल्लासमय हो जाता है।


यहां नवरात्र के प्रथम दिन पर कलश स्थापना की जाती है। कलश में पानी भरकर उसे मिटटी बिछाकर बीचों बीच बैठाते हैं। चारों ओर की मिटटी में जौ के बीज बोते हैं जिस पर रोज पानी का छींटा दिया जाता है। पानी भरे कलश को उसके ढ़क्कन से ढ़क कर उस पर चावल के दाने और लाल कपड़े में लिपटा नारियल , फूल माला रखते हैं। इसके चारों ओर आम के पत्ते लगाते हैं।देवी के सामने दिया और अगरबत्ती जलाते हैं। कलश के चारों ओर जौ के घास निकल आते हैं। जिसे मां की खेती कहते हैं।
नौ दिनों तक मां के भक्त व्रत रखते हैं।प्रत्येक मुहल्ले में भव्य पंडाल बनाकर उसमें देवी दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करके पूजा की जाती है। कहीं केवल देवी की प्रतिमा की स्थापना होती है तो कहीं पर लक्ष्मी , सरस्वती ,कार्तिक और गणेश के साथ। मुहल्ले के सभी लोग यहां पूजा चढ़ाते हैं, एक दूसरें से मिलकर आनंद मनाते हैं ,देवी को भोग चढाया जाता है, संध्या आरती होती है, प्रतिदिन सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं।
अनेक स्थानों पर राम लीला होती है।राम लीला में रामायण के दृष्यों का मंचन होता है,कहीं कहीं रामायण से संबंधित झांकियां निकलती हैं जिसे राम दल कहते हैं। उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी इलाहाबाद का राम दल बहुत प्रसिद्ध है।दशमी के दिन रावण वध होता है।
इसी तरह बिहार , झारखंड ,दिल्ली ,मध्य प्रदेश में भी नवरात्र मनाया जाता है। शिचम बंगाल में सिर्फ दुर्गा पूजा होती है।वहां की मान्यता-मां दुर्गा चार दिनों के लिए अपने पुत्र एवं पुति्रयों के साथ मायके आती हैं।सभी लोग इन दिनों नये वस्त्र पहनते हैं। दशमी के दिन सुहागिनें देवी देवताओं को सिंदूर पहनाकर मिठार्इ खिलाती हैं।इसे सिंदूर उत्सव कहते हैं। अर्थात बेटी के मायके से ससुराल जाने की रस्म अदा करना। ओडिशा और ति्रपुरा में भी इसी तरह दुर्गा पूजा मनाते हैं।सभी समुदाय के लोग हर्षोल्लास के साथ मिलकर इस पर्व को मनाते हैं। दिनों दिन उत्सव मनाने की प्रकृति बदलती जा रही है और आज इसने एक वृहद सामाजिक उत्सव का रूप ले लिया है।

 

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