Monday, November 20, 2017
User Rating: / 0
PoorBest 

bakreed

मुसलमानों में ईद के दो पर्व होते हैं। ईदुल फित्र मतलब मीठी ईद और ईद-उल-अज़हा। ईद-उल-अज़हा को लोग बकरा ईद भी कहते है। ईद-उल-अज़हा इस्लामिक साल के आखिरी महीने माहे जि़लहज्जा की दसवीं तारीख को मनाई जाती है। इस दिन हर साहिबे निसाब (हैसियत) वाले मुसलमान अल्लाह की रज़ा के लिए खास जानवर ज़बह करके मोहब्बते इलाही का मुज़ाहिरा करते हैं। इस महीने में हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने लख्ते जिगर (प्यारे बेटे) हज़रत इस्माइल अलैहिस्सलाम को अल्लाह की राह में कुर्बान होने के लिए पेश किया था। अल्लाह तआला को हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की यह अदा इतनी पसंद आई की अल्लाह ने इसका जिक्र कुरआन पाक की सूरा साफ्फात में किया है। 

 

" कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने बेटे हज़रत इस्माइल अलैहिस्सलाम से कहा ऐ मेरे बेटे! मैने ख्वाब में देखा है कि मैं तुम्हें ज़बह कर रहा हूं। बेटा आपकी क्या राय है। बेटे ने अजऱ् किया अब्बा जान आपको जो हुक्म दिया गया है उसे कर डालिए। अल्लाह ने चाहा तो आप मुझे सब्र करने वालों में पायेंगे। बाप और बेटा दोनों राजी हो गये और बाप ने बेटे को पेशानी के बल लिटा दिया। तभी आकाश वाणी हुई ऐ इब्राहिम बस हाथ रोक लो तुमने अपने ख्वाब को सच कर दिखाया। बेशक यह बड़ी खुली आज़माईश थी। हम इस तरह मोहसिनों (एहसानमंद) को बदला देते है। और अल्लाह ने हज़रत इब्राहीम के बेटे हज़रत इस्माईल की जगह एक कुर्बानी का जानवर दे कर बचा लिया। " तभी से आज पूरी दुनिया में हर हैसियत वाले मुसलमान इस दिन अल्लाह की राह में कुर्बानी कर सुन्नत अदा करते हैं। 

सुन्नते इब्राहिमी का कायम होना

हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की अज़ीम कुर्बानी को अल्लाह ताअला ने अपने हबीब हज़रत मोहम्मद सल्ललल्लाहि अलैहि वसल्लम पर सूर-ए-कौसर नाजिल फरमाकर नमाज के साथ कुर्बानी करने का हुक्म दिया। इसलिए हज़रत मोहम्मद सल्ललल्लाहि अलैहि वसल्लम ने हर साल अपनी तरफ से और अपनी उम्मत (इस्लाम के मानने वालों) की तरफ से कुर्बानी के जानवर ज़बह करके अल्लाह ताअला के हुक्म को पूरा किया। इस तरह कयामत तक हर साहिबे निसाब (हैसियत वाले) मोमिनों और राहे वफा पर चलने वालों के लिए सुन्नते इब्राहिमी कायम कर दी गयी।

कुर्बानी में शोहरत व दिखावा ठीक नहीं 
अल्लाह ताअला का कुर्ब (नजदीकी) हासिल करने के लिए कोई चीज अल्लाह की राह में खर्च करना ही कुर्बानी कहलाता है। परन्तु इस शर्त के साथ कि उस चीज के खर्च करने का मकसद सिर्फ रजा-ए-इलाही हो और इसमें जरा भी शोहरत व दिखावा शामिल नहीं होना चाहिए।

साहिबे निसाब पर वाजिब है कुर्बानी
कुर्बानी हर उस मुसलमान पर वाजिब है जो आजाद हो, मुकीम (स्थायीघर) हो, आकिल व बालिग हों और निसाब (हैसियत) का मालिक हो। निसाब के लिए यह शर्त है कि उसके पास साढ़े बावन तोला चांदी या साढ़े सात तोला सोना या उसकी कीमत के बराबर कोई दूसरा सामान हो जो हाजते असलिया (जीवनयापन हेतु वस्तुएं) से ज़ायद (अधिक) हो। परन्तु ज़कात की तरह इसमें साल गुजरने की शर्त नहीं है। अगर कोई शख्स फकीर हो और कुर्बानी के दिन भीं वह साहबे निसाब हो गया तो उस पर कुर्बानी करना वाजिब है। इसी तरह अगर कोई साहिबे निसाब था, मगर कुर्बानी के अययाम (दिन) में उसका माल तल्फ या ज़ाये (खत्म) हो गया तो उस पर कुर्बानी करना वाजिब नहीं है।

कुर्बानी न करने की सज़ा
जो शख्स साहबे निसाब होते हुए हुजूर सल्ललल्लाहि अलैहिवसल्लम और हज़रत इब्राहिम अलैहिसलाम की सुन्नत को अदा करने के लिए कुर्बानी न करे तो उसको सख्त बईद (फटकार) सुनायी गयी है। एक दूसरी रिवायत के मुताबिक 'वह शख्स जो मालदार हो और वह हमारी नमाज (ईद) की तरह नमाज न पढ़े और न ही हमारी कुर्बानी की तरह कुर्बानी करे तो वह हममें से नहीं। (दुर्रतुन्नासिहीन) 

गोश्त और खाल के बारे में हिदायतें
कुर्बानी के गोश्त को तीन हिस्सों में तकसीम (वितरित) करना अच्छा है। एक हिस्सा घर में इस्तेमाल करें, एक हिस्सा गरीबों-मिस्कीनों में और एक हिस्सा दोस्त-अहबाब व रिश्तेदारों का बांट दें। कुर्बानी का पूरा गोश्त भी सदका कर देना और पूरा गोश्त अपने लिए रख लेना भी जायज है। अफज़ल (सबसे अच्छा) यही है कि अपने लिए तीसरा हिस्सा ही सुरक्षित रखे। कुर्बानी की खाल को कुर्बानी करने वाला अपने इस्तेमाल में ला सकता है। चाहे वह उसका मुसल्ला (नमाज पढ़ने के लिए जानमाज)या मश्क बना ले या उसके अलावा उसकी कोई और चीज बनाकर इस्तेमाल कर ले। खाल का सदका (दान) करना भी जायज़ है। जैसे गरीबों-मि स्कीनों में बांट दे या दीनी मदरसों में दे दें जिनमें कुरान, हदीस, तफ्सीर और फि़कह बगैरह की शिक्षा दी जाती हो लेकिन खाल बेचकर उसकी रकम अपनी जरूरत के कामों में लाना जायज नहीं है।

Add comment

We welcome comments. No Jokes Please !

Security code
Refresh

culture

Who's Online

We have 1368 guests online
 

Visits Counter

749580 since 1st march 2012