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durga pooja n dhaki

दुर्गा पूजा और ढ़ाकी एक दूसरे के पर्याय हैं। ढ़ाक की आवाज कानों में पहुंचते ही माँ दुर्गा का चेहरा अपने आप आँखों के सामने आ जाता है।ढ़ाक बजाने वाले को ढ़ाकी कहते हैं। ढ़ाकी मूलत: पशिचम बंगाल के रहने वाले हैं। ढ़ाक बंगाल का एक पारंपरिक वाध यंत्र है जिसे कंधे पर लटकाकर दो पतले डंडे की सहायता से बजाया जाता है।यह कला पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है। पर पता नहीं यह परंपरा कब तक चलेगी। 

बंगाल में इसका सीजन विश्वकर्मा पूजा से लेकर काली पूजा तक होता है। परंतु उनकी मुख्य आय दुर्गा पूजा के समय होती है।ढ़ाकी मूलत: बंगाल के रहने वाले हैं। मुख्यत: मालदा ,मेदिनीपूर ,दिनाजपुर से वह आते हैं। उत्तर 24 परगना के एक गाँव में ढ़ाकियों की बस्ती है। पूर्व बंगाल ;आज का बंग्लादेशद्ध से विस्थापित होकर आये ढ़ाकियों के परिवार यहां बस गये। शुरू शुरू में इनका बहुत मान सम्मान था। आमदनी की कमी नही थी। अब तस्वीर बदल चुकी है।

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ढ़ाक का प्रचलन बंगाल से ही हुआ था परंतु आज यह बंगाल की सीमाओं को तोड़कर समस्त भारतवर्ष में फैल चुका है। भारत के करीब करीब सभी शहरों में दुर्गा पूजा होती है और बंगाल से ढ़ाकी भी वहाँ पहुँचते हैं क्योंकि ढ़ाक के बिना तो दुर्गा पूजा हो ही नहीं सकती। ढ़ाक को दो डंडे से ही बजाया जाता है पर हर अवसर के लिए अलग थाप होती है। चक्षु दान के समय बजाये गये ढ़ाक की ध्वनि बिल्कुल अलग होती है। इसी तरह प्रात: काल माँ को जगाने ,पूजा ,भोग ,संध्या आरती ,धुनूची नाच ,संधी पूजा ,होम;हवनद्ध ,विसर्जन सभी अवसरों के लिए अलग अलग ध्वनि निर्धारित है। बदलते समय के साथ साथ आजकल कुछ ढ़ाकी तेज धुनों के प्रधानता दे रहे हैं। पहले धुनें धीमी गति की होती थीं। 

दिल्ली में बहुत सारे दुर्गा पूजा होते हैं और सभी बारवारी ढ़ाकी जरूर बुलाते हैं। कुछ पुराने बारवारियों के तो ढ़ाकी बंधे हुए हैं। हर साल निशिचत समय पर वह पहुँच जाते हैं।ऐसा दूसरे शहरों में भी होता है। पशिचम बंगाल से ढ़ाकी दुर्गा पूजा के पहले सभी शहरों में पहुच जाते हैं जैसे पटना ,इलाहाबाद ,लखनऊ ,भोपाल ,दिल्ली ,इंदौर ,मुम्बई ,हैदराबरद ,कोच्ची इत्यादि।जमशेदपुर में तो ढ़ाकियों की प्रतियोगिता होती है।कुछ को काम मिलता है कुछ को नहीं।

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ढ़ाकी भूमिहीन मजदूर हैं जो साल भर दूसरे के खेतों में काम करते हैं।वह गरीब हैं।दुर्गा पूजा उनके लिए आमदनी का अवसर है। परंतु आजकल बढ़ते तकनीक का खमियाजा उन्हें भी भुगतना पड़ रहा है। बड़े-बड़़े शहरों के किसी -किसी बारवारी में ढ़ाक के कैसेट से ही काम चला लिया जाता है। कुछ बारवारियों की अपनी-अपनी ढ़़ाक है और ढ़ाकियों से ढ़ाक बजाना सीखकर वहां के लड़के ही बजा लेते हैं। लेकिन चिडि़यों के पर से सजे ढ़ाकों को जब ढ़ाकी अपनी पारंपरिक पोशाक में बजाते हैं तो कुछ और ही समां होता है।जब ढ़ाकी ढ़ाक के साथ अन्य शहरों में जाने के लिए ट्रेन में सफर करते हैं तो बड़े ढ़ाकों की वजह से पुलिस परेशान करती है। कहीं कहीं पर काम खत्म होने के बाद उन्हें पहले से तयशुदा रकम नहीं दी जाती है।इन्हीं सब कारणों से ढ़ाकियों की आज की युवा पीढ़ी इस पारंपरिक कला को छोड़कर अन्य रोजगार की तलाश कर रही है। हां बुजुर्ग अभी भी ढ़ाक बजाने में ही गर्व महसूस क रते हैं। यदि ऐसा ही चलता रहा तो क्या बुजुर्ग इस कला को बचा पाएंगे ? आज यह कला संपूर्ण भारत में छाई है परंतु इसके खत्म होने के आसार दिखने लगे हैं। यदि युवा आगे नहीं आएंगे तो इस कला का क्या भविष्य होगा। 

दुर्गा पूजा के दौरान इलाहाबाद के कर्नलगंज बारवारी में मेरी मुलाकात एक ढ़ाकी से हुई।उससे बातचात करने के बाद हमारी चिंता सच साबित हुई।

ढ़ाकी का नाम- कार्तिक दास।

उसका पता- उत्तर दिनाजपुर ,पोस्ट आफिस इटाहारपुर ,भद्रशीला ;पशिचम बंगालद्ध।कार्तिक बाईस साल से इसी बारवारी में हर साल आते हैं।इससे पहले इनके पिता यहां आते थे। पिता के निधन के बाद कार्तिक ने आना प्रारंभ किया। उनके अनुसार आजकल ढ़ाकी वास्तव में अन्य रोजगार की ओर बढ़ रहे हैं। परिवार चलाने के लिए रूपये चाहिए। जिन्हें दूसरा रास्ता मिल गया उसने इस कला को छोड़ दिया है। उन्होने यह भी बताया कि उन्हे कोई दूसरा रास्ता न मिलने की वजह से अभी भी ढ़ाक बजा रहे हैं।दूसरा काम मिलते ही वह भी इसे छोड़ देंगे। इतने साल ढ़ाक बजाने के बाद भी यह मानसिकता वाकई डराने वाली है क्योंकि फिर तो यह परंपरा ही खत्म हो जाएगी।

कार्तिक की यह मानसिकता केवल एक ढ़ाकी की नहीं है बलिक संपूर्ण ढ़ाकी समुदाय की है। विलुप्त होती अन्य कलाओं को बढ़ावा देकर बचाने की कोशिश की जा रही है। अगर अभी से इस कला को भी बढ़ावा दिया जाए और ढ़ाकियों की आमदनी थोड़ी बढ़ जाए तो ढ़ाकी इसे छोड़ने की कभी नहीं सोचेंगे । फिर ढ़ाक का नाम कभी भी विलुप्त कला में नहीं आएगा।

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