Monday, November 20, 2017
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durga pooja

देवी दुर्गा हम सबकी माँ हैं ,जगत जननी हैं इसीलिए उन्हें मां दुर्गा कहा जाता है। भारत के लगभग सभी शहरों और विदेश में भी जहां उनके संतान उन्हें बुलाते हैं वह वहीं जाती हैं।हर स्थान पर भव्य पंडाल बनाकर पूजा की वेदी पर मां की प्रतिमा रखी जाती है।साधारणत: प्रत्येक मुहल्ले में दुर्गा पूजा होती है और मुहल्ले के सभी लोग मिलकर इसे मनाते हैं। इसको बारवारी पूजा कहते हैं। इस दौरान सभी बारवारियों में होड़ सी लगी रहती है कि किसकी पूजा ,प्रतिमा,साज-सज्जा,पंडा ल सबसे अच्छा हो।
इलाहाबाद में भी इसी तरह से दुर्गा पूजा होती है।यहां करीब 60 से 70 बारवारी पूजा होती है।इसके अलावा कुछ क्लबों और घरों की पूजा तो है ही। प्रस्तुत है कुछ चुनिंदा बारवारियों का चित्र सहित विवरण जिसे एक्टिवइंडियाटीवीण्काम की टीम ने स्वयं जाकर एकति्रत किया। टीम की कोशिश है आप सबको इलाहाबाद के दुर्गा पूजा की एक झलक दिखाना।सबसे पहले टीम ने प्रीतम नगर का दौरा किया। 

 

प्रीतम नगर

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इस मुहल्ले की पूजा कमेटी सुलेम सराय सार्वजनिन दुर्गा पूजा कमेटी प्रीतम नगर के नाम से जानी जाती है।परंतु कमेटी का नाम कुछ भी हो इलाहाबाद में उसे प्रीतम नगर की पूजा ही कहते हैं क्योंकि पूजा प्रीतम नगर में ही होती है। सन 1986में प्रीतम नगर के निवासियों ने इस पूजा की शुरूआत की। यहां के अध्यक्ष अमलेश चौधरी के अनुसार यह इस पूजा का 27वाँसाल है। बीस साल पहले पूजा का बजट 20 से 22,000 होता था अब 4 से 5 लाख है।पूजा की सभी रस्में परंपरा के अनुसार ही होती है।इस साल की प्रतिमा को आरियन्टल प्रतिमा कहते हैं।कला की दृषिट से यह बहुत सुंदर है । इस प्रतिमा को सुदेब पाल ने बनाया है। पंडाल डेकोरेशन में इस बारवारी को तृतीय पुरस्कार मिला।

लूकरगंज

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इस मुहल्ले में इलाहाबाद के प्रतिषिठत बंगाली परिवार रहते हैं।यहां के सचिव देवब्रत दे के अनुसार यहां सन 1907 में दुर्गा पूजा प्रारंभ हुई।यह उनका 106वाँ साल है। इतने पुराने पूजा में पहले साल का बजट पूछना अर्थहीन था ,यह बारवारी क्या किसी भी जगह हमें पहले साल का बजट नहीं मिल पाया अत: हमने सभी से बीस साल पहले का बजट ही पूछा। देवब्रत जी नें बताया कि बीस साल पहले का बजट 50 से 60,000 के बीच रहता था।आज का बजट 9 से 10 लाख के बीच रहता है। देवी दुर्गा तथा लक्ष्मी,सरस्वती, कार्तिक,गणेश की प्रतिमा पूरी तरह से पारंपरिक होती है।हर साल लूकरगंज बारवारी में मां का वही जाग्रत रूप नजर आता है।जिससे पूरा पंडाल भकितमय हो उठता है। यह मेरा व्यकितगत अनुभव है।टीम ने जब थीम पूजा पर सवाल किया तो जवाब मिला थीम पूजा के बजाये पारंपरिक पूजा में विश्वास रखते हैं। हां किसी खास वर्ष पर पंडाल किसी खास थीम पर बनाया जा सकता है जैसे शताब्दी वर्ष में पंडाल विक्टारिया मेमोरियल जैसा बना था। यहां प्रसाद और भोग वितरण की उत्तम व्यवस्था है। इस साल का पंडाल कुछ खास न होते हुए भी खास था क्योंकि यह स्वामी विवेकानंद को समर्पित था। यह वर्ष स्वामी विवेकानंद का 150वाँ जन्मोत्सव है।

सिटी बारवारी

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यह इस साल पूजा का 130वाँ साल मना रहा है।यहां के सचिव गोपाल जी गुप्ता से मुलाकात न होने पर तरूण दे से बात चीत हुई। उनके अनुसार सिटी बारवारी इलाहाबाद का सबसे पुराना बारवारी दुर्गा पूजा है।इनसे भी बीस साल पहले का बजट पूछा गया तो जवाब मिला एक लाख और आज दो लाख। टीम ने पूछा कि यदि बीस साल पहले बजट एक लाख था तो आज दो लाख कैसे ? उन्होने कहा कि हम फालतू ताम-झाम नहीं करते।साधारण पंडाल बनाते हैंपर पूजा पर संपूर्ण ध्यान दिया जाता है।पूजा की हर रस् म परंपरा के अनुसार निभाई जाती है।देवी प्रतिमा हमेशा से ही पारंपरिक होती आई है और जब तक पूजा होगी ऐसी ही होगी ।थीम पूजा का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता। इस बारवारी में कभी थीम पूजा नहीं होगी। हमारा विश्वास पारंपरिक पूजा में ही है।इलाहाबाद में अगर मां दुर्गा की पारंपरिक प्रतिमा की बात आती है तो सर्वप्रथम सिटी बारवारी का ही नाम आता है।यहां की प्रतिमा हरिब्रोतो पाल बनाते हैं।

साऊथ मलाका

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यहां के दुर्गा पूजा का प्रारंभ सन 1934 में हुआ। यहां के सचिव राम नाथ नियोगी के अनुसार यह पूजा का 79वाँ साल है। बीस साल पहले का बजट एक लाख था अब 8से 10 लाख है। पूजा संपूर्ण रूप से पारंपरिक है। प्रतिमा और पंडाल पारंपरिक और किसी खास वर्ष में थीम आधारित भी बनता है।इस बार प्रतिमा पारंपरिक थी, पंडाल साधारण था पर उसकी बाहरी सजावट अच्छी थी।

बाई-की-बाग

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यहां दुर्गा पूजा सन 1927 से हो रही है। पूजा कमेटी के अनुसार यह पूजा का 86वाँ साल है। बीस साल पहले का बजट करीब 80,000 था। तब पंडाल साधारण शामियाने से बनता था और बल्ब की रोशनी में ही पूजा होती थी। आज का बजट 6लाख है।आज पंडाल कलकत्ता स्टाइल का बनता है।सजावट के लिए विभिन्न तरह की लाइट लगानी पड़ती है।परंतु पूजा सभी पारंपरिक रस्मों को निभाकर किया जाता है। यह इलाहाबाद का एकमात्र बारवारी है जहां पुरोहित(पुजारी जी) पशिचम बंगाल के मुर्शिदाबाद से आते हैं।यहां बंगालिओं की पारंपरिक वेष भूषा धोती कुर्ता पहनकर ही पूजा के मंच पर चढ़ सकते हैं।इनका भी विश्वास पारंपरिक पूजा में है। प्रतिमा भी पारंपरिक ही बनती है। पंडाल भी आकर्षक था।

सोहबतियाबाग

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इस पूजा की शुरूआत सन 1958 में हुई है। यहां पूजा का 55वाँ साल मनाया गया। सचिव अमोल सोम से मुलाकात न होने पर वाइस प्रेसिडेंट प्रदीप भटटाचार्या से बातचीत हुई। उनके अनुसार यहां पारंपरिक पूजा ही होती है थीम पूजा नहीं।प्रतिमा हमेशा ही पारंपरिक बनती है। हर साल पंडाल कुछ खास नहीं बनता पर सजावट से उसे खास बनाने की कोशिश की जाती है। यहां एक अनूठी परंपरा है पूजा के तीनों दिन सप्तमी,अष्टमी और नवमी को शहनाई वादक सुबह पंडाल में आकर शहनाई बजाते हैं। पहले का बजट हमें नहीं मिल पाया । इस साल का बजट तीन से साढ़े तीन लाख का है।यह भी पारंपरिक पूजा में ही विश्वास करने वाले हैं। जब टीम ने सोहबतियाबाग का दौरा किया तो वहां भोग खिलाया जा रहा था और लागों का उल्लास देखने लायक था।

जार्ज टाउन

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यहां दुर्गा पूजा सन 1929 से प्रारंभ हुई है। यहां के सचिव हैं अरिन्दम घोष लेकिन बातचीत हुई भानू सेनगुप्ता से।वह 54 साल से इस दुर्गा पूजा से जुड़े हैं और तेरह साल तक सचिव भी रह चुके हैं।उनके अनुसार इस साल पूजा का 84वाँ वर्ष है। बीस साल पहले पूजा का बजट था एक लाख और आज साढ़े तीन लाख । यहां पारंपरिक पूजा होती है थीम पूजा में कोई विश्वास नहीं रखता। यहां पूजा की हर रस्म परंपरा के अनुसार पूरी होती है। प्रतिमा पारंपरिक होती है। सजावट में हर साल भिन्नता नजर आती है।भोग की व्यवस्था अच्छी है और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का स्तर ऊँचा है। इसे मैनेजमेंट और लाइटिंग में तृतीय पुरस्कार मिला।

टैगोर टाउन

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यहां पूजा सन 1942 से प्रारंभ हुई।यहां के सचिव नीरज अग्रवाल के अनुसार बीस साल पहले पूजा का बजट 25 से 30,000 तक का था आाज 4 से 5 लाख है।उनके अनुसार आज तक यहां पारंपरिक पूजा ही होती आई है लेकिन यह नहीं कह सकते कि कभी थीम पूजा नहीं होगी। परंतु थीम पूजा होने पर भी परंपरा का दामन नहीं छोड़ेंगे। यहां तीनों दिन भोग खिलाया जाता है जिसकी अच्छी व्यवस्था है।अभी तक तो यहां पारंपरिक पूजा होती आई है , प्रतिमा भी पारंपरिक ही बनती है लेकिन नीरज जी पहले व्यकित मिले जिन्होने यह कहने की हिम्मत दिखाई कि थीम पूजा से भी एतराज नहीं। मैनेजमेंट और लाइटिंग में इसे प्रथम पुरस्कार मिला।

कर्नलगंज

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इस साल पूरे इलाहाबाद में इस पूजा की धूम है और शायद ही कोई ऐसा व्यकित होगा जिसने यहां के दर्शन नहीं किये। यह बारवारी इस साल दुर्गा पूजा का 160वाँ वर्ष मना रहा है। 160 साल पहले यह पूजा इस मुहल्ले के राम चंद्र बैनर्जी के घर पर प्रारंभ हुई थी। तब घर के बराम्दे या बगीचे में पूजा होती थी। सन 1900 से पूजा दूसरी जगह पर होने लगी । 1927 से पूजा भरद्वाज आश्रम के पास होती आ रही है। मान्यता है कि भरद्वाज मुनी के इसी आश्रम में श्री राम आए थे।वहां के ज्वाइंट सेक्रेटरी और बंगाली सोशल एंड कलचरल एसोसिएशन के सचिव शंकर चैटर्जी के अनुसार इस साल पूजा कुछ ज्यादा ही धूमधाम से मनाई जा रही है।बीस साल पहले उनका बजट एक लाख या उससे थोड़ा कम ही था पर इस साल तो पंडाल ही 4 लाख का है। इसके अलावा 7 लाख का बजट है। पूजा की हर रस्म पारंपरिक विधि से ही होती है। विशेष मौकों को छोड़कर हर साल पंडाल किसी थीम पर नहीं बनाया जाता। इस साल बना है क्योंकि यह वर्ष शताब्दी बाद डायमंड जुबली का है । पंडाल और प्रतिमा से हम लोग प्रदूषण रहित पर्यावरण का संदेश और हरियाली को बढ़ावा देना चाहते हैं।
उन्होने कहा कुछ खास बनाया है पर यह कितना खास था पंडाल देखने के बाद ही पता चला। वहां आदिवासी गांव बसाया गया था। छोटी छोटी कई कोठरियां थीं जिस पर फूस की छप्पर डाली गई थी और दिवारें मिटटी की लग रही थी।वास्तव में जूट के बोरियों पर मिटटी लगाकर इसे बनाया गया था। वहां की साज-सज्जा से आदिवासी गांव की ही झलक मिल रही थी। कोठरियों के बीच में पेड़ के नीचे आदिवासी मूर्ति का चेहरा लगा था और स्टेज पर जाने के लिए एक तालाब पार करना पड़ता था।इसे पार करने के लिए दोनों तरफ से लकड़ी के पुल बने थे। ता लाब में हंस तैर रहे थे। मुख्य द्वार भी मिटटी और फूस की बनी थी। मुख्य द्वार के बाहर सजावट भी आदिवासी मूर्तियों से ही की गई थी। कुल मिलाकर माहैाल पूरी तरह से आदिवासी गांव का था। विशेषकर साज सजावट पूरी तरह से आदिवासीयों के रूचि के अनुसार ही की गई थी जो शहर के लागों को भी बहुत पसंद आई। प्रतिमा के पीछे हरे-भरे पेड़ों का कट आउट लगा था जिससे प्रतीत होता है कि मां दुर्गा भी पृथ्वी वासियों को हरियाली बढ़ाने का संदेश दे रही हैं। इस वातावरण में यह लग रहा था कि शहरें तो प्रदूषित हो ही चुकी हैं परंतु गावों का माहौल ऐसा रखकर हम उसे तो प्रदूषित होने से बचा ही सकते हैं। वहां का एक और आकर्षण था आदिवासी नृत्य। पहली बार दुर्गा पूजा के समय इलाहाबाद के किसी बारवारी में आदिवासी कलाकार आए हैं।वह लोग रोज सुबह शाम अपनी पारंपरिक पोशाक में नृत्य करते थे। पर जब टीम ने वहां का दौरा किया तो उनके नृत्य का समय नहीं था और हम लोग यह खूबसूरत नजारा न देख सके। आंतरिक साज सज्जा के लिए इसे द्वितीय पुरस्कार मिला।

एलनगंज

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यहां की दुर्गा पूजा सन 1971 में प्रारंभ हुई।यह इसका 42वाँ साल है।वहां के सलाहकार अंजन चैटर्जी से बातचीत हुई।उन्होने इस दुर्गा पूजा को शुरू से ही देखा है।उनके अनुसार पहले वर्ष से लेकर आज तक बहुत बदलाव देखे।पहले साल का बजट था 4000 रूपये और आज 2 लाख 75 हजार। शुरूआत में बंगाालियों की प्रधानता थी पर पूर्णत: बंगालियों का पूजा कभी नहीं था।सभी लोग मिलकर पूजा सम्पन्न करते थे।प्रारंभ में जो लोग थे उनमें बहुत आज नहीं हैं उनकी जगह आज दूसरों ने ले ली है और अब तक मिलजुल कर पूजा मना रहे हैं। यहां पूजा की रस्में,मां की प्रतिमा पूर्णत: पारंपरिक होती है। पहले वर्ष से ही ऐसा होता आया है। थीम पूजा में हम विश्वास नहीं करते।पहली नजर में टीम को मां की प्रतिमा अच्छी लगी।प्रतिमा और इसकी सजावट पूरी तरह से पारंपरिक थी।

गोपाल आश्रम

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यह पूजा भी एलनगंज मुहल्ले में ही होती है। परंतु यह बारवारी नहीं आश्रम की पूजा है जहां दर्शन के लिए कोई भी जा सकता है।जिन्होने आश्रम की स्थापना की थी उनका परिवार आज भी वहां बसता है। उस परिवार के वरिष्ठ सदस्य निलेन्दु माधव चैटर्जी के अनुसार इस पूजा का प्रारंभ सन 1954 में हुआ। यहां दुर्गा पूजा के अवसर पर केवल मां दुर्गा की प्रतिमा ही आती हंै क्योंकि आश्रम में प्रत्येक देव देवी की पूजा अलग अलग अवसरों पर होती है परंतु बारवारियों में पहले से तय नहीं होता कि सबकी पूजा अलग अलग हो पाएगी या नहीं इसलिए मां दुर्गा , लक्ष्मी , सरस्वती ,कार्तिक ,गणेश की पूजा एक साथ ही करते हैं। दुर्गा पूजा के अवसर पर कोलकाता,मम्बई,दिल्ली,बनारस से भी परिवार के सदस्य और भक्त आते हैं।बीस साल पहले का बजट 10,000 था आज 1 लाख। पहले मां की मूर्ति आश्रम में परिवार के एक सदस्य ही बनाते थे।उनके निधन के बाद मूर्ति किसी और से बनवानी पड़ती है। निलेन्दु जी ने कहा गोपाल आश्रम एवं राम कृष्ण मिशन विशुद्व सिद्वांत पंजीका (पंचांग) के अनुसार पूजा करता है और सभी बारवारी गुप्त प्रेस पंजीका के अनुसार। उनसे थीम पूजा का जिक्र करने पर उन्होने एक शब्द में उत्तर दिया- वैदिक मंत्रोच्चारण और थीम पूजा मिस मैच अर्थात यह बिल्कुल मेल नहीं खाता है।पूरे इलाहाबाद में यदि सही मायने में मां की पूजा देखनी हो तो लोग यहीं आते हैं। यहां भव्य पंडाल नहीं बनता ,न ही साज सज्जा में ताम झाम ।इनका पूरा ध्यान मां की पूजा पर होता है।

दरभंगा कालोनी

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इस पूजा का प्रारंभ सन 1958 में हुआ है। यह उनका 55वाँ वर्ष है। वहां के ज्वाइंट सेक्रेटरी संजय मुखर्जी के अनुसार यह थीम आधारित पारंपरिक पूजा है।इस बार पंडाल स्वामी विवेकानंद को समर्पित है। यहां विवेकानंद राक मेमोरियल बनाया गया है। पूजा की रस्में पूरी तरह पारंपरिक ही होती है । इसमें कोई समझौता नहीं किया जा सकता परंतु प्रतिमा और पंडाल कभी थीम आधारित होती है कभी पारंपरिक। यहां के पंडाल और प्रतिमा ने भी टीम को प्रभावित किया।विवेकानंद राक मेमोरियल की नकल पर बने पंडाल पर जाने के लिए पानी पर बने लकड़ी के पुल को पार करना पड़ता था। पानी से समुद्र का अहसास हो इसलिए चारों ओर नीला रंग भी किया गया था। पुल पार करने के बाद कुछ सीढ़ीयां चढ़कर लकड़ी की पटरी से बनाई गई चढ़ाई चढ़ कर पंडाल के भीतर मां के दर्शन करने के लिए जाने का रास्ता बना था। मां की प्रतिमा पूरी तरह पारंपरिक थी परंतु उसमें हल्का सा दक्षिण भारतीय स्पर्श था।इससे मां के परंपरिक रूप में और निखार आया है। इसकी सजावट पारंपरिक थी। पंडाल की आंतरिक सजावट भगवान शिव और गणेश के कलात्मक चेहरों से की गई है। यहां हमें कला ,थीम और परंपरा का मिश्रण देखने को मिला। इसे बेस्ट इन आल का पुरस्कार भी मिला है।

आज भी इलाहाबाद में अधिकतर बारवारियां पारंपरिक पूजा में ही विश्वास करते हैं। जो थीम पूजा का समर्थन करते हैं वह भी थीम और परंपरा के मिश्रण को पसंद करते हैं। 

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