Saturday, November 25, 2017
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holika dehen
होलाष्टक है होली पर्व का आगाज़
20 मार्च से होलाष्टक प्रारम्भ

'होलाष्टक के आठ दिन मांगलिक कार्यों के लिए निषिद्ध माने जाते हैं। होलाष्टक का संदर्भ भगवान श्री भोले नाथ से जुड़ा है, एक बार क्रोध में आकर उन्होंने कामदेव को भस्म कर दिया, तभी से होलाष्टक की शुरूआत हुई। होली पर्व के आने की सूचना होलाष्टक से प्राप्त होती है।

फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी से लेकर होलिका दहन तक के समय को धर्मशास्त्रों में होलाष्टक का नाम दिया गया है। ज्योतिष के ग्रन्थों में 'होलाष्टक के आठ दिन समस्त मांगलिक कार्यों में निषिद्ध कहे गए हैं। इन आठ दिनों में क्रमश: अष्टमी को चन्æमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल तथा पूर्णिमा को राहु उग्र रूप लिए हुए रहते हैं, जिससे यह समय अवधि अशुभ मानी गई है, मांगलिक कार्यों पर इसलिए विराम लग जाता है। पूर्णिमा से आठ दिन पूर्व मनुष्य का मसितष्क अनेक सुखद-दुखद आशंकाओं से ग्रसित हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को अष्टग्रहों की नकारात्मक शä किे क्षीण होने पर स्वकीय सहज मनोभावों की अभिव्यक्ति रिंग, गुलाल आदि द्वारा प्रदर्शित होती है। 'होलाष्टक दो शब्दों से मिलकर बना है, होला और अष्टक, अष्टक अर्थात आठ इसलिए होली जलने से आठ दिन पूर्व होलाष्टक में शुभ कर्म नहीं किए जाते, न ही कोई मांगलिक कार्य होता है, कोई नई वस्तु नहीं खरीदी जाती। सामान्य रूप से देखा जाए तो होली एक दिन का पर्व न होकर पूरे नौ दिन का त्योहार है। होलाष्टक के मध्य दिनों में सोलह संस्कारों में से किसी भी संस्कार को नहीं किया जाता, यहां तक कि अंतिम संस्कार करने से पूर्व भी शांति कार्य किए जाते हैं। इन दिनों में सोलह संस्कारों पर रोक होने के कारण इस अवधि को शुभ कार्यों के लिए श्रेष्ठ नहीं माना जाता। होलाष्टक के विषय में यह माना जाता है कि जब भगवान श्री भोले नाथ ने क्रोध में आकर कामदेव को भस्म कर दिया था, तो उस दिन से होलाष्टक की शुरूआत हुई थी। होली की शुरूआत होली पर्व होलाष्टक से प्रारम्भ होकर दुलहण्ड़ी तक रहती है। होलाष्टक से होली के आने की दस्तक मिलती है, साथ ही उस दिन से होली उत्सव के साथ-साथ होलिका दहन की तैयारियां भी शुरू हो जाती हैं। इस दिन से मौसम की छटा में बदलाव आना आरम्भ हो जाता है। सर्दियां अलविदा कहने लगती हैं और गर्मियों का आगमन होने लगता है। भगवान श्री कृष्ण आठ दिन तक गोपियों संग होली खेले और दुलहण्डी के दिन अर्थात होली को रंगों में सन कपड़ों को अगिन के हवाले कर दिया, तब से आठ दिन तक यह पर्व मनाया जाने लगा। पौराणिक दृषिटकोण से प्रहलाद का अधिग्रहण होने के दु:ख में होलाष्टक अशुभ माना गया है। उत्तर भारत और पंजाब में होलाष्टक का विशेष विचार किया जाता है।

होलाष्टक पूजन विधि : होलिका पूजन करने के लिए होली से आठ दिन पहले होलिका दहन वाले स्थान को गंगाजल से शुद्ध कर उसमें सूखे उपले, सूखी लकड़ी, सूखी घास व होली का डंडा स्थापित कर दिया जाता है। जिस दिन यह कार्य किया जाता है, उस दिन को होलाष्टक प्रारम्भ का दिन भी कहा जाता है। जिस गांव, क्षेत्र या मौहल्ले के चौराहे पर यह होली का डंडा स्थापित किया जाता है, होली का डंडा स्थापित होने के बाद सम्बंधित क्षेत्र में होलिका दहन होने तक कोई शुभ कार्य सम्पन्न नहीं किया जाता है।

 

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