Monday, November 20, 2017
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mahanisha

दीपावली की आधी रात पष्चात जो समय आता है, उसको 'महानिशा काल कहा गया है, जिसमें लक्ष्मी जी की साधना का विशेष महत्व है। महानिशा काल में लक्ष्मी आराधना करने से निसंदेह अक्षय लक्ष्मी प्राप्त होती है। महानिशा एक ऐसी रात्रि है जो साल भर में केवल एक बार आती है इसलिए तंत्र-मंत्र साधक इस अचूक समय का भरपूर उपयोग करते हैं।

अन्य समय जिन यंत्र-मंत्र-यंत्र एवं साधनाओं की सिद्धि के लिए लाखों संख्या में जाप-हवन करना पड़ता है वहीं सिद्धि महानिशा की अमर बेला में साधक सहज ही अर्जित कर लेता है इसलिए तंत्र-मंत्र-यंत्र इन तीनों की सिद्धि महानिशा की कालविधि में की जाती है। अमावस्या अंधकार एवं प्रकाश हीनता का स्व'प है। अमावस्या के दिन सूर्य और चंद्रमा का आपस में मिलन होता है अर्थात चंद्रमा राशिपथ पर चलते-चलते सूर्य जिस राशि में है उसमें पहुँच जाता है। दीपावली की रात्रि में भगवती महालक्ष्मी विश्व भ्रमण पर अपने पतिदेव श्री हरि भगवान विष्णु के साथ निकलती हैं तथा जिस स्थान पर अपनी उपासना-आराधना होते हुए देखती हैं वहीं अपनी स्थायी निवास बना लेती हैं। माँ लक्ष्मी के साथ भगवान विष्णु, गणेश जी, शिव जी, माँ काली, माँ सरस्वती, कुबेर आदि देवताओं की पूजा भी करनी चाहिए। इस रात्रि श्री सूर्य तथा श्री लक्ष्मी सूर्य का पाठ स्वयं करना चाहिए। ज्योतिषशा के अनुसार लग्न तीन प्रकार की होती हैं, चर, सिथर एवं द्विस्भाव लग्न। चर लग्न में लक्ष्मी पूजन करने के से लक्ष्मी चलायमान हो जाती हैं, द्विस्भाव लग्न में पूजन करने से लक्ष्मी का आवागमन बना रहता है और यदि सिथर लग्न में लक्ष्मी पूजन किया जाए तो लक्ष्मी का स्थायित्व प्राप्त होता है, अत: दीपावली पर लक्ष्मी पूजन सायंकाल वृष और सिंह सिथर लग्न में ही सम्पन्न करें ताकि आपके यहाँ लक्ष्मी स्थायी रूप से निवास कर सके।

 

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