Monday, November 20, 2017
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maa kali

दीवाली के दिन जब लगभग पूरे देश में लक्ष्मी गणेश की पूजा होती है तब कुछ पूर्वी प्रांतों पशिचम बंगाल, असम और ओडिशा के कुछ हिस्सों, मेघालय इत्यादि में मां काली की पूजा होती है। वहां के लोग भी दीवाली उसी तरह मनाते हैं जैसे की भारत के अन्य भागों में मनाया जाता है। लक्ष्मी गणेश की पूजा प्राय: हर घर में होती है। परंतु मां काली की पूजा काली मंदिरों या बारवारियों में होती है। कुछ गिने चुने घरों में काली पूजा का इतिहास है वहां अब भी पूजा होती है।ज्यादातर काली पूजा मनाने वाले इस दिन सुबह से वत्र रखते हैं। रात को पूजा होने के बाद ही वत्र तोड़ते हैं। यह पूजा कार्तिक अमावस्या की रात को होता है। काली पूजा तांति्रक मतानुसार भी होता है जो की मध्य राति्र के बाद प्रारंभ होता है।
दूसरे प्रदेशों में रहने वाले बंगाली और अन्य पूर्वी प्रांतों के निवासी काली पूजा के साथ साथ लक्ष्मी गणेश की पूजा भी करते हैं।
पूर्वी बंगाल ( आज का बांग्लादेश द्ध से आये हुए बंगाली भी काली पूजा मनाते हैं। कुछ यहां के रंग में रंग गये हैं और कुछ आज भी वहां की प्रथा को मानते हैं। उस प्रथा के अनुसार काली पूजा में बकरे की बलि चढ़ती है। कुछ लोग इसी को ध्यान में रखते हुए इस दिन बकरे का मांस खाते हैं। पूरे भारत के कुछ काली पूजाओं में आज भी बकरे की बलि चढ़ती है। यह मांस बिना लहसुुन प्याज के बनता है और इसे महाप्रसाद कहते हैं।
काली पूजा के पहले दिन अर्थात चतुर्दशी को बंगाली समुदाय के लोग चौदह दीया जलाते हैं और चौदह तरह के साग एक साथ पका कर खाते हैं।
काली पूजा का प्रारंभ 18वीं सदी में बंगाल के नवद्वीप के राजा कृष्ण चंद्र ने किया था। बाद में यह परंपरा उनके वंशज और बंगाल के अमीर जमींदार परिवारों द्वारा आगे बढ़ाया गया और अब बारवारियों तथा काली मंदिरों में भी यह पूजा होने से यह परंपरा आज तक कायम है और आगे भी रहेगी।पूर्वी प्रदेशों में दुर्गा पूजा के बाद दूसरी सबसे बड़ी पूजा यही है।
मां काली के जन्म की एक कथा है। सच मानें तो सच न मानें तो कल्पना। एक बार शुम्भो और निशुम्भो नामक दो असुरों ने पृथ्वी और देवलोक में तांडव मचा दिया था। देव राज इंद्र का सिंहासन डगमगाने लगा था। तब देवों ने आदि शकित मां दुर्गा से प्रार्थना की। मां दुर्गा ने अपने रौद्र रूप मां काली को प्रस्तुत किया। मां दुर्गा के कपाल ; फोरहेडद्ध से मां काली का जन्म काल भोई नाशिनी के रूप में हुआ। उनके अन्य नाम हैं- श्यामा,आदया मां, तारा मां, दक्षिणा काली, चामुंडी, उनका शांत रूप भद्रकाली।
मां काली के हाथ में खांड़ा है। यह एक घुमावदार तलवार की तरह है। वह अपने साथ डाकिनी और जोगिनी को लेकर असुर संहार को निकल पड़ीं। एक बार उन्होंने असुरों को मारना शुरू किया तो उनमें रक्त की प्यास बढ़ती गई। उन्होने मरे हुए असुरों के मुंडों की माला बनाकर पहनी। एक असुर के कटे सर को बालों से अपने हाथ में पकड़ा जिससे रक्त टपक रहा था। उसके बाद उनके राह में जो कोई भी आया वह उसका वध करती गईं। अंत में उन्हे शांत करने के लिए उनके पति भगवान शिव मां काली के राह में लेट गए। गुस्से में आगे बढ़ती मां काली का पैर पति के ऊपर पड़ा तो वह ठिठक गईं और उनकी जीभ बाहर निकल गई। उनकी रक्त की लालसा खत्म हो गई। मां काली के इसी रूप की पूजा होती है।
यूं तो मां काली हम सबके लिए देवी का रौद्र और भयावह रूप है। परंतु उनका यह रूप रौद्र होते हुए भी एक संदेश देता है। किसी भी सुहागिन का पैर उसके पति पर पड़ता है तो उसकी जीभ स्वत: ही बाहर आ जाएगी। ठीक इसी तरह मां काली का यह रूप दर्शाता है कि वह भी एक पतिव्रता नारी हैं। यह पतिव्रता नारी और रौद्र रूप का मिश्रण है जो दुष्ट का दमन और शिष्ट का पालन करती है।

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