Thursday, November 23, 2017
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holi-brotherhood
' होली के दिन दिल मिल जाते हैं………। जी हां होली दुश्मनी भुलाकर दुश्मन को गले लगाने का दिन है। इसलिए इसे भाईचारे का पर्व कहते हैं।इसमें आपकी मदद करते हैं रंग और गुलाल। दुश्मन को गले लगाईए और गुलाल लगाकर कहिए होली है भई होली है , बुरा न मानों होली है।फिर रंग की फुहार डालिए देखिए आपकी दुश्मनी उड़न छू होकर दोस्ती में बदल जाएगी। दुश्मन हो या दोस्त होली खेलने का यही तरीका प्रचलन में है। कुछ लोगों ने होली के स्वरूप को बदल दिया है। रंग ,गुलाल के साथ पेंट ,वार्निश ,कीचड़ ,गोबर इत्यादि का भी प्रयोग करते हैं जो नहीं होना चाहिए। लेकिन सब लोग होली ऐसे नहीं खेलते। संपूर्ण भारत में मुख्यत: होली का पर्व रंग ,गुलाल और मिठाईयों के साथ ही मनाया जाता है।इसके साथ ही हर राज्य की कुछ अलग परंपरा भी है। आइए भारत के कुछ राज्यों की परंपराओं पर नजर डालते हैं।

उत्तर प्रदेश - यूं तो इस प्रदेश का हर शहर अपने तरीके से होली मनाता है। रंग खेलने के पहले दिन मुहुर्त के अनुसार शाम से लेकर रात तक कभी भी होलिका जलती है। इसे होलिका दहन कहते हैं।लेकिन विश्व प्रसिद्ध है मथुरा वृंदावन की होली। यह वह स्थान है जहां श्री कृष्ण ने अपना बचपन गुजारा है। यहां होली का त्यौहार आठ दिनों तक मनाया जाता है। राधा - कृष्ण के हर मंदिर में होली मनाया जाता है लेकिन अलग अलग दिनों पर। जिस दिन जिस मंदिर में होली खेली जाती है लोग उस दिन निर्धारित मंदिर में रंग से सराबोर होने के लिए पहुंचते हैं और इसे भगवान का आर्शीवाद समझते हैं। ब्रज भूमि में होली का प्रारंभ बरसाना की लडडू होली से होती है। इसमें रंगों के साथ एक दूसरे पर लडडू फेंकते हैं। बरसाना की लठठ मार होली के बारे में कौन नहीं जानता।मथुरा से लगभग 50 किमी दूर राधा के गांव बरसाना में श्री कृष्ण के गांव नंदगांव के पुरूष बरसाना की महिलाओं से होली खेलने आते हैं। रोचक बात यह है कि होली रंग , गुलाल नहीं लाठियों से खेली जाती है।इसके बाद नंदगांव की लठठमार होली होती है। बलदेव की होली हुरंग बहुत प्रसिद्ध है। उत्तर प्रदेश में गुझिया नाम की मिठाई ,पापड़ , चिप्स होली पर जरूर बनती है।

बिहार - उत्तर प्रदेश के अन्य शहरों की तरह यहां भी रंगों से होली खेली जाती है और एक दिन पहले होलिका जलाई जाती है लेकिन यहां इसे आगजा कहते हैं। यहां होली पर पूआ नाम की मिठाई बनती है।

हरियाणा - होली के दिन हरियाणा की सड़कों पर मठठे से भरा मटका उंचाई पर टांग दिया जाता है।इसे तोड़ने के लिए मानव पिरामिड बनाया जाता है।जितनी उंचाई पर मटका टांगा जाता है ,उसे तोड़ने के लिए पिरामिड उतनी उंची बनाई जाती है। 

संयुक्त हिंदू परिवार की परंपरा है इस दिन भाभी अपने देवर को झूठी लड़ाई में उलझाएगी और देवर को रस्सी पर साड़ी लपेटकर उससे पीटेगी लेकिन सब कुछ मजाक में होता है और शाम को देवर अपनी भाभी के लिए मिठाई लेकर आता है।

महाराष्ट्र , गुजरात - यहां होली के दिन जुलूस की शक्ल में रंग से सराबोर लड़कों की टोली सड़कों पर निकलती है और लोगों को सावधान करती है कि सब अपने मक्खन और छाछ के मटके ठीक से रखें ताकि कृष्ण आकर चुरा न लें। यह परंपरा कृष्ण के माखनचोर रूप को दर्शाती है।

यहां भी मठठे से भरी मटकी सड़कों पर उंचाई में टांगी जाती है।लड़के इस तरह खड़े होते हैं जिससे सीढ़ीनुमा ढांचा बने और कोई एक उपर तक पहुंचकर मटकी फोड़ने की कोशिश करता है। जो सफल होता है उसे मुहल्ले के होली का राजा का पुरस्कार मिलता है। यहां होली पर बेसन , रवा इत्यादि के लडडू बनते हैं।

पशिचम बंगाल - यहां होली को दोल जात्रा कहते हैं। परंपरा के अनुसार बंगाल में श्री कृष्ण और राधा की मूर्तियों को झूले पर बैठाकर भक्त बारी बारी से झूला झुलाते हैं। महिलाएं भकित संगीत गाती हैं और झूले के चारों ओर नृत्य करती हैं और पुरूष एक दूसरे पर रंग डालते हैं तथा अबीर लगाते हैं। लेकिन जैसे कि हर जगह पर परंपराओं का महत्व खोता जा रहा है इसी तरह बंगाल में अब ऐसी परंपरागत होली कम ही देखने को मिलती है। अब होली के दिन सुबह पुरूष और महिलाएं मिलकर रंग और गुलाल से होली खेलते हैं और बाद में रंग और गुलाल लगाए चेहरों के साथ जुलूस निकालते हैं। इसमें महिलाएं भी होती हैं और संगीत भी होता है। होली की पूर्व संध्या अर्थात पूर्णिमा लगने के बाद सांझ को होलिका दहन होता है। इसे बंग्ला भाषा में 'बूड़ीड़ घर पोड़ानो कहते हैं जिसका अर्थ है बुढि़या का घर जलाना । बंगाल में अन्य मिठाइयों के साथ मालपूआ अवश्य बनता है। मालपूआ श्री कृष्ण के भोग में चढ़ने वाला मिठाई है।

कविगुरू रवींद्रनाथ टैगोर ने इस दिन शांतीनिकेतन में बसंत उत्सव का प्रारंभ किया था। बंगाल में सिथत शांतीनिकेतन वह स्थान है जहां परंपरागत पद्धति से शिक्षा प्राप्त करने के लिए स्कूल खुला था। आज यह स्कूल विश्वविधालय का रूप ले चुकी है। यहीं पर कविगुरू द्वारा प्रारंभ किया गया बसंत उत्सव आज भी होता है। इस अवसर पर लड़के और लड़कियां बसंत ऋतु का स्वागत करते हैं। रंगों के साथ रवींद्र संगीत और नृत्य का कार्यक्रम होता है। लड़कियां पीले रंग की साड़ी और फूलों ; मुख्यत: पीले फूलों द्ध के गहने पहनकर नृत्य करती हैं। यह सांस्कृतिक कार्यक्रम खुले में होता है। कुल मिलाकर यहां की होली निराली होती है। 

ओडिशा - यहां बंगाल की तरह ही होली मनाने की परंपरा है। झूले में श्री कृष्ण और राधा के स्थान पर भगवान जगन्नाथ की मूर्ति होती है।

होली मनाने का तरीका भले ही हर राज्य में अलग हो लेकिन लक्ष्य एक ही है। दुश्मनी भुलाकर दोस्ती को गले लगाना। आज की पीढ़ी को यह याद रखना होगा कि होली परंपरागत तरीके से खोली जाए या आज के तरीके से लक्ष्य यही होना चाहिए और होली सभ्य तथा सुंदर होनी चाहिए।

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