Thursday, November 23, 2017
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इस साल कार्तिक माह में अमावस्या पर दीवाली मनाने के बाद चतुर्थी से चार दिवसीय छठ पर्व डाला छठ  प्रारंभ हो गया है।

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क्यों सूर्य को समर्पित करते हैं छठ पूजा

वेदों के युग में जिस प्रकार सूर्य देव की पूजा होती थी ठीक वही नियम छठ पूजा में निभाए जाते हैं अत: हम कह सकते हैं कि छठ पूजा वैदिक पर्व है। इसे सूर्य षष्ठी पूजा भी कहते हैं। सूर्य को धरती पर जीवन का मुख्य सा्रेत माना जाता है। इसलिए इस पूजा के जरिये सूर्य देव को      निरंतर ऊर्जा, पृथ्वी पर जीवन बनाए रखने के लिए ,खुशहाली,समृ द्वि एवं विकास के लिए धन्यवाद किया जाता है।

सूर्य देव की पूजा करने से रोगों यहां तक कि कुष्ठ रोग का भी नाश होता है। ऐसा हिंदू धर्म का मानना है। छठ पूजा में चार दिनों तक कठिन नियमों का पालन करना पड़ता है जैसे- पवित्र नदी में स्नान, लंबे समय के लिए निर्जल वत्र रखना , नदी में लंबे समय तक खड़े रहना , प्रसाद   चढ़ाना , प्रार्थना करना , डूबते और उगते सूरज को अर्घ देना।

यह पूजा मुख्यत: बिहार , झारखंड , पूर्वी उत्तर प्रदेश , नेपाल के तरार्इ क्षेत्र में होती है। आजकल संपूर्ण भारत तथा विदेशों में भी जहां इन स्थानों के मूल निवासी रहते हैं वहीं छठ मनाया जाता है।

छठ का इतिहास

छठ पूजा साल में दो बार होती है। एक कार्तिक शुक्ल षष्ठी को जिसे डाला छठ कहते हैं और एक होली के कुछ दिन बाद जिसे चैती छठ कहते हैं। उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड पड़ती है और छठ में निर्जल व्रत रखना पड़ता है। डाला छठ के समय ठंड की शुरूआत हो जाती है। चैती छठ के समय गर्मी की शुरूआत होती है। इसलिए उत्तर भारत में डाला छठ का ही अधिक प्रचलन है  क्योकि इस मौसम में निर्जल व्रत असहनीय नहीं होता ।

शाक्य द्वीपी ब्राहमण सूर्य उपासक थे। उनको स्थानीय राजाओं ने निमंति्रत किया और इससे छठ पूजा की परंपरा प्रारंभ हुर्इ। ऋग-वेद में सूर्य पूजा के जिन नियमों का उल्लेख मिलता है  छठ पूजा वैसे ही होती है। महाभारत के अनुसार द्रौपदी ने भी इसी तरह से सूर्य उपासना की थी जिसका फल भी उसे मिला। एक मत यह भी कहता है कि सूर्य पुत्र कर्ण ने इस पूजा की शुरूआत की थी।

छठठी मैया कौन है

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छठ पूजा में जिस देवी को पूजा जाता है उसे छठठी मैया कहते हैं। छठठी मैया को वेद में ऊषा कहा गया है। कुछ विद्वानों के अनुसार वह सूर्य की पत् नी है और कुछ के अनुसार सूर्य की प्रेमिका। ऊषा का अर्थ है सूर्योदय का मुहुर्त। परंतु छठ पूजा में छठठी मैया का अर्थ है दैवीय चेतना की किरण।

चार दिवसीय छठ पूजा

पहला दिन - नहाए खाए

इस दिन छठ करने वाले पवित्र नदी में स्नान करते हैं जैसे गंगा। फिर दिन में एक बार  खाना खाते हैं। खाना मिटटी के चूल्हा में आम की लकड़ी जलाकर नए मिटटी के या कांस के बर्तन में पकाया जाता है। यदि नया बर्तन न हो तो ऐसा बर्तन होना चाहिए जिसमें कभी मांसाहार न बना हो। अधिकतर क्षेत्रों में इस भोजन को कददू -भात कहते हैं। इसमें कददू , चने की दाल और अरवा चावल होता है।

दूसरा दिन - खरना

पूरा दिन व्रत रखना पड़ता है। सूर्यास्त के कुछ समय पश्चात ही धरती की पूजा की जाती है। रसियाओ  खीर , पूरी तथा केले से व्रत तोड़ा जाता है। खीर में चीनी नहीं पड़ता केवल गुड़ से बनता है। इसके बाद 36 घंटे का निर्जल व्रत प्रारंभ हो जाता है।

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तीसरा दिन - संझा अर्घ

सारा दिन घर में प्रसाद बनाया जाता है। इस दिन शाम को घर के सभी लोग व्रत करने वाले को लेकर नदी तट पर जाते हैं। ठेकुआ , फल इत्यादि के साथ अस्तगामी सूर्य को दूध का अर्घ चढ़ाते हैं। व्रत करने वाली महिला एक रंग की साड़ी पहनती हैं जिसका किनारा हल्दी से रंगा हो। तीसरे दिन शाम को नदी तट से लौटने के बाद एक अन्य रंगारंग रस्म होती है। गन्ने के चंदवा के नीचे मिटटी के दीया सहित मिटटी का हाथी एवं प्रसाद से भरा डलिया रखते हैं। यहां अगिन देव की पूजा होती है।इसके बाद छोटे व्रत करने वाले बड़ों से आर्शीवाद लेते हैं।

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चौथा दिन - पारण

इस दिन भोर में व्रत करने वाले परिवार और मित्रों के साथ नदी तट पर आकर उगते सूरज को अर्घ देते हैं। व्रत करने वाले प्रसाद बांट कर खाते हैं और व्रत तोड़ते हैं।

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छट की मस्ती एवं परंपरा

छठ खुशियों से भरा रंगारंग पर्व है। सभी इस दिन सज धजकर नदी तट पर जाते हैं। घर एवं नदी तट दोनों जगह भकितमय लोक गीत गाए जाते हैं । नदी तट पर लाखों की भीड़ जमा हो जाती है। नदी की ओर जाने वाले सड़कों को साफ करके सजाया जाता है।

बांस की छोटी डलिया में फल और मिठाई का प्रसाद रखा जाता है। प्याज , लहसुन और नमक के बिना शुद्व शाकाहारी भोजन बनता है। छठ पुरूष और महिलाएं दोनों करते हैं। सूर्य को अर्घ देकर लौटते समय महिलाएं नाक से मांग तक सिंदूर पहनती हैं। एक बार परिवार में छठ पूजा प्रारंभ हो जाए तो आने वाली पीढ़ीयों को भी यह पूजा जारी रखनी पड़ती है।

बिहार के औरंगाबाद एवं नालन्दा के सूर्य मनिदरों में बड़े पैमाने पर छठ पूजा होती है। इस दौरान यहां बहुत भीड होती है। दूर दूर से लोग छठ मनाने यहां आते हैं।

सालों से बिहार एवं झारखंड के लोग नौकरी और पढ़ाई के लिए अन्य स्थानों पर जाते रहे हैं यहां तक की विदेशों में भी और अपने साथ छठ का पर्व भी ले जाते हैं। कहीं कहीं देखने को मिलता है कि  विदेशों में रह रहे भारतीयों को भारत से परिवार छठ के लिए  ठेकुआ भी भेजता है। आटा ,मेवा ,गुड़ ,सौंफ ,घी से बना ठेकुआ छठ पूजा का अभिन्न अंग है।

छठ का पर्व अब भारत के सभी जगह एवं विदेशों में भी होता है। परंतु छठ का असली रंग तो बिहार या झारखंड में ही देखने को मिलता है। जिसने यह कभी नहीं देखा उसने जिंदगी में कुछ खोया है। 

 

 

 

 

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