Saturday, November 25, 2017
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इसे बैसाखी भी कहते हैं। यह संपूर्ण भारत में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। उत्तर भारत में तो इसकी बहुत धूम है खासकर पंजाब में। आजकल तो विदेशों में भी सिख समुदाय धूम धाम से बैसाखी मनाते हैं। हिन्दू और बौद्ध भी इस त्यौहार को मनाते हैं। इसके कई कारण हैं पर नये साल का प्रारंभ ही मुख्य है।

हिन्दूओं के लिए यह नये साल की शुरूआत है। कहा जाता है कि हजारों वर्ष पहले देवी गंगा धरती पर आई थीं और आज भी उन्हीं के सम्मान में अनेक हिन्दू इस दिन गंगा तट पर गंगा स्नान के लिए एकत्र होते हैं परंतु ऐसा केवल उत्तर भारत के उन शहरों में होता है जहां से गंगा बहती है। केरल में बैसाखी को विशू कहा जाता है तो असम में बीहू और बंगाल में शुभो नबोबर्षो। पूरे देश में इस दिन नया साल मनाया जाता है। हर प्रांत में इसे अलग अलग नाम से बुलाते हैं इसके अलावा बैसाखी का फसलों से भी गहरा रिश्ता है। आइए देखें विभिन्न प्रांतों में इसे कैसे मनाया जाता है।

असम -

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असम में बैसाखी को रोंगाली बिहू कहते हैं। यह फसलों का त्यौहार 14 या 15 अप्रैल को पड़ता है। यह हिन्दू नये साल का प्रथम दिन है। यह त्यौहार असम में सात दिनों तक लोग बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं। किसान धान रोपने के लिए खेत को तैयार करता है। इस अवसर पर घरों में भोज का आयोजन होता है। पीठा नाम का एक खाध पदार्थ जो चावल से बनता है इस भोज का प्रमुख अंश होता है। इसके अलावा चावल , गुड़ और दही से कुछ विशेष व्यंजन बनाये जाते हैं। पुरूष एवं स्त्री बिहू गीत गाते हैं और बिहू नृत्य करके आपस में खुशियां मनाते हैं।

केरल-

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मलयालम कैलेंडर के अनुसार पहले दिन को विशू कहते हैं। यह मध्य अप्रैल में पड़ता है। इस दिन तटीय कर्नाटक के टुलू बोलने वाले लोग भी नया साल मनाते हैं और वह भी इसे बिसू कहते हैं। इस दिन विशूकानी की व्यवस्था की जाती है। यह पूजाघर में होती है। यहां कृष्ण की मूर्ति ,आइना, चावल , धान ;छिलके वाला चावलद्ध , सफेद कसाबू पुडावा , खीरा , पान , सुपारी ,धर्म गं्रथ ,रूपये, फल , सबिजयां , सोने के सिक्के या गहने , विशेष प्रकार का फूल , दिया रखते हैं। नारियल को बीच से बराबर हिस्सों में तोड़कर दोनों टुकड़ों में तेल डालकर रूई की बत्ती लगाते हैं। जो व्यकित विशूकानी के निकट सोता है वह सुबह उठकर नारियल वाला दिया जलाता है। यही व्यकित घर के प्रत्येक सदस्य को विशूकानी के निकट ले जाता है। जाते वक्त सदस्यों की आंखें बंद होती हैं। कहते हैं इससे सुख , समृद्धि और अच्छा भाग्य मिलता है। बाद में जानवरों , पौधों और चिडि़यों को विशूकानी दिखाया जाता है।

इस दिन नए कपड़े पहने जाते हैं और रामायण पढ़ी जाती है। गरीब लोगों , नौकरों और बच्चों को रूपये या उपहार दिये जाते हैं। शाम को बच्चे पटाखे छुड़ाते हैं। कड़वा नीम का व्यंजन बनता है जिसे वेप्पमपूरासम कहते हैं। इसके साथ कांजी ,थोरन और आम का रसेदार सब्जी बनता है जिसे मामपाजापचाडी कहते हैं। विशू धूम धाम से सबरीमाला के अयैप्पा मंदिर और गुरूवायुर के श्री कुष्ण मंदिर में मनाया जाता है।


तामिलनाडू -

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यहां पर नव वर्ष को पुथंडू पिराप्पू कहते हैं जिसे वरूषा पिराप्पू भी कहा जाता है। इस दिन घर के सामने रंगोली या कोलम बनाई जाती है। रंगोली के बीच में एक दिया रखा जाता है जिसे कुथूविल्लाकू कहते हैं। केरल के विशूकानी की तरह यहां भी कान्नी होती है और घर के सभी सदस्य सबसे पहले उठकर कान्नी के दर्शन करते हैं जहां सोना , चांदी , फल , पान , सुपारी , आइने के सामने रखा जाता है। लोग एक दूसरे और बच्चों को उपहार और बधाईयां देते हैं,नये कपड़े पहनते हैं , विशेष प्रकार के व्यंजन बनाये जाते हैं। पंचांग पढ़ी जाती है। आम , गुड और नीम के फूलों से मांग पचड़ी बनाई जाती है।

महाराष्ट्र एवं गोआ -

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महाराष्ट्र और कोंकण क्षेत्र में नये साल को गुडी पाढ़वा कहते हैं। गुडी का अर्थ है ब्रहमध्वज यानि ब्रहमा का ध्वज। इसकी पूजा होती है। इसे खिड़की या घर के मुख्य द्वार के दाहिनी ओर बांस पर बांधा जाता है।यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। गुडी सुख समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है। पाढ़वा का अर्थ प्रतिपद यानि अमावस्या का दूसरा दिन। माना जाता है कि इसी दिन ब्रहमा ने सृषिट की रचना की थी। इस दिन को ब्रहमा के साढ़े तीन मुहुर्त का प्रतीक माना जाता है और यह इतना पवित्र दिन होता है कि कोई भी अच्छा काम ज्योतिष की सलाह के बगैर ही किया जा सकता है।

चमकीले हरे या पीले रंग के कपड़े जिसका किनारा जरी से बना हो को बांस के इर्द गिर्द बांधा जाता है। इसे नीम के पत्ते , आम के पत्ते और फूलों की माला से सजाया जाता है तथा इसके उपर चांदी या तांबे के कलश को उलटा करके लगाया जाता है। गुडी के सामने रंगोली बनाई जाती है।

सिक्खों के लिए बैसाखी का बहुत महत्व है। बैसाखी के दिन सन 1699 में सिक्खों के दसवें गुरू गुरू गोविंद सिंह ने पंथ खालसा की स्थापना की थी। इसके अलावा इस दिन किसान वाहे गुरू को प्रचुर मात्रा में फसल देने के लिए धन्यवाद करते हैं और समृद्ध भविष्य की कामना करते हैं। पंथ खालसा की स्थापना 13 अप्रैल बैसाखी के दिन हुई थी इसलिए यह सप्रदाय 13 को ही यह पर्व मनाता है।

ग्रामीण पंजाब -

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यह त्यौहार पंजाब के ग्रामीण इलाकों में अत्याधिक उल्लास और खुशी के साथ मनाया जाता है। किसान परिवार और गावों के लोग खेतों में भांगड़ा करते नजर आते हैं। यह नृत्य कृषि की संपूर्ण प्रकि्रया की कहानी कहता है खेत जोतने से फसल काटने तक। यह त्यौहार उन लोगों को आने वाले फसलों के मौसम के लिए तैयार करता है जिसकी शुरूआत अगले दिन से होती है। खेत में फसल उगाने के लिए कड़ी मेहनत से पहले यह भोज और खुशियों का समय होता है।

पूर्व पंजाब -

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यहां मुख्य समारोह तलवंडी साबो में होता है। इस स्थान पर गुरू गोविंद सिंह ने नौ महीने बिताए और गुरू ग्रंथ साहिब के पुर्नसंकलन का कार्य पूरा किया था। इसके अलावा खालसा के जन्म स्थान आनंदपुर साहिब के गुरूद्वारा और अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में बैसाखी धूम धाम से मनाई जाती है। सिख समुदाय के लोग गुरूद्वारों को सजाते हैं , भोर से ही गुरूद्वारे आकर मत्थ टेकते हैं। बाद में शहर में जुलूस भी निकालते हैं।

पशिचमी पंजाब -

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ननकाना साहिब में बैसाखी की भीड़

पशिचमी पंजाब अर्थात पाकिस्तान में सिख समुदाय बड़े पैमाने पर बैसाखी मनाता है। पाकिस्तान के पवित्र शहर हसन अब्दल में गुरूद्वारा पंज साहिब , ननकाना साहिब ;जहां गुरू नानक का जन्म हुआ थाद्ध के अनेक गुरूद्वारे और लाहौर के ऐतिहासिक स्थानों पर बैसाखी मनाई जाती है।
यह पंजाबियों का महत्वपूर्ण त्यौहार है और बैसाखी पर प्रति वर्ष पूरी दुनिया से सिख तीर्थ यात्री ननकाना साहिब और हसन अब्दल आते हैं।
सिख समुदाय विदेशों में भी फैला हुआ है और इनके साथ साथ बैसाखी भी विदेशों में फैल गई। आजकल विदेशों में धूम धाम से मनाई जाती है।

अमेरीका ,कनाडा -

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अमेरीका में बैसाखी के दिन एक विशाल परेड निकलती है। मैनहेटन ,न्यू यार्क में लोग सेवा करने के लिए बाहर आते हैं जैसे मुफत भोजन बांटना , किसी और का कार्य निपटाना इत्यादि। लास एंजिल्स , कैलिर्फोनिया में 20 से भी अधिक गुरूद्वारे हैं जहां पर वहां का सिख समुदाय पूरे दिन कीर्तन करता है। उसके पश्चात लास एंजिल्स में लगभग दो मील की परेड होती है जिसमें करीब 15,000 लोग भाग लेते हैं। वैंक्यूवर ,ऐबौटसफोर्ड एवं सरे , बि्रटिश कोलंबिया , कनाडा में अप्रैल के सप्ताहांत पर वार्षिक बैसाखी समारोह होता है। इस दौरान नगर कीर्तन होता है जिसमें लगभग दो लाख लोग भाग लेते हैं।

यूनाइटेड किंगडम -

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बरमिंगघम में बैसाखी


यहां सिख समुदाय एक प्रतिषिठत समुदाय है। यहां सिखों की जनसंख्या काफी अधिक है। सन 1960 के दशक से अप्रवासी सिखों ने यहां आना आरंभ किया। 1970 के दशक के दौरान इसमें तेजी आई जब पूर्वी अफ्रीका से सिख आश्रित बनकर यहां आए। 1990 के दशक के दौरान अफगानिस्तान से भी सिख आने लगे। यहां सबसे अधिक सिख वेस्ट मिडलैंडस के बरमिंघम और वेस्ट लंडन के साउथहाल में है। बैसाखी के एक या दो सप्ताह पहले रविवार को साउथहाल नगर कीर्तन होता है जिसमें 40,000 से 75,000 लोग शामिल होते हैं। बरमिंघम नगर कीर्तन अप्रैल के अंत में होता है। यह वार्षिक समारोह है जिसमें लगभग एक लाख लोग भाग लेते हैं। इसका समापन तब होता है जब शहर के गुरूद्वारों से दो अलग अलग नगर कीर्तन शहर के सड़कों पर निकलती है जो हैंडसवर्थ पार्क के बैसाखी मेले में आकर मिल जाती है।
मलेशिया में सिख समुदाय अल्प संख्यक समुदाय है। यहां पर भी बैसाखी धूम धाम से मनाई जाती है।

सिखों में बैसाखी की धूम कुछ जयादा ही है।भारत और विदेशों में जहां जहां भी सिख हैं बैसाखी अवश्य मनाई जाती है। परंतु सभी प्रांत के लोग अपने अपने तरीके से बैसाखी मनाते हैं। ओडिशा, पशिचम बंगाल , ति्रपुरा , कश्मीर , कुमाउं - उत्तराखंड में विभिन्न नामों से बैसाखी मनाई जाती है। हिमाचल प्रदेश में इस दिन हिंदू देवी ज्वालामुखी की पूजा होती है तो बिहार में सूर्य देव की। बैसाखी के दिन सन 1875 में स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की नींव रखी थी। भारत के बाहर नेपाल और श्री लंका में भी बैसाखी मनाई जाती है। जहां कहीं भी यह मनाया जाय इसका संबंध नये साल और फसल से है। यहां तक कि इस दिन श्री लंका में भी नया साल मनाया जाता है जिसे वहां आलुथ अवुरूडडा कहते हैं। इस दिन मिथिला ,नेपाल में भी जुर शीतल यानि नया साल होता है। धूम धाम से नहीं लेकिन बौद्ध भी बैसाखी मनाते हैं।

 

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