Thursday, November 23, 2017
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PoorBest 

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चित्र - कावेरी घोष

बंगाली नया साल 14 या 15 अप्रैल को प्रति वर्ष मनाया जाता है। इस दिन पोएला बोइशाख होता है। पोएला का अर्थ है पहला और बोइशाख बंगाली कैलेंडर का पहला महीना है।नाम चाहे कुछ भी हो पोएला बोइशाख भारत के पशिचम बंगााल ,असम ,ति्रपुरा ,झारखंड ,ओडिशा और जहां जहां भी बंगाली या इन प्रांतों के लोग रहते हैं वहां इसको बहुत धूम धाम से मनाया जाता है। भारत के अलावा कुछ अन्य देशों में भी पोएला बोइशाख को नया साल मनाया जाता है पर आज का बांगलादेश में नया साल पोएला बोइशाख के नाम से मनाते हैं क्योंकि भारत पाकिस्तान बंटवारे से पहले यह पूर्व बंगाल था। इस बार पोएला बोइशाख 15 अप्रैल को है।बंगाली नये साल की पारंपरिक शुभकामना है शुभो नबबर्षो अर्थात पोएला बोइशाख को बंगाली समुदाय के लोग एक दूसरे को;अनजान लोगों को भीद्ध देखकर शूभो नबबर्षो कहते हैं।

सम्राट अकबर और बंगाली कैलेंडर-
बंगाली कैलेंडर हिन्दू वैदिक सौर मास , सूर्य सिद्धांत पर आधारित है। मुगल सम्राट अकबर ने बंगाली कैलेंडर का इस्तेमाल करना प्रारंभ किया क्योंकि यह उन्हें कर अदायगी के लिए सुविधाजनक लगा। हिजरी मूलत: चन्द्र मास पर आधारित है इसलिए यह फसलों पर आधारित नहीं है। इससे प्रजा को कर देने में बहुत परेशानी होती थी। बंगाली कैलेंडर सौर मास पर आधारित होने के कारण पूरी तरह फसलों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। सम्राट अकबर के राज ज्योतिष आमिर फतेउल्लाह सिराजी ने इस कैलेंडर का विकास किया । प्रारंभ में इस कैलेंडर को 'फसली सन कहा गया। बाद में इसे बंगाब्दो कहा जाने लगा। आज भी यह नाम प्रचलन में है। कैलेंडर का प्रारंभ 10 - 11 मार्च 1584 में हुआ था लेकिन इसमें तारीख 5 नवंबर 1556 या 963 हिजरी से थी। यह वह दिन था जिस दिन पानीपत की दूसरी लड़ाई में अकबर ने हेमू को हराया था। अकबर का आदेश था कि साल के अंतिम महीने चोइत्रो मास के अंतिम दिन तक सारे कर जमा हो जाने चाहिए। इसके अगले दिन नया साल शुरू होता था और इसके साथ ही व्यापारियों का नया खाता जिसे हालखाता कहा जाता था। हालखाता का प्रचलन बंगाल में आज भी है। अकबर के समय में भी इस दिन मेला लगता था , लोग मिठाई बांटते थे , व्यापारी मिठाई खिलाकर लोगों से नया व्यापारिक संबंध प्रांरभ करते थे। धीरे धीरे पोएला बोइशाख खुशियां मनाने का दिन बन गया।

 

बंगाल में नबबर्षो -

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कोलकाता में प्रभात फेरी


बंगाल में बोइशाख का पूरा महीना शुभ माना जाता है। इस दिन लोग नये कपड़े पहनकर एक दूसरे से मिलते हैं ओर शूभो नबबर्षो कहते हैं।

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कोलकाता का चोइत्रो सेल

कोलकाता के बाजारों में साल के अंतिम महीने चोइत्रो में सेल लगता है जिसे चोइत्रो सेल कहते हैं। इस सेल में कीमतें काफी कम रहती हैं । बहुत लोग इसी समय साल भर का जरूरी सामान खरीद लेते हैं। कोलकाता का यह सेल बहुत प्रसिद्ध है। दूसरे शहरों से बंगाली और बांगलादेश से भी लोग इस सेल में खरीददारी करने आते हैं। 

बंगााल में इस दिन परिवार की समृद्धि और भलाई के लिए पूजा होती है। कोलकाता के प्रसिद्ध काली मंदिर काली घाट में पोएला बोइशाख की पूर्व राति्र से ही पूजा चढ़ाने के लिए लोग लाईन में खड़े रहते हैं। बंगाली महिलाएं इस दिन लाल किनारे की सफेद साड़ी और पुरूष धूती , पांजाबी ;धोती कुर्ताद्ध पहनकर भोर में प्रभात फेरी निकालकत नये साल का स्वागत करते हैं। नया व्यापार, नयी संस्थाएं प्रारंभ करने के लिए यह बहुत शुभ दिन है। इस दिन व्यापार के अलावा भी किसी प्रकार का शुभ कार्य किया जा सकता है।

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हालखाता की पूजा

बंगाली हिंदू व्यापारी इस दिन हिसाब किताब का नया खाता खरीदते हैं।इसे हालखाता करते हैं। पूजा के बाद ही इसमें हिसाब लिखना शुरू होता है।पूजा के दौरान पंडित मंत्र पढ़ते हैं और हालखाता पर स्वासितक का चिन्ह बनाते हं।

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कोलकाता के नन्दन में बंगाली नव वर्ष

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कोलकाता के मुहल्लों के सांस्कृतिक कार्यक्रम

पोएला बोइशाख सांस्कृतिक कार्यक्रमों का दिन है। पशिचम बंगाल में इस दिन कई स्थानों पर मेले लगते हैं। सबसे प्रसिद्ध है बंगला संगीत मेला। यह नन्दन - रवींद्र सदन के मैदान में होता है। मुहल्लों में छोटे पैमाने पर नृत्य और संगीत का कार्यक्रम आयोजित होता है। इस शहर में इस दिन कविगुरू रवींद्रनाथ टेगोर का प्रसिद्ध गीत ' एशो हे बोइशाख एशो एशो गूंजता रहता है। इस गीत का अर्थ है आओ बोइशाख आओ आओ अर्थात नये साल का आवाहन।

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बंगाली भोजन की पारंपरिक थाली
इस सबके अलावा इस दिन का मुख्य आकर्षण होता है भोज जिसमें मांस , मछली , विभिन्न प्रकार के छेने की मिठाइयों की प्रधानता होती है। लोग एक दूसरे को घर पर भोजन के लिए आमंति्रत करते हैं। अपर सोसाइटी के कुछ लोग पार्टी भी करते हैं। होटलों में इस दौरान बंगाली फूड फेसिटवल होता है। घर में छोटे बड़ों के पैर छूते हैं और घर के बाहर भी मिठाई लेकर बड़ों के पैर छूने जाते हैं। बंगाल के ग्रामीण इलाकों में मेले होते हैं जहां गांव के कारीगर दुकान लगाते हैं और गांव के बच्चों तथा महिलाओं के लिए अपने शौक पूरे करने का अच्छा अवसर होता है। कोलकाता की तर्ज पर ही बंगाल के बाहर रह रहे बंगाली पोएला बोइशाख मनाने का पूरा प्रयास करते हैं।

बांगलादेश में नबबर्षो -

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आज सुबह ढ़ाका में खुशियां मनाते लोग

आज के बांगलादेश के सभी पर्व त्यौहार भारत के पशिचम बंगाल से मिलते जुलते हैं क्योकि बांगालादेश , बंटवारे से पहले भारत का अभिन्न हिस्सा था। तब इसे पूर्वी बंगाल कहा जाता था। बंटवारे के समय भारत के हिस्से पशिचम बंगाल आया और पाकिस्तान के हिस्से पूर्वी बंगाल जिसे पूर्वी पाकिस्तान कहा जाता था। सन 1971 में पूर्वी पाकिस्तान , बांगलादेश नाम से एक स्वतंत्र देश बना। लेकिन कभी तो पशिचम बंगाल और पूर्वी बंगाल एक ही देश के दो प्रांत रहे इसलिए केवल पर्व त्यौहार ही नहीं खाना पीना , नृत्य ,संगीत , साज - सज्जा , पहनावा , भाषा ,संस्कृति सब ही पशिचम बंगाल और बांगलादेश का एक ही है।

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छायानट के सदस्य रामना मैदान में नये साल का आवाहन करते हुए

 

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ढ़ाका विश्वविधालय के छात्र मंगल शोभा यात्रा निकालते हुए


बांगलादेश का नया साल पोएला बोइशाख को ही होता है और इसे इसी नाम से जाना जाता है। बांगलादेश की राजधानी ढ़ाका में इसे बहुत धूम धाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है। बांगलादेश के अन्य शहरों में भी लोग जोश के साथ इस दिन को उत्सव की तरह मनाते हैं। पोएला बोइशाख के दिन भोर में सबसे पहले कार्यक्रम की शुरूआत वहां के एक प्रसि़द्ध सांस्कृतिक दल छायानट द्वारा होता है। छायानट का प्रारंभ 1961 में हुआ था। छायानट के सदस्य रामना मैदान में वट वृक्ष के नीचे एकति्रत होकर कविगुरू रवींद्रनाथ टैगोर का गीत ' एशो हे बोइशाख गाते हैं। नये साल के आवाहन के साथ ही वहां के लोग इसे मनाना प्रारंभ करते हैं। इसके बाद ढ़ाका विश्वविधालय के फाईन आर्टस ;कलाद्ध विभाग के छात्र मंगल शोभायात्रा निकालते हैं। यह शोभायात्रा बहुत रंग बिरंगी होती है। इसकी थीम ;विषय वस्तुद्ध हर वर्ष बदल जाती है। अनेक सांस्कृतिक दल एवं बैंड कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं। मेला का आयोजन होता है जिससे बांगलादेश की संस्कृति झलकती है।

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ढ़ाका में नये साल पर नृत्य का कार्यक्रम

यहां बांगला गीतों पर आधरित नृत्य का कार्यक्रम होता है।सांस्कृतिक कार्यक्रमों के अलावा मुंशीगंज में सांड़ों की दौड़ , चटटग्राम में कुश्ती , नौका दौड़ , मुर्गी की लड़ाई , कबूतरों की लड़ाई से भी नया साल मनाया जाता है। बांगलादेश में यह छुटटी का दिन होता है।

चटटग्राम के पहाड़ी क्षेत्र में नबबर्षो - इस क्षेत्र में भिन्न देशीय तीन अल्प संख्यक दल एक साथ मिलकर पोएला बोइशाख मनाते हैं।बोइसुक के ति्रपुरी लोग , सांगराई के मारमा लोग और बीजू के चकमा लोग चोइत्रो मास के अंतिम दिन को मनाते हैं। इस दिन यह पहाड़ी लोग पारंपरिक नृत्य एवं संगीत करते हैं। चटटग्राम के पहाड़ी क्षेत्र में यह दिन पबिलक हालीडे है। चटटग्राम विश्वविधालय के छात्र भी इसे मनाते हैं।

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पान्ता ईलीश
इस दिन बांगलादेश में भी लोग एक दूसरे को बधाइयां देते हैं , घर में तरह तरह के व्यंजन बनते हैं , लोग एक दूसरे को भोज पर निमंति्रत करते हैं ,घूमने जाते हैं इत्यादि। परंतु नये साल पर वहां का सबसे पारंपरिक भोजन है पान्ता ईलीश। रात के बचे हुए चावल में पानी डालकर रख दिया जाता है। दूसरे दिन सुबह पानी से चावल को निकालकर अलग कर लेते हैं इसे पान्ता भात कहते हैं। इस दिन पान्ता के साथ ईलीश यानि हिल्सा मछली खाते हैं। पान्ता के साथ तला हुआ हिल्सा मछली का टुकड़ा , सूखी मछलियां जिसे शूंटकी कहते हैं , दाल ,अचार और हरी मिर्च , कच्चा प्याज ,नमक खाते हैं। इसी को पान्ता ईलीश कहते हैं।

इसके अलावा विदेशों में रहने वाले बंगाली भी पोएला बोइशाख मनाते हैं।कहा जाता है कि विश्व का शायद ही कोई देश होगा जहां बंगाली समुदाय के लोग न हों।

आस्ट्रेलिया में नबबर्षो -

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मेलबोर्न में बंगाली नये साल पर सांस्कृतिक कार्यक्रम

आस्ट्रेलिया के कई शहरों में बंगाली नया साल मनाया जाता है जैसे सिडनी , मेलबोर्न ,कैनबेरा। यहां का बंगाली समुदाय इस दिन की बहुत प्रतीक्षा करता है। यहां के शहरों में बोइशाखी मेला लगता है। यहां पर शहर भर के बंगाली समुदाय के लोग आते हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं जिसमें बंगाली संस्कृति की झलक मिलती है। इसमें नृत्य , संगीत , फैशन शो होता है। कला, संगीत ,पहनावा ,खान पान इत्यादि का स्टाल लगता है। लेकिन हर चीज से बंगाली संस्कृति झलकती है। आस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में बंगाली नया साल सबसे अधिक धूम धाम से मनाया जाता है। सिडनी के बोइशाखी मेला में भारत के बंगालियों के अलावा बांगलादेशियों की अच्छी खासी भीड़ होती है। आस्ट्रेलिया में एक साथ इतने बांगलादेशियों की भीड़ तो सिडनी बोइशाखी मेला में ही देखने को मिलती है। पहले यह मेला सिडनी के बरवुड गल्र्स हाई स्कूल में होता था पर 2006 से यह सिडनी आलिंपिक पार्क में होने लगा।

स्वीडन - स्वीडन का बंगाली समुदाय भी नया साल जोश के साथ मनाता है। सांस्कृतिक कार्यक्रम जैसे नृत्य , संगीत होता है। स्वीडन का बांगलादेश स्टूडेन्टस एसोसिएशन इस अवसर पर बांगलादेश के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करता है।

यूनाइटेड किंगडम -

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लंडन का बोइशाखी मेला


यहां का बंगाली समुदाय बंगाली नया साल लंडन के स्ट्रीट फेसिटवल और बोइशाखी मेला के साथ मनाता है। भारी संख्या में बंगाली इसमें भाग लेते हैं। यह यूरोप में सबसे बड़ा एशियाई पर्व है। बांगलादेश और भारत के पशिचम बंगाल के बाद यू के ही ऐसा देश है जहां सबसे बड़े पैमाने पर यह बंगाली पर्व मनाया जाता है।

जैसा कि पहले कहा गया है कि विश्व के हर देश में यह समुदाय मौजूद है। ठीक वैसे ही जहां भी इस समुदाय के लोग रहते हैं वह अपनी तरह से बंगाली नया साल भी मनाते हैं। यहां तक कि सउदी अरब में भी बंगाली अपना नया साल मनाते हैं।

बंगालियों के अलावा पोएला बोइशाख के दिन अनेक प्रांतों और देशों में अलग अलग नाम से नया साल मनाया जाता है। भारत के असम में बिहू ,केरल में विशू , ओडिशा में महा विषुवा संक्रांति , तामिल नाडू में पुथांडू , कर्नाटक में तुलूवा । बर्मा देश में थिंगयान ,कंबोडिया में चोल चनाम थमेय, लाओस में सांगकन , नेपाल में बिक्रम संवत , श्री लंका में आलुथ अवरूधू , थाइलैंड में सांगकरान , मिथिला में जूड शीतल।

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