Monday, November 20, 2017
User Rating: / 1
PoorBest 

kartik poornima

कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनुष्य दीप जलाकर दीपावली मनाते हैं और मनुष्यों की दीपावली के 15 दिन बाद कार्तिक मास की पूर्णिमा को देवों की दीपावली होती है। कार्तिक माह का सबसे पवित्र दिन कार्तिक पूर्णिमा है, क्योंकि इस दिन देवलोक में दीपोत्सव मनाया जाता है।

मनुष्यों की भांति देवता भी दीप जलाकर दीपोत्सव मनाते हैं। देव दीपावली पूर्णिमा के दिन कार्तिक के महीने में मनाया जाता है और यह देवताओं या परमेश्वर की दीपावली है। कार्तिक की पूर्णिमा को 'त्रिपुरी पूर्णिमा भी कहते हैं, इस दिन गंगा स्नान और दीप-दान का विशेष महत्व है। इस दिन पूर्ण चांद का दर्शन होता है। तुलसी विवाह की रस्म भी इस दिन पूरी होती है और इस दिन तुलसी विदार्इ होती है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्वयं भगवान श्रीष्ण तुलसी महारानी की पूजा निम्नलिखित मंत्र से करते हैं: 


वृंदावनी वृंदा विश्वपूजिता पुष्पसार। नंदिनी कृष्णजीवनी विश्वपावनी तुलसी।


इस मंत्र से पूर्णिमा के दिन जो भी व्यकित तुलसी महारानी की पूजा करता है वह जन्म-मृत्यु के चक्रव्यूह से मुक्त होकर गोलोक वृंदावन जाने का अधिकारी बनता है। देव दीपावली दीपावली समारोह के अंत का प्रतीक है। कहते हैं कि इस दिन देव भी दिया जलाते हैं। इस दिन दोपहर में दीये की रोशनी और रात में चांद की रोशनी के बाद दीयों की रोशनी पूरे वातावरण को खुशनुमा कर देती है। इसके पीछे कथा है कि इस दिन भगवान विष्णु अपने वामन अवतार के बाद और बलि के पास से लौटकर अपने निवास स्थान बैकुंठ पधारे थे। इसी खुशी में लोगों ने दीप जलाए थे। एक अन्य कथा के अनुसार इस दिन भगवान शिव ने तीन दैत्यों का वध किया था जिन्होंने अपनी आसुरी शकित का प्रचार करके निर्दोष मनुष्यों का वध करते थे। भगवान शिव ने इस दिन दैत्यों द्वारा निर्मित तीन राज्यों का भी अंत किया था जहां आतंक और विनाश का साया छाया हुआ था, इसलिए इस दिन को त्रि पुरारी पूर्णिमा भी कहते हैं। इसी दिन सायंकाल के समय भगवान का मत्स्यावतार हुआ था, इसलिए इस दिन दिए गए दान का दस य ज्ञों के समान फल मिलता है। मंदिरों सहित घर-घर की देहरी पर दीपक जलाए जाते हैं। विशेष रूप से तुलसी जी के समक्ष ए वं जल में दीपदान किए जाते हैं। देवीकुण्ड सागर, हर्षोल्लाव तालाब सहित अन्य छोटी-छोटी जल कुणिडयों में दीपदान कर गृह समृद्धि की कामनाएं वधुओं द्वारा की जाती है। तालाबों का नजारा सांझा ढले मनोरम ए वं झि लमिलाया सा नजर आता है। कहा जाता है कि देव दीपावली पर सच्चे दिल से कह गर्इ प्रार्थना और सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं व इस दिन व्रत रखकर और पारण करने पर सच्चे दिल से पुरोहित जोड़ों को भोजन, वस्त्र, दान, दक्षिणा आदि देने से घर में खुशहाली आती है। कार्तिक मास के पहले दिन से पूर्णिमा तक आकाशदीप जलाने की परम्परा अंधियारे से उजाले की ओर बड़ने की सनातन परम्परा है। कार्तिक माह प्रारम्भ से लेकर कार्तिक कृष्ण पक्ष की अमावस्या दीपावली और कार्तिक कृष्ण पक्ष की पूर्णिमा देव दीपावली तक दीए जलाने से जहां ' तमसो मा ज्योतिर्गमय की परम्परा समृद्ध होती है, वहीं मां लक्ष्मी प्रसन्न होती है, दीपों से कीटाणुओं का भी नाश होता है।
पूजन विधि - इस दिन चन्द्रोदय के समय शिवा, सम्भूति, संतति आदि 6 कृतिकाओं का पूजन करना चाहिए। कार्तिकी पूर्णिमा की रात्रि में व्रत करके यदि बैल का दान किया जाए तो शिव पद की प्रापित होती है। इस दिन उपवास करके भगवान का स्मरण करने से अगिनष्टोम के समान फल मिलता है और सूर्यलोक की प्रापित होती है। इसी प्रकार यदि इस दिन स्वर्ण का दान किया जाए तो ग्रहयोग के कष्ट नष्ट हो जाते हैं। प्रत्येक पूर्णिमा को रात्रि में व्रत और जागरण करने से सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध होते हैं।

ज्योतिषाचार्य आशुतोष वाष्र्णेय
निदेषक, ग्रह नक्षत्रम ज्योतिष शोध संस्थान

Add comment

We welcome comments. No Jokes Please !

Security code
Refresh

culture

Who's Online

We have 2774 guests online
 

Visits Counter

749580 since 1st march 2012