Saturday, November 25, 2017


एक जूते चमकाने वाले आदमी का ध्यान बरबस आपके पैरों की ओर चला जाता है, नाई की नजरें आपके बाल-दाढ़ी को टोहती रहती हैं और सुनार को आपके शरीर की सूनी जगहें तुरंत सूझ जाती हैं।

कहानी

 

 

 

 


पेड़ों के झुनझुने,
बजने लगे;
लुढ़कती आ रही है
सूरज की लाल गेंद।
उठ मेरी बेटी सुबह हो गई।

कविता


घर में कुतिया और कंप्यूटर एक साथ आए थे इसलिए सबने लकदक, भूरे रोएँदार, बिलौटे सी चमकती आँखों वाली कुतिया का नाम एकमत से फ्लॉपी रख दिया था।

कहानी


प्रथम तंत्र

एक रात दर्शन दिये सर्वविद्याज्ञानी पं. प्रवर विष्‍णु शर्मा ने। मैंने प्रणाम किया, चाय-कॉफी, पान-सिगरेट के लिए पूछा। बोले, 'मैं बड़े कष्‍ट में हूँ कथाकार!' मैंने अपनी नम्र सेवा के दान का निवेदन किया तो उन्‍होंने प्रसन्‍न हो कहा, 'ईंट-रोड़े मैं देता हूँ, कुनबा तू जोड़ दे!'

व्यंग्य


इलाहाबाद की यात्रा में जिस तरह के चित्र दिखे या बने थे उनको देख कर बहुत भ्रमित हूँ। इस बीच निराला के बाद पचास साल के लगभग का समय व्यतीत हो गया है। पता नहीं यह परिवर्तित होते चित्र हैं या नष्ट होते हुए। मैं बार बार गया, हजार बार गया, पचास सालों में।

संस्मरण

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