Sunday, February 25, 2018

 

 

 

saadat hasan

मेरी जिंदगी में तीन बड़ी घटनाएँ घटी हैं। पहली मेरे जन्म की। दूसरी मेरी शादी की और तीसरी मेरे कहानीकार बन जाने की। लेखक के तौर पर राजनीति में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है। लीडरों और दवाफरोशों को मैं एक ही नजर से देखता हूँ।

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rajkishor writter

मुश्किल यह है कि आदमी के दो या तीन स्वभाव नहीं हो सकते। जो भी स्वभाव होता है, वह सभी के प्रति एक जैसा आचरण करता है। इसलिए यह उनके लिए सिद्धांत का नहीं, आदत का मामला है। आदमी दूसरों को हरा सकता है, अपने को नहीं

उनके आलोचकों की संख्या उनके मित्रों की संख्या से कम होगी। बाज दफा उनके कुछ मित्र भी उनके कुछ निर्णयों ले कर उनकी आलोचना करते हैं लेकिन जैसी कि रवायत है, पीठ पीछे और उसी के सामने जो उन्हें विश्वसनीय लगता है।

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jaindrea

जयराज की तीस वर्ष की अवस्था होगी। धुन में बँधा, सदा कामकाज में रहता है। अपने प्रांत की कांग्रेस का वही प्राण है। लोग उसे बहुत मानते हैं। उन्हें छोड़ और वह रहता किसके लिए है? अविवाहित है और उससे विवाह का प्रस्ताव करने की हिम्मत किसी को नहीं होती।

कहानी

balkrisna

भगवान् कृष्‍णचंद्र ने गीता में मानस तप को लक्ष्‍य कर मन के गुण इस भाँति कहा है-

मन: प्रसाद: सौम्‍ययत्‍वं मौनमात्‍मविनिग्रह:।
    भाव संशुद्धिरित्‍येतत्तपो मानसमुच्‍यते।।

निबंध

neelam shankar

रमेश ने उल्टी गिनती गिनना शुरू कर दिया था। इंतजार करते-करते दशहरा तो बीत गया। उम्मीद अभी भी बँधी थी कि शायद छै महीनों से बकाया पगार इकट्ठी ही मिलेगी जैसे पहले होता आया था। अब वह अखबार कहाँ लेता था। सबसे पहले उसने अपने खर्च में यही कटौती की थी कि सौ सवा सौ भी बच जाएगा तो कम से कम दाल की छौंक का घी का खर्चा तो निकल आएगा। अखबार तो वह रोज सबेरे पान की दुकान पर जाता एक अट्ठनी का गुटका पाउच लेता अपने मतलब की खबरों पर नजर दौड़ता। खबर पढ़-पढ़कर मन ही मन कुढ़ता आज इस संस्थान को सरकार इतने दिनो का बोनस डिक्लेयर कर रही कल उस संस्थान का। मन ही मन बुदबुदाया 'साले तनख्वाह न सही कम से कम बोनस ही दे देते तो अच्छा रहता।'

कहानी

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