Sunday, February 25, 2018

shivani

उसका साथ यद्यपि तीन ही वर्ष रहा, पर उस संक्षिप्त अवधि में भी हम दोनों अटूट मैत्री की डोर में बँध गए। उन दिनों पूरा आश्रम ही संगीतमय था। कभी 'चित्रांगदा' का पूर्वाभ्यास, कभी 'माचेर-खेला', कभी 'श्यामा' और कभी 'ताशेर देश'। उन दिनों आश्रम में सुरीले कंठों का अभाव नहीं था। खुकू दी (अमिता), मोहर (कनिका देवी), स्मृति, इंदुलेखा घोष, विश्री जगेशिया, सुचित्रा ऐसी ही कोकलकंठी सुगायिकाओं के कंठों में एक कड़ी और जुड़ी। जैसा ही कंठ, वैसी ही खाँटी बंगाली जोतदारी ठसक। बूटा-सा कद, उज्ज्वल गौर वर्ण, बड़ी-बड़ी फीरोजी शरबती आँखें, जो पल-पल गिरगिट-सा रंग बदलती थीं। पहले ही दिन उसने संगीत सभा में बाउल गीत गाया -

संस्मरण

kanhiya lal

किसी भी पूर्णिमा की रात मुझे उल्लास और मस्ती से भर देती है, फिर उस दिन तो थी शरद पूर्णिमा की रात। उन्मद, खिलखिलाती और पूरे जग को अपने आँचल में समेटे उमड़ी पड़ती-सी!

निबंध

manohar chamoli

काननवन में हँसी-खुशी और धूम-धाम का माहौल देखकर आस-पास के वनवासी हैरान हो जाते। सुबह से रात होने तक उल्लास और आनन्द की गूँज चारों ओर सुनाई देती। काननवन में खुशियों का स्कूल जो खुल गया था। स्कूल जानेवालों के व्यवहार में तेजी से बदलाव दिखाई देने लगे।

बाल साहित्य

mannu

प्यारी बहनो, न तो मैं कोई विचारक हूँ, न प्रचारक, न लेखक, न शिक्षक। मैं तो एक बड़ी मामूली-सी नौकरीपेशा घरेलू औरत हूँ, जो अपनी उम्र के बयालीस साल पार कर चुकी है। लेकिन उस उम्र तक आते-आते जिन स्थितियों से मैं गुजरी हूँ, जैसा अहम अनुभव मैंने पाया... चाहती हूँ, बिना किसी लाग-लपेट के उसे आपके सामने रखूँ और आपको बहुत सारे खतरों से आगाह कर दूँ।

कहानी

hans 

इलाहाबाद। हिन्दी साहित्य में संभवत: यह पहला मौका है, जब किसी पत्रिका का इंडेक्सबना हो। सुपरिचित लेखक महेंद्र राजा जैन ने प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका हंसके प्रथम पच्चीस वर्षों की विषय सूची तैयार की है। राजेंद्र यादव द्वारा संपादित हंसके अगस्त 1986 से लेकर जुलाई 2011 तक के अंकों पर आधारित इंडेक्स में संपूर्ण सामग्री को लेखक और शोध विषयों के अकारादि क्रम में संयोजित किया गया है।

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