Saturday, November 25, 2017

 

 

 

 

raj kishor

उस दिन ऑफिस देर से पहुँचा था, पर अपने केबिन का दरवाजा खोलते ही मन खिल उठा। कुरसी पर बैठा बाबू बीड़ी फूँक रहा था। उसका हुलिया पूरी तरह से बदला हुआ था - बाल और घने, दाढ़ी-मूँछ बढ़ी हुई और उनके बीच तराशे हुए पतले होठों पर हलकी-सी, शाश्वत किस्म की प्रफुल्ल मुसकान। चेहरे पर पहले वाली बेचैनी नहीं, अबूझ शांति थी। यह हमारा बाबू था, जो करीब पाँच साल पहले अचानक दिल्ली छोड़ कर पता नहीं कहाँ लापता हो गया था। 

अन्य

shiv bhooshan

यदि अल्लाह ने उनके लिए देश-निकाला न दे दिया होता तो दुनिया में वह उन्हें अवश्य यातना दे देता और आखिरत (परलोक) में तो उनके लिए आग की यातना ही है।

- ( कुरान-ए-पाक सूरा अल-हश्र , 59 / 3 )

नाना भूत पालते थे। जब वे मरे तो सारे भूत उड़ गए थे। मैं नाना की मौत पर नहीं जा पाया। गया होता तो शायद उनके उड़ते हुए भूतों को देख सकता।

कहानी

hangal saheb

जयवंत दलवी के नाटक 'सूर्यास्त' का रियाज था। स्थान सांताक्रूज वेस्ट म्यूनिसिपल स्कूल का दूसरी मंजिल स्थित हाल। समय 6.30 बजे शाम। हंगल साहब गाँधीवादी स्वतंत्रता सेनानी के पिता की भूमिका करते थे और उनका बेटा चीफ मिनिस्टर की भूमिका। निर्देशक प्रेम श्रीवास्तव शुरू के शो के बाद कभी आते ही नहीं थे। नाटक के दूसरे अभिनेता भी अपनी-अपनी सुविधानुसार साढ़े सात-आठ बजे तक आते थे। लेकिन हंगल साहब ठीक 6.30 बजे हाजिर। वे समय के इतने पाबंद कि आप उनके आने से अपनी घड़ी मिला सकते थे। मैं उनसे थोड़ा पहले यानी छह-सवा छह बजे तक जरूर पहुँच जाता था । मैं उनका बहुत आदर करता था और वे मुझसे बहुत स्नेह करते थे।

संस्मरण

himalaya-international

 

वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति व ख्यातिलब्ध साहित्यकार विभूति नारायण राय को साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए हिमालय हेरिटेज रिसर्च एवं डेवलपमेंट सोसाइटी, सिक्किम द्वारा वर्ष 2013 का हिमालय अंतरराष्ट्रीय साहित्य सृजन सम्मान प्रदान किया गया है। यह सम्मान राय को हिमालय अंतरराष्ट्रीय महोत्सव 2013 के अवसर पर तीसरे दिन बीते 8 अगस्त को सिक्किम गवर्नमेंट कॉलेज के प्रेक्षागृह में सिक्किम के पर्यटन मंत्री भीम प्रसाद धुंगेल द्वारा सिक्किम विश्वविालय के कुलपति प्रो. टीबी सुब्बा, सिक्किम कॉलेज के प्राचार्य डॉ. एमपी खरेल व पद्मश्री सोनम छिरिंग लेप्चा की उपस्थिति में प्रदान किया गया। इस दौरान नेपाली साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए प्रो. टीबी सुब्बा ने शंकर देव ढकाल को भी हिमालय अंतरराष्ट्रीय साहित्य सृजन सम्मान से सम्मानित किया।

अन्य

kishan patnayak

गांधी का व्यवहार सन्तुलित था, किन्तु उनमें वैचारिक सन्तुलन नहीं था। दूसरे लोग जब आधुनिक सभ्यता से टकराते हैं, अक्सर दोनों स्तर पर सन्तुलन खो देते हैं। प्राचीन सभ्यता के कुछ प्रतीकों को ढूंढ़ कर वे एक गुफा बना लेते हैं और उसमें समाहित हो जाते हैं। उनके लिए समस्या नहीं रह जाती है, संघर्ष की जरूरत नहीं रह जाती है। अधिकांश भारतीय बुद्धिजीवी यह नहीं जानते कि हमारी ‘सभ्यता का संकट’ क्या है? उनका एक वर्ग आधुनिक पश्चिमी सभ्यता को नकार कर या उससे घबराकर प्राचीन सभ्यता के गर्भ में चला जाता है। योग, गो-सेवा या कुटीर उद्योग उनके लिए कोई नवनिर्माण की दिशा नहीं है बल्कि एक सुरंग है, जिससे वे प्राचीन सभ्यता की गोद में पहुँचकर शान्ति की नींद लेने लगते हैं। बुद्धिजीवियों का दूसरा वर्ग पश्चिमी सभ्यता से आक्रांत रहता है, या घोषित तौर पर उसे अपनाता है। उसको अपनाने के क्रम में पश्चिमी सभ्यता का उपनिवेश बनने के लिए वह अपनी स्वीकृति दे देता है।

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