Wednesday, January 17, 2018
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इलाहाबाद। गंगा के किनारे पहुंचते ही फहराती धर्म घ्वजा अपने आप संदेश दे देती हैं कि सनातन धर्म का कोई महोत्सव जल्द ही साकार होने वाला है। मेला क्षे़त्र में लगातार साघु संतों का आना जारी है लेकिन इस बार महिला संत भी अपनी उपसिथती से मेले में बदलते युग की दास्तां लिख रही हैं। संगम की रेती पर ठंड और धूल की परवाह किए बगैर राम नाम जपती इन साधिवयों को देखकर मन श्रद्धा और आदर से भर जाता है। 


ऐसा अदभुत नजार इन दिनों काली सड़क के पास सिथत जूना अखाड़ा परिसर में बसे माईबाड़ा में देखने को मिल जाएगा। माईबाड़े में आने वाली संन्यासियों में प्रमुख नाम मनकामेश्वर मंदिर लखनऊ की पहली महिला महंत दिव्यागिरि का है। फैजाबाद विश्वविधालय से स्नातक के बाद तथा इंडियन इंस्टीटयूट आफ पबिलक हेल्थ एंड हाइजीन से पढ़ाई करने वाली अरूणिमा सिंह मुंबई में पैथोलाजी खोलने का सपना देख रही थी पर ईश्वर ने उनके लिए कुछ और ही सोच रखा था। छुटिटयों में मनकामेश्वर लखनऊ पहुंची अरूणिमा सिंह ईष्वर की भकित में महंत दिव्या गिरि बनकर वहीं की होकर रह गई।

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घर की चारदीवारी में रहने वाली महिलाओं की तुलना में खुले आसमान के नीचे प्रभु की भकित में लीन इन महिला साधिवयों का जीवन आसान नहीं है। अभी तक टेंट नही लग पाए है और न ही पानी की व्यवस्था हो पाई है। अखाड़ों को आवंटित जमीन में अभी बिजली के तार और खग्भे लगाने का काम चल रहा है। चकर्ड प्लेंटे भी ढंग से नहीं पड़ पाई हैं जिससे आने जाने दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
गंगा जी की ओर पूजन को जा रही साध्वी रमा गिरि ने बताया कि उन्हें अव्यवस्थाओं से ज्यादा मां गंगा में फैली गंदगी को देखकर दुख होता है। इस निर्मल जल को इतना मैला देखकर मन कष्ट से भर जाता है और सरकार की अनदेखी पर गुस्सा आता है। महिला संत समाज इस ओर अपना रूख अवश्य कड़ा करेगा। बातों बातों में उन्होंने बताया कि घर परिवार को छोड़ने के बाद गंगा को ही मां के रूप में पूजा है और अब इस मां को कष्टों से बचाना है।

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