Wednesday, November 22, 2017
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कुंभ मेला तीर्थराज प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में होता है।प्रत्येक स्थान पर बारह साल के अंतराल में अर्थात तीन साल के अंतर पर इन चारों स्थानों में से कहीं न कहीं कुंभ होता है। तिथि के हिसाब से यह अवधि घटती बढ़ती रहती है।हर छह: साल के बाद प्रयाग और हरिद्वार में अर्ध कुंभ होता है। 2013 में प्रयाग में पूर्ण कुंभ होने वाला है जिसकी तैयारियां जोर शोर से चल रही हैं। कुंभ मेले में सभी अखाड़ों का तंबू लगता है जहां साधु सन्यासियों के दर्शन किये जा सकते हैं।


हिंदू धर्म में विभिन्न संप्रदाय के साधु ,वैरागी और योगियों से बनी संस्था को अखाड़ा कहते हैं। हिंदी भाषा में अखाड़े का साहितियक अर्थ है कुश्ती लड़ने की जगह। लगभग 2500 ई पूण् में आदि शंकराचार्या ने सात अखाड़ों की स्थापना की। महानिर्वाणी ,निरंजनी ,अटल ,आवाहन ,अगिन एवं आनंद अखाड़ा। इनकी संख्या दस भी हो सकती है क्योंकि इन्हें दसनामी भी कहा जाता है। कुछ योगी इन अखाड़ों को शंकराचार्या के बजाये गोरखनाथ से जोड़ते हैं।

 

अखाड़ों का असितत्व
अखाड़ों का इतिहास लगभग 2500 ई पू से ताल्लुक रखता है।लेकिन अखाड़े 8वीं सदी से असितत्व में आए जब आदि शंकराचार्य ने महानिर्वाणी , निरंजनी ,जूना , अटल ,आवाहन ,अगिन और आनंद अखाड़े की स्थापना की। इसका लक्ष्य हिंदू धर्म को शकितशाली करना और विभिन्न रस्मों , रिवाजों एवं आस्था को मानने वालों में एकजुटता पैदा करना था। भारत में 1947 में भारतीय सरकार बनने से पहले समय समय पर अन्य धमोर्ं के लोगों ने शासन किया अतैव ऐसे समय में अखाड़ों का यह लक्ष्य उचित था।

अखाडों का परिचय
आज तीन बड़े अखाड़े हैं-महानिर्वाणी ,निरंजनी ,जूना और तीन छोटे अखाड़े- अटल महानिर्वाणी से संबद्व ,आनंद निरंजनी से संबद्व और आवाहन जूना से संबद्व।इसके अलावा एक इससे भी छोटा अखाड़ा है- ब्रहमचारी अखाड़ा। इसका नाम अगिन है और यह जूना से संबद्व है।यूं तो और भी बहुत से छोटे छोटे अखाड़े हैं जो किसी बड़े अखाड़े से जुड़ गए हैं या किसी बड़े अखाड़े में उत्तराधिकार की लड़ाई के चलते अलग हो गए हैं।
प्रत्येक अखाड़े में जिस भगवान की पूजा होती है उसी के आधार पर उसका विभाजन होता है। भगवान शिव के भक्त शैव अखाड़े ,भगवान विष्णु के भक्त वैष्णव या वैरागी अखाड़े और भगवान ब्रहमा के भक्त कल्पवासी।

अखाड़ों का संचालन
एक अखाड़ा 8 खंडों और 52 केंद्रों में विभाजित होता है। प्रत्येक केंद्र की धार्मिक गतिविधियां एक महंत की देख रेख में होती है। अखाड़े की केंद्रीय प्रशासनिक अंग श्री पंच हैं जो ब्रहम , विष्णु ,शिव ,शकित और गणेश का प्रतिनिधित्व करते हैं। अखाड़े को चलाने वाले पांच सदस्यीय प्रशासनिक अंग का चुनाव प्रत्येक कुंभ मेले में होता है।
साधुओं की संख्या के आधार पर देखा जाए तो जूना अखाड़ा सबसे बड़ा है ,फिर निरंजनी एवं महानिर्वाणी। किसी अखाड़े के मुखिया को आचार्य महामंडलेश्वर कहते हैं , उनके अंतर्गत कई महामंडलेश्वर ,कमश: कई मंडलेश्वर एवं कई श्री महंत होते हैं।

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परंपरा के अनुसार स्नान के दिन नागा साधू और अखाड़े अगुवाई करते हैं एवं स्नान की रस्म की शुरूआत करते हैं। बाद में आम जनता जा सकती है। 

 

सन्यासी और युद्व कला
सन्यासियों की जो छवि हमारे सामने है उससे अलग भी उनकी एक और छवि होती है। कुछ सन्यासियों की युद्व में निपुणता। दसनामी नागाओं को कुछ हद तक उनके युद्व कला के लिए भी जाना जाता है। उनके अखाड़े युद्व कला के प्रशिक्षण केंद्र और हथियारों के जखिरा का केंद्र बन गए। विभिन्न मौकों पर दसनामी नागा युद्व में शामिल भी हुए हैं। इन अखाड़ों की स्थापना धर्म सैनिक बनाने के लिए हुई थी जो सामाजिक बुराइयों से अपने धर्म को बचा सके। 1565 में मधुसूदन सरस्वती ने अखाड़ों के माध्यम से अस्त्रधारी सैनिक शकित तैयार करना प्रारंभ किया जो हिंदुओं की रक्षा करे और बाहरी आक्रमण को रोके।

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कुंभ में अखाड़े
हिंदू धर्म की रक्षा का कार्य तो अखाड़े आज भी करते आ रहे हैं।प्रत्येक कुंभ में छोटे बड़े सभी अखाड़े अपना तंबू लगाते हैं। कुंभ को तबुओं का शहर कहा जाता है। पहले अखाड़े वास्तव में साधारण तंबू लगाते थे और साधु रेती पर धुनी जमाते थे। आज कुंभ मेले में ऐसा दृश्य मिलना मुशिकल है। अब अखाड़े शानदार तंबू लगाते हैं जहां बहुत तरह की सुविधाएं हैं। भूमि पूजन के पश्चात ही सभी अखाड़े रहने की व्यवस्था में जुट जाते हैं। अखाड़ों में साधु सन्यासियों के अलावा भक्तों की भी अच्छी खासी संख्या होती है। बहुत लोग इन अखाड़ों के सहयोग से ही कुंभ में निर्विघ्न प्रवास एवं स्नान करते हैं। अखाड़ों में निशुल्क भोजन का भी वितरण किया जाता है। इस बार कुंभ में अखाड़े आलीशान महल बनवाने वाले हैं। विदेशों में बसे अखाड़ों के पदाधिकारी अपने साथ वहां से महलों को सजाने के लिए साजो सामान लेकर आएंगे। महल बनने के बाद ही उसका असली रूप सामने आएगा। लेकिन आलीशान महल हो या तंबू भक्तों के लिए फर्क नहीं पड़ता। रहने की व्यवस्था जैसी भी हो भक्त अपना सारा वक्त अखाड़ों में होने वाले भजन , कीर्तन और प्रवचन में बिता देते हैं। अखाड़ों के बुनियादी ढ़ांचे को बरकरार रखते हुए समय के साथ बदलाव करना आवश्यक है जो हो भी रहा है। तीन अखाड़ों ने 6 दिसम्बर 2012 को धर्मध्वजा लहराकर महाकुंभ का आगाज किया। 52 गज का भगवा पताका पूरे महाकुंभ में लहराएगा।

 

 

 

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