Thursday, November 23, 2017
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PoorBest 


हर साल कल्पवास का प्रारंभ पौष पूर्णिमा से होता है। इस साल पौष पूर्णिमा 16 जनवरी को है। लेकिन इसके दो दिन पहले मकर संक्रांति पड़ने पर संक्रांति से ही कल्पवास की शुरूआत हो गर्इ। परंपरा के अनुसार सिर्फ मैथिली ब्राहमण ही संक्रांति से कल्पवास प्रारंभ करते थे परंतु इस साल सभी कल्पवासियों ने ऐसा ही किया।

संगम में स्नान करने के बाद कल्पवासियों ने अपने शिविर के सामने जौ बोया और तुलसी का बिरवा रोपा। डुबकी लगाने और जौ - तुलसी रोपने के साथ ही माह भर के जप , तप , नियम , संयम का संकल्प भी लिया गया।

कल्पवासियों की दिनचर्या बहुत कठिन होती है। माह भर कल्पवासी प्रतिदिन दो या तीन बार स्नान करेंगे। जबकि इलाहाबादवासियों के लिए इस समय एक बार गरम पानी से स्नान करना ही कठिन हो रहा है वह भी घर में रहकर। कल्पवासी संगम तट पर तंबू में रहते हुए गंगा में   प्रतिदिन दो या तीन बार स्नान करेंगे सोचने से भी कंपकंपी छूटती है। कल्पवासी पका हुआ भोजन एक बार खा सकते हैं और जमीन पर सोते हैं। एक महीने तक इन कठोर नियमों का पालन करने के  पश्चात इनका कल्पवास पूरा होता है। मान्यता है कि शिविर के बाहर बोर्इ गर्इ जौ के बढ़ने के तरह ही कल्पवासी का परिवार फले  फूले, समद्ध हो। कितनी गहरी होती है कल्पवासियों की आस्था, एक महीने तक विपरीत परिसिथतियों में रहकर भी संकल्प को टूटने नहीं देते। न ही बीच में कल्पवास तोड़ते हैं।

कल्पवास के प्रारंभ के साथ ही ति्रवेणी मार्ग , महावीर मार्ग , काली मार्ग सिथत कर्इ संस्थाओं के शिविरों में भजन - कीर्तन , प्रवचन की भी शुरूआत हुर्इ जो पूरे मेले के दौरान जारी रहेगी। अखिल भारतीय शिवमंगल   मानस सत्संग समिति की ओर से माघ मेला शिविर में स्वामी शिवमंगल दास आचार्य की देखरेख में श्रीमदभागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह शुरू हुआ।

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