Sunday, November 19, 2017
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इलाहबाद | गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम तट पर जहाँ  माघ  मेला शुरू हो चूका हैं... वही  माघ मेले में हजारो कल्पवासी मोक्ष की कामना से माघ मेले के दौरान  पूरे एक महीने तक कल्पवास करते हैं ..! इस दौरान रेत की इस नगरी में सारे मोह को त्यागकर मनुष्य पुण्य कि लालसा से संगम तट पर पधारता हैं और कल्पवास करता हैं

..धार्मिक पुराणों के अनुसार 33 करोड़  देवी-देवता इस दौरान संगम तट पर मौजूद रहते हैं..कल्पवास की परंपरा काफी प्राचीन हैं ..राजा युधिस्ठिर से लेकर राजा हर्षवर्धन तक ने इस मोक्ष के धाम में अपना भविष्य सवारने के लिए कल्पवास किया था..!


संगम तट पर कल्पवास की अपनी अलग परंपरा हैं ..! .सूर्य के मकर राशी में जाते ही गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम तट पर एक महीने तक चलने वाले व्रत, सयम के इस मेले में हजारो लोग पारिवारिक मोह-माया त्यागकर एक महीने तक अस्थायी निवास में रहकर मोक्ष की डुबकी लगाते हैं...! संगम तट की महत्ता पुराणों में भी बखानी गयी हैं ..I माघ मास में चलने वाले कल्पवास के बारे में कहा गया हैं की मनुष्यों के अलावा 33 करोड़  देवी-देवता भी धर्म के इस सबसे बड़े मेले में उपस्थित रहते हैं... महाभारत के युद्ध के दौरान महाराजा युधिस्ठिर भी अपने अग्रजो के आदेश पर और अपने पाप से मुक्ति पाने के लिए यहाँ प्रयाग में कल्पवास करने के लिए आये थे.. और साथ ही साथ अन्य राजाओ ने भी यहाँ पर पूरे एक महीने तक कल्पवास किया था.. !

 महाभारत समाप्त हुई और पांडवो की विजयी भी हुई लेकिन युद्ध के दौरान अपने ही भाई और परिवारजनों की मृत्यु से पांडव आहत थे..! पुराण बताते हैं की अपने ही परिजनों की मृत्यु के पाप को धोने के लिए पांडवो ने एक बार फिर संगम के तट पर पौह्च कर अपने किये पर माफ़ी मांगते हुए मोक्ष की कामना से कल्पवास किया और बड़े बुजुर्गो की शांति के लिए कठोर संकल्प लेकर अपने पापो का प्राश्चित किया ..! इसी के साथ ही कल्पवास का प्रयाग में और प्रचालन बढ़ गया ..


इस माघ मेले के दौरान पूरे देश भर से मन में आस्था की अलख जलाये हुए हर वर्ष श्रद्धालु चाहे कड़ाके की ठण्ड क्यों न हो लेकिन आस्था के अटूट बल के आगे सब कुछ कमजोर पड़ जाता हैं और हजारो श्रद्धालु कल्पवास करने के लिए पौह्च जाते हैं इस माघ मेले में चार चाँद लगाने के लिए...और हर तरफ बहने लगती हैं की भक्ति की धारा...कई ऐसे कल्पवासी भी हैं जो पिछले कई सालो से मेले में कल्पवास करने के लिए आ रहे हैं..कल्पवास के दौरान कल्प्वासियो  की   दिन चर्या कुछ अलग होती हैं और सुबह संगम में स्नान करने के बाद वोह पूजा अर्चना कर खाली एक समय भोजन करते हैं ..! और फिर पूरा दिन प्रभु की शरण में सत्संग और भजनों के बीच इनका पूरा दिन गुजरता हैं ..मोक्ष की कामना के लिए यह कल्पवासी संगम  की रेती पर कल्पवास करने के लिए पौह्चते हैं ..! और उनका मानना हैं की भगवन की भक्ति और कल्पवास करने से सब कुछ मिल जाता हैं.. !

तीर्थो के राजा कहलाने वाले प्रयाग में माघ मेले में जो भक्ति की धराहर साल बहती हैं उससे पूरा संगम का माहौल भक्तिमय तो हो ही जाता हैं  और साथ ही साथ संगम में डुबकी लगाने वाले पुण्य भी कमा लेते हैं..शायद यही कारण हैं की प्रयाग में लगने वाले माघ मेले और कुम्भ की जो महत्ता हैं वोह शायद पूरे देश में कहीं भी देखने को न मिले...! क्योंकि आस्था की जो मजबूत नीव प्रयाग में देखने को मिलती हैं...वोह नीव पूरे भारतवर्ष में एक मिसाल के तौर पर हैं.

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