Thursday, November 23, 2017
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poornima snan

पौष पूर्णिमा पर्व का विशेष महत्व शास्त्रों में वर्णित है, इस दिन से माघ मास के पवित्र स्नान का शुभारम्भ होता है। कुम्भ में दूर-दराज से आए हुए अधिकांश श्रद्धालु माघ मास में पौष पूर्णिमा से संगम तट पर निवास कर एक महीने का कल्पवास व्रत प्रारम्भ करते हैं। पौष पूर्णिमा पर ग्रह पिण्ड चन्द्रमा, ग्रह नक्षत्रों की विशेष सिथति और सुयोग पर अपनी प्राणदायिनी अमृतमयी किरणों का संचरण कर जल में प्राणदायी उर्जा समाहित करेगा। ग्रह नक्षत्रम ज्योतिष शोध संस्थान के ज्योतिषाचार्य आशुतोष वाष्र्णेय के अनुसार पौष पूर्णिमा के दिन पुष्य नक्षत्र सायं 4:23 तक रहेगा। मन, मसितष्क एवं जल तत्व को प्रभावित करने वाला चन्द्रमा स्वयं की कर्क राशि में पूर्णिमा के दिन होना अत्यंत प्रभावशाली है। कर्क राशि के चन्द्रमा से युक्त पूर्णिमा एवं पुष्य नक्षत्र का संयोग, उच्च राशि के शनि, वृष राशि के बृहस्पति, मकर के सूर्य, बुध के साथ स्नान-दान के पुण्य प्रताप को कर्इ गुना बड़ा रहा है।


• पौष पूर्णिमा के दिन कर्क राशि का चन्द्रमा तथा पूर्णिमा को पुष्य नक्षत्र का संचरण होने से इस दिन जिनके उपर चन्द्रमा की महादशा चल रही हो अथवा जिन्हें मानसिक उलझनें अधिक रहती हों, वे नौ रत्ती का मोती दाहिने हाथ की सबसे छोटी उंगली में चांदी की अंगूठी में जड़वाकर प्राण-प्रतिष्ठा करवाकर अवश्य धारण करें।

• विशेष लाभ के लिए हाथ की अपेक्षा गले में अद्र्धचन्द्राकार रूपी लाकेट में मोती जड़वाकर धारण करें। 

• व्रती को इस दिन प्रात:काल नदी आदि में स्नान करके देवताओं का पूजन एवं पितृों का तपृण करना चाहिए।

• सफेद चन्दन, चावल, सफेद फूल, धूप-दीप, सफेद वस्त्र आदि से चन्द्रमा का पूजन करें।

• जो स्नानार्थी प्रयाग कुम्भ क्षेत्र में स्नान के लिए उपसिथत नहीं हो पा रहे, वे भी तीर्थराज प्रयाग सहित त्रिवेणी संगम का स्मरण कर पवित्र नदी-तालाब में पौष पूर्णिमा के दुर्लभ योग पर डुबकी लगाकर पुण्य लाभ अर्जित कर सकते हैं।

• ज्योतिषाचार्य आशुतोष वाष्र्णेय के अनुसार पूर्णिमा तिथि का संचरण 26 जनवरी 2013, शनिवार को प्रात: 8:17 पर आरम्भ होकर रविवार को प्रात: 9:41 तक रहेगा। शनिवार को व्रत की पूर्णिमा तथा रविवार को स्नान-दान की पौष पूर्णिमा से माह भर माघ कुम्भ स्नान प्रारम्भ होगा। रविवार का परहेज करने वाले शनिवार को ही गंगा तट पर कल्पवास का संकल्प तीर्थ पुरोहित की देख-रेख में लेंगे।

• धर्मशास्त्रों में पौष माह की पूर्णिमा को स्नान-दान का विशेष महत्व वर्णित है, जो व्यघ पिूरे माघ मास के लिए स्नान का व्रत धारण करते हैं वो अपने स्नान का प्रारम्भ पौष पूर्र्णिमा से शुरू कर माघी पूर्णिमा को समापन करते हैं। इस दिन स्नान के पश्चात मधुसूदन भगवान की पूजा-आराधना कर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न किया जाता है, जिससे मधुसूदन की कृपा से मृत्योपरान्त भघ को स्वर्ग में स्थान मिल सके, ऐसी धार्मिक मान्यताएँ हैं। 

• सूर्योदय के पूर्व स्नानादि करके भगवान मधुसूदन की एवं उनके पश्चात ब्राह्राणों को भोजन एवं आराधना यथा शघदिन देने का विधान है। सायंकाल सत्यनारायण भगवान की कथा भी होती है।

• धर्म शात्रों के अनुसार जो इस स्नान को करता है वह देव-विमान में बैठकर विहार करने के योग्य हो जाता है। इस स्नान का पुण्य अर्जित करने वाले पुण्यात्मा स्वर्ग में विहार करते हैं, ऐसी हिन्दुओं की धार्मिक मान्यताएँ हैं।

• संगम के पवित्र जल में प्राणदायिनी शघ विधमान है, पौष पूर्णिमा के सुअवसर पर ग्रह नक्षत्रों की विशेष सिथति, चन्द्र आदि ग्रहों के माध्यम से अमृत वर्षा कर स्नान आदि करने वालों को निरोगी काया सहित पुण्य लाभ प्रदान करती है। सौ हजार गायों का दान करने का जो फल होता है वही फल तीर्र्थराज प्रयाग में माघ मास में तीस दिन (एक मास) स्नान करने का होता है।

 

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